Tuesday, September 17, 2019
.उपहार जिन्दगी का

.उपहार जिन्दगी का

मीडियावाला.इन।

आज कालोनी में बडी हलचल है । हर कौई उदास है , दुखी है ।

 

बहुत बूरा हुआ भाई ,,,,, ,,,,,

घर चलाने वाले अकेले ही थे शुक्ला जी ,,,,,, ,,,,,,,,

पिछले ग्यारह महीनों से इलाज चल रहा था ,,,,,, ,,,,,, 

अपने सारे गहने तक बैच दिये पत्नी ने , इलाज में कोई कसर नहीं छोडी ,,,,, ,,,,,,, ,,,,,, 

मेंने तो सूना है भाभी जी ने कर्ज भी लिया है ,,,,,

हाँ सूना तो ये भी है कि मकान गिरवीं रख कर उठाया है पैसा ,,,,,

ओहो ,, ,, अब मकान कैसे छुटेगा ,,,, ,,,, 

क्या करेगीं माँ ओर पत्नी,,, ,,,, 

 

कुछ भी कहो भाई ,,,,, ये तो भगवान ने अन्याय किया है परिवार पर ---------

अभी तो बच्चै भी छोटे है , उनका क्या होगा , सोच कर मन कांप उठता ,,,,,

 हँसते खेलते परिवार पर पहाड टूट पड़ा शर्मा जी ने सहानु भूति दर्शाते हुऐ कहा । 

सब अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे है ----- 

हाँ शुक्ला जी शान्त हो गये है अपने पिछे दो बच्चे , माँ वा पत्नी को बेसहारा कर गये -------

आज पगडी की रस्म है 10 वर्ष के बैटे को पगड़ी बांधी गई । 

सब की आँखे नम है पर इस दुख का कारण जानने की कौशिस किसी ने नहीं की ।

 

कहाँ है स्विटी  शर्मा जी ने घर आते ही पूछा ? 

अपने कमरे में ,,,, उदास है शुक्ला जी की बैटी उसके साथ ही पढती है , वो अपनी सहेली का दुख महसूस कर रही है माँ ने कहा ।

शर्मा जी :------ बहुत बूरा हुआ , कैसे सम्भलेगा परिवार ,,,,, ,,,,, 

दादी माँ :----- ईश्वर का बूलावा आ गया था बैटा ,,,, क्या कर सकते है ।

 

तभी माँ चिड कर बोली :----- कौइ बूलावा नहीं आया ,,,,,,, ,,,,,,,

मुहँ का केंसर था शुक्ला जी को , न्योता दिया था यमराज को ,,,,  ,,,

तंबाकू जो खाते थे , परिवार का भी नहीं सोचा । 

सहानुभूती से ज्यादा गुस्सा दिख रहा था माँ के चेहरे पर ।

स्विटी सब की बातें सून रही थी ।

 

महीना गुजर गया , स्विटी वो सब भूला नहीं पा रही थी ।

पापा :----- कल हमारी राजकुमारी का जन्मदिन है , बताओ कहाँ घूमने चलना है ।

स्विटी :-------कहीं नहीं पापा ।

पापा :----- बैटा तुम उदास होती हो तो अच्छा नहीं लगाता , खुश रहा करो ।

स्विटी पापा से लिपट कर बोली:--- " आई लव यू पापा " 

पापा आप हमेशा हमारे साथ रहेगें ना ,,,, ,,,,, 

हाँ बैटा हम हमेशा साथ रहेगें , शर्मा जी ने स्विटी को प्यार से दुलारा ।

माँ स्विटी को प्यार से सहलाते हुऐ बोली :----- कहो बैटा क्या गिफ्ट चाहीये ।

कुछ रूक कर स्विटी बोली :----- माँ हम घर पर ही जन्मदिन मनायें क्या ? 

माँ :---- हाँ बैटा क्यों नहीं , तुम्हारे सारे दोस्तो को भी बुलाना ।

पापा :----- चलो तुम्हारा गिफ्ट आज ही खरीद लाते है ।

आज नहीं गिफ्ट कल ही लूगीं पापा स्विटी ने बड़ी उत्सुकता से कहा ।

अगले दिन सब मेहमान आये , स्वीटी के दोस्त भी अपने पेरेन्टस के साथ आए , 

पापा ने कहा चलो कैक काटो बेटा ,,,,,,

स्वीटी ने झट हाथ बड़ाते हुए कहा :---- पहले मेरा गिफ्ट पापा ,

हाँ अभी लाते है , शर्मा जी ने कहा ।

पर मेरा गिफ्ट तो आपके पास है पापा ,,,,, ये ,,, हाँ पापा ये " तंबाकू का पाऊच "

पापा मुझे ये ही चाहीये ,,,

मुझे मेरे पापा चाहीये ,,,,,,

बोलो,,, पापा दोगे ना मेरा गिफ्ट ,,,,

प्लिज़ पापा फेंक दो इसे । 

शर्मा जी कि नज़रें झूक गई , उन्होंने वो पाऊच फेंक कर सॉरी कहते हुए तुरन्त बैटी को गले लगा लिया , 

माँ की आँखों में खुशी के आँसू थे ,,,, स्वीटी ने आज ये गिफ्ट ले कर पापा की ज़िदंगी ओर परिवार की सूरक्षा सुनिश्चित कर ली थी ।

 

वहाँ आये सभी लोग अपने मन में झांकने की कौशिस कर रहे थे ।

 

हर बच्चा इतनी गहराई से नहीं सोचता ,,,,, 

पर एक पिता , पति , भाई वा बैटा तो समझ ही सकता है कि ,,,,, 

वो परिवार के लिये क्या महत्व रखता है ,,,,,, 

परिवार आपका  ,,,,,,, 

ज़िदगीं आपकी ,,,,,,,

तो सोचना भी आपको ही है ।

     

                          " मीनू मांणक "

 

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