Saturday, October 19, 2019
विदाई

विदाई

मीडियावाला.इन।

विदाई

कल से दुलारी ने काम पर जाना छोड़ दिया था| उसके ब्याह को केवल पाँच दिन रह गए थे| वह सोचने लगी कम से कम पाँच दिन तो वह भी रानी महारानी की तरह आराम से रह ले| हल्दी तो उसे ब्याह के एक दिन पहले ही लगेगी| माँ ने सब हिसाब-किताब करके ही तय किया होगा| अगर पाँच दिन बाने बिठाया तो नाते-रिश्तेदारों को पाँच दिन तक जिमाना बहुत महँगा पड़ेगा| फिर वह सोचती है आजकल तो बड़े-बड़े रईस एक दिन में ब्याह रखते हैं| फिर हम तो झोपड़-पट्टी वाले हैं| इतना करते हैं यही बहुत है| दुलारी बहुत खुश है| वह रह-रहकर नाच उठती है| आज तो माँ ने गोटे वाली साड़ी पहना दी है| हरे रंग के पोत पर गोटा यूँ ही बहुत चमकता है| चाची तो जल-भुनकर खाक हो गई है- यह साड़ी उसने माँ से कई बार माँगी थी पर माँ ने यह कहकर मना कर दिया था कि दुलारी के ब्याह के लिए रखी है| यह साड़ी माँ को सामने वाले घर की माँजी ने दी थी जो उनके बेटे के ससुराल से आई थी| साड़ी के साथ उसे माँजी और बासाब की याद आ गई|

दुलारी को ब्याह की ख़ुशी से ज्यादा बासाब की चिन्ता सताने लगती है, अब उनका क्या होगा| दुलारी के दम पर तो उनका घर चलता है| दुलारी का न जाना मतलब बूढ़े-बुढ़िया का दाने-दाने को मोहताज होना| दुलारी को वो लोग भी तो बच्चों से ज्यादा लाड़-प्यार करते हैं| बासाब को देखकर दुलारी को तरस आता था| एक जमाना था जब राजा-महाराजा जैसे ठाठ-बाट थे बासाब के| कभी हिलकर पानी भी नहीं पिया था| तहसीलदार के पद पर थे| क्या नौकर-चाकर, क्या घोड़ा-गाड़ी सबकी लाइन लगी रहती थी| पटवारी से लेकर सरपंच तक सब उनके रोब-दाब से डरते थे| घर में शायद ही ऐसा कोई दिन हो जब बाहर के दो-चार लोगों ने उनके घर खाना न खाया हो| फिर खाना भी कोई दाल-रोटी वाला नहीं होता था| माँजी के जब तक हाथ पाँव चलते थे थाली भरकर व्यंजन पकते थे| माँजी ने खूब सेवा की पति की और खूब आवभगत की लोगों की| पर आज उस हवेली में दोनों यूँ पड़े रहते थे कि पूछो ही मत| सोचते-सोचते उसका मन द्रवित हो उठा|

दुलारी सोचने लगी पाँच दिन तक वह वहाँ भी काम पर नहीं गई तो? उसे एक झटका-सा लगता है| वह महसूस करने लगी जैसे वे दोनों उसे पुकार रहे हैं-दुलारी, दुलारी बिटिया| दुलारी उठती है, खोली की साँकल कुण्डी पर चढ़ाकर ताला डालती है और तेज कदमों से सामने वाली उस पुरानी हवेली में पहुँचती है| बासाब-बासाब की आवाज़ लगाती हुई अन्दर घुसती है| देखती है माँजी बिस्तर पर पड़ी टुकुर-टुकुर उसे देखने लगती हैं| फिर उनके रोगग्रस्त चेहरे पर रुलाई का बाँध फूट पड़ता है और आँखों से जो गंगा-जमुना शुरू हुई तो थमने का नाम ही नहीं लिया| उनकी रुलाई ने हमेशा दुलारी को भी रुलाया था| वो गुस्से में रोती हुई बोलने लगती माँजी तुमने आज भी रुला दिया ना? आज तो मैं खुश थी| पर..... दुलारी फिर रोते-रोते माँजी के आँसू पोंछने लगती है| बासाब कहाँ हैं? पूछती है तो माँजी लकवे के मुँह से अधूरे शब्दों में कहती हैं, अन्दर किचन में|

