Wednesday, February 20, 2019
बैतूल और बैतूल के कस्बे

बैतूल और बैतूल के कस्बे

मीडियावाला.इन।

बैतूल नहीं बे-तूल की बातें 
अनुभूति उजले दिन सी
संवेदना 
काली रातें 
गुज़रती ज़िंदगी आदिवासियों की 
एकमात्र बस्तर को छोड़ 
मध्यप्रदेश का सबसे पिछड़ा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र 

भोपाल-नागपुर 60 हाईवे पर 
स्थित कस्बानुमा शहर 
आधुनिकता की दौड़ में शामिल 
झिलमिल...दृश्य देखा पढ़ते यदाकदा 
लड़कियां नज़र आती अब जींस और टी-शर्ट पर

घने जंगलों के बीच 
बसा 
कस्बानुमा शहर...

कभी बेखटके शायद ही 
कोई अंग्रेजी टुकड़ी आयी हो 
गु़लाम भारत में इस तरफ
 कि अब भी मध्य प्रदेश के सबसे बड़े जंक्शन इटारसी से बैतूल के लिए पार करने पड़ते हैं :
केसला, कीरतगढ़, कालाआखर, ढोडरामोहर, बरबतपुर घोड़ाडोंगरी, धाराखोह और मरामझिरी

तगड़े काले गोंड झुणडों  में बसातेे गृहस्थी 
उगाते कोदों कुटकी 
खींचते पसीने से खेत 
पिलाते पेज बच्चों और मवेशियों को 

करते सिंगार पुरखों के सेते चांदी के सिक्कों से 
स्त्रियां भारी वर्क्षजों पर अंगिया कसती
होती नक्काशी जिन पर 
इन्हीं सिक्कों या शीशे के टुकड़ों की

कस्बों-कस्बों लगता हफ्ते में एक दिन 
हाट बारी-बारी 
बड़े ठाट-बाट से आते करने खरीददारी 
झुंड के झुंड 
युवा-वृद्ध, दद्दा, बब्बा, अाजी
दूल्हा-दुल्हन, बाराती 
गाते लोकगीत कोरस में 
'कौन शहर को बाजार दूल्हा 
बैतूल शहर को बाजार दूल्हा'
खत्म हुआ जो इधर गान तो उधर अलाप
गहकाता जाए अपने आप 
'बन्ना के हाथों में बिजना कटारी 
बन्ना खेलत जाए, बन्ना खेलत जाए, बन्ना खेलत जाए'
मिला कोई परिचित जहाँ
पटक झोला करते पालागन 
गले लगते नहीं लजाता ठेठ देहातीपन 
औरों की उपस्थिति में

पहाड़ों की तलहटी में 
खण्ड खण्ड बसे कस्बे
पूरी तरह निमग्न 
भारतीय संस्कृति के प्रतीक 
करते सुरक्षा वक़्त बेवक़्त 
हँसिए पिघलाकर तलवार बनाने को आतुर

खींचती गंध
डंगरे-कलिंदे, तरबूज और ककड़ी की 
कोसों फैले पाट पर बिछी बाड़ी
खीरे की तरह उगलती नदी 
बना करती महुए की शराब वहीं कहीं

बैठते चिलम खींचने जहाँ चार लोग 
कम पड़ जाती है आधा सेर तम्बाखू 
गप्प लड़ाते 
आग तापते ...
देते हवा की किंवदंतियों को :
उतर आती आसमान से परी 
नाचते भूत-प्रेत छमाछम 
डायनें करती घर का सारा काम 
पशु बलि और नर बलि को कबूलते आदिवासी

बेखौफ फल्लाँगतीकिशोरियाँ
पहाड़, नदी, नाले, दर्रे, घाटियाँ 
नहीं कुछ छिन जाने का डर 
पता भी नहीं है कुछ छिन जाने जैसा इनके पास 
नहीं शिकन चेहरे पर 
ना होती कभी उदास 
बेखौफ फल्लाँगती किशोरियाँ अपना समय

मीठी नींद की तरह होते 
कस्बों में चैन से बसते रहते आदिवासी 
श्रम और रोटी के बाद गिनते पाप और पुन्य को 
राजनीति कि नहीं समझ 
बस जानते महात्मा गांधी को 
लच्छेदार सफेद फूल-सा

अकाल के अट्ठाईस बरस पहले कभी 
वे गुजरे थे यहाँ से 
तब पानी पिलाया था मुखिया ने 
तभी से पता है :
"येर कोर सरकार ताक्से-तातौड़"

चस्पाँ हुए दृश्य ऐसे कि तब्दील नहीं होते 
पर नहीं है लिखित ब्यौरा कहीं 
इन कस्बों से गुजरे थे महात्मा गांधी कभी 
न सरदार वल्लभ भाई पटेल 
न पंडित जवाहरलाल नेहरू 
और न इंदिरा गांधी 
नहीं जानता कोई कस्बा सार्त्र या कार्ल मार्क्स को 
नहीं सुना कभी फ्रायड या कीर्क गार्द का नाम 
नहीं पहुँच पाया कोई अरस्तू अब तक यहाँ

कोई छंद नहीं लिखा गया बैतूल पर आज तक 
यहाँ कभी नहीं पी मुक्तिबोध ने बीड़ी!


2. क्रांति के पहले
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क्रांति के पहले वह ढूँढ़ता है 
अपने हिस्से की जमीन, आसमान, रोटी और छत &
अपने हिस्से की ज़िंदगी :
                सार्वजनिक 
                           व्यक्तिगत 

उसकी खोज में शामिल है :
अपनी धूप, अपनी गंध, अपना धर्म 
               भीतर और बाहर का आदमी 

अपने शब्द और अपनी अभिव्यक्ति 

वह ढूंढता है 
सामर्थ्य शक्ति और युक्ति 

क्योंकि क्रांति के बाद भी उसे 
यही सब ढूँढना है सो वह सोचता है 
अपने विचार और सोच के रखरखाव को लेकर 
               दंगे और बचाव को लेकर 

क्रांति के पहले वह सोचता है 
कि क्या क्रांति के अलावा 
              कोई और रास्