दुलारी दौड़कर किचन में पहुँचती, बासाब हटो मैं बनाती हूँ| बासाब झल्लाकर कहते चल हट तू जा| आज कर देगी तो कल फिर आफत होगी| मुझे ही करने दे| पराये घर जाती बिटिया से कोई काम करवाता है क्या? अरे मुझे क्यों नरक में धकेल रही है| दुल्हन बनी है दो दिन तू भी आराम कर ले| पर दुलारी उनके हाथ से आटे की थाली ले लेती है| बासाब दोपहर के दो बज रहे हैं| तुम आटा ढूँढ रहे हो| अरे मैं भूल गई तो क्या? तुम बुलवा लेते| अरे ग्यारह बजे तक तेरा रास्ता देखता रहा तू आएगी| दो बार तेरी माँ को चाय बनाकर दे दी थी| फिर तुझे बुलाने गया था| सड़क पर वो तेरी छम्मक-छल्लो चाची मिल गई| मैंने सोचा इससे पूछ लूँ तू घर पर है या नहीं| उसने कहा आज से तू काम पर नहीं जाएगी| दुल्हन बन गई है| इसलिए उल्टे पैर लौट आया| घण्टे भर से सामान ढूँढ रहा हूँ| पोहे का डिब्बा नहीं मिला| वो रखा है सामने वाले पटिए पर| दुलारी डिब्बा दिखाती है| बासाब काम करने लगे फिर सोचा जाड़े पतले तिक्कड़ लगा लूँ| रोटी तो रोटी है तो आटे का कनस्तर खाली पड़ा है| लगता है आज रोटी नसीब में ही नहीं है| फिर बासाब अकेले ही बड़बड़ाते हैं, मेरा तो कुछ नहीं मुझे तो भूख भी नहीं लगी पर तेरी माँजी को तो भरे पेट ही दवाई देना पड़ती है|

दुलारी माँजी के तकिए के नीचे से कोठार घर की चाबी ले लेती है| आटे के दो डिब्बे पिसवाकर उसने अन्दर वाले कमरे में रखे थे| यहाँ तो चींटियाँ नाक में दम कर देती हैं| दुलारी का मन भारी हो रहा था| वह जाकर नल पर मुँह धोती है फिर बासाब और माँजी के लिए कड़ाही में थोड़ा-सा हलवा सेंकती है| दस मिनट में हलवा तैयार है| फटाफट इलायची चकले पर ही पीस कर हलवे पर बुरक देती है| लो क्या देर लगती है, अरे दुलारी के आने की देर है? वह प्लेटों में डालकर दोनों को दे आती है| तुम नाश्ता करके जरा सुस्ता लो, तब तक मैं रोटी सेंक लूँगी| वह फटाफट कुकर में मूँग की दाल और चावल चढ़ा देती है| साग-भाजी तो कुछ है नहीं-क्या करूँ? सोचती है, फिर काँदे-मिर्च का सूखा बेसन बना देती है| बासाब को तो बेसन पसन्द भी है| पहले वह दस-बारह रोटी बनाकर हल्का घी लगाकर मलमल के कपड़े में लपेटकर डिब्बे में रख देती है|

फिर लौंग और लाल मिर्च से देसी घी में दाल छौंकती है| अरे दुलारी क्या पका रही है बड़ी महक आ रही है| कुछ नहीं बाबा मूँग की दाल छौंकी कहते हुए वह दो थाली में खाना परोसती है तो ख्याल आता है दही तो कल जमाया ही नहीं, अब? वह दौड़कर नुक्कड़ वाले हलवाई से पाँच रुपये का दही ले आती है| बाबा के खाते में लिख लो कहती भाग आती है| तब तक तीन बज गए| खाना खिलाती है तो बासाब के चेहरे पर एक असीम तृप्ति उसे दिखाई देती है| वे कहते हैं अब जाकर सन्तोष हुआ| वरना भूख से मेरा तो बुरा हाल हुआ जा रहा था|

दुलारी टोकती है पर बासाब तुम तोकह रहे थे भूख नहीं है? बासाब खिसियाते हैं जैसे उनकी चोरी पकड़ी गई हो| दुलारी शाम के लिए ढककर खाना रख देती है और भागती-दौड़ती घर पहुँच जाती है| दुलारी सोचती है क्या होगा यदि वह चार दिन भी नहीं गई तो? याद करती है वह हवेली के त्यौहार|

दीवाली पर उसकी स्मृतियों में हवेली की पुरानी रौनक दस्तक देती है| कैसी रौनक हुआ करती थी इस हवेली में| सारा गाँव ढोक पड़वा पर मिलने आता था पर अब? उसने कहा भी था बासाब तुम रज्जन भैया के घर चले जाओ| यहाँ पड़े रहने से क्या सार है| माँजी की हालत देखी है| मन चंगा होगा तो बीमारी जल्दी दूर हो जाएगी| पर दुलारी यह भी जानती है कि रज्जन भैया के घर में सब कुछ है पर अपनापन नहीं है| पाँच साल पहले बासाब और माँजी ने दुलारी की माँ को समझाया था.....|

रज्जू को लाड़ी की चिट्ठी आई है| उसको वहाँ बड़े शहर में काम वाली की आफत है| बेचारी बहू नौकरी करती है- ऊपर से पेट से भी है- दुलारी की माँ अगर तुम दुलारी को वहाँ भेज दोगी तो तुमको चार पैसे भी मिल जाएँगे और दुलारी भी शहर में गुण सीखेगी? यहाँ क्या रखा है?

फिर बासाब और माँजी ने उसे दो जोड़ी कपड़े बनवा दिए थे| साथ में ले गए थे वे लोग| जब शहर पहुँचे तो बहुत खुश थे पर जब लौटे तो बहुत दुखी थे कि माँजी को लकवे का अटैक आ गया| दुलारी तो पक्के दावे से कहती है कि रज्जू भैया की पत्नी की ही हाय लगी है माँजी को|

दुलारी को तो इतना बुरा नहीं लगा था जितना माँजी को लगा| दुलारी खाना खा रही थी तो माँजी ने देखा बहू ने दुलारी के लिए कंट्रोल का मोटा चावल पकाकर परोसा था| यह चावल वह उसके अलसेशियन कुत्ते के लिए पकाती थी| माँजी ने पूछा तो बहू ने झूठ बोला था बासमती बचा नहीं था इसलिए यह परोस दिया| माँजी ने उसकी थाली उठाकर कुत्ते को डाल दी थी और खुद की थाली का आधा खाना दुलारी को खिलाया था| फिर अकेले में बहू को समझाने लगी थी बहू क्या एक लड़की जो सुबह से शाम तक तेरे घर दाड़की करती है- उसे कुत्ते से भी बदतर खाना दिया? कुत्तों को तो भी दूध मिल जाता है पर बच्ची को दाल भी कुकर की धोवन? अब समझी मैं तुम्हें शहर में बाई क्यों नहीं मिलती? बहू सामने तो चुप रही पर पीठ-पीछे बड़बड़ाती रही थी| बुढ़िया खुद तो माल चाटती है नौकरों को भी चटाती है| बस तभी से ऐसी हाय लगी कि फिर माँजी उठी ही नहीं| माँजी के लकवे की खबर जब दी तो बहू का बच्चा छोटा था| रज्जू बाबू ने रूपया भिजवा दिया था इलाज करवा लो| पर यह नहीं सोचा इलाज करवाने वाले की भी जरूरत है| दुलारी को आज तक समझ नहीं आया लोग इतने बेमुरव्वत कैसे हो जाते हैं? उससे अड़ोस-पड़ोस का दुख नहीं देखा जाता और लोग हैं कि नौ माह कोख में पालने वाली माँ के लिए नौ घण्टे नहीं निकाल पाते| फिर क्या रखा है दुनिया में| क्यों औरतें बच्चों को जन्म देने के लिए मरणासन्न पीड़ा झेलती हैं? पिता एक कुर्ता-पाजामा हफ़्ते भर पहनता है और बेटे को स्कूल, स्पोर्ट्स, पार्टी सबके लिए ड्रेस दिलवाता है|

माँजी की बिटिया जरूर माँ के लिए भागती हुई आई पर बड़े कुटुम्ब के लोगों ने एक हफ़्ते बाद लिवाने भेज दिया| अरे महीना-पन्द्रह दिनों की सेवा तो करने देते| पर ससुराल वाली बिटिया पर जोर-जबरदस्ती तो नहीं करते हैं ना| जब तक रहे बहुत है| दुलारी को याद हैं निम्मो जीजी की वे पनीली आँखें| माँ को छोड़कर जाते वक़्त कितना रोई थी| माँ की असहाय स्थिति और बाबूजी की बेबस हालत पर निम्मो जीजी ने ही दुलारी को बुलाकर विनती की थी.....दुलारी अब केवल तेरा सहारा है| तू मेरे साथ बचपन से खेली है| अब ये तेरे माँ-बाबूजी हैं समझकर काम कर जाया कर| बाबूजी को रोटी बनाना तो दूर चाय भी बनाना नहीं आती| मैं तेरे भरोसे इन्हें छोड़कर जा रही हूँ| और निम्मो जीजी चली गई|

दूसरे दिन दुलारी आई तो देखा बाबूजी चाय बनाने की जुगाड़ कर रहे थे| वे ब्रेड का पैकेट ले आए थे| दूध भी गरम करके रख दिया था| फिर तो दुलारी ने चौका सँभाल लिया था| आज तक उस चौके को वही निपटाती आ रही थी| एक दिन नागा कर गई थी दूसरे दिन तक दोनों भूखे बैठे रहे| बाबूजी ने कचौरी खाई थी और माँजी ने दूध-बिस्किट| बाबूजी को कचौरी हजम नहीं हुई, वो दस्त लगे कि डॉक्टर थक गया दवाई देते-देते| तब से दुलारी खुद भूखी रह सकती है पर दोनों के लिए बीमारी तिमारी में भी आ जाती है|

आज तो दुलारी का सबसे बड़ा दिन है| शाम को लगन है पर दुलारी को कल की चिन्ता है| वह सोच रही है कल तो वह ससुराल चली जाएगी फिर बासाब और माँजी| वह हल्दी लगी दुल्हन बनी ही पहुँच जाती है हवेली| बासाब उसे रोटी नहीं बनाने देते हैं| कहते हैं दुलारी तूने तो नाम सार्थक कर दिया बेटी| आज तो तेरी मेहँदी का रंग उतरना अपशगुन होता है चल उठ चटक रंग फीका पड़ जाएगा| जानती है ब्याह से पहले मेहँदी का रंग उतरना अपशगुन होता है| जा माँजी के पास बैठ| वह माँजी के पास बैठती है तो माँजी उसका हाथ पकड़कर फूट-फूटकर रोती है इतना तो वे निम्मो की विदाई पर भी नहीं रोई होंगी| शायद खुद की पर भी नहीं| वे बासाब को इशारे से बुलाती हैं| कोठार घर की कोठी में से रखा हुआ नया बर्तनों का थैला जिसमें बाल्टी, घड़ा, थाली, गिलास, कटोरी, तपेली, तसले; डिब्बे सब मिलाकर २१ बर्तन थे हल्दी-कुमकुम लगाकर दुलारी को दिलवाती हैं कन्यादान की रस्म के रूप में| फिर खुद के ब्याह की नाथ वे दुलारी की नाक में पहना देती हैं| दुलारी पैर छूती है तो बासाब उसके सर पर हाथ रख आशीर्वाद देते हैं| “दूधो नहाओ पूतो फलो” माँ साब भी कहना चाहती थीं सदा सौभाग्यवती रहो| पर स्पष्ट बोल नहीं पातीं| इस तरह दुलारी की विदाई तो सुबह ही हो गई उसके मायके से| जो दुख इस मायके को छोड़ने का दुलारी को है उसे समझना या समझाना मेरे बस की बात नहीं|

 

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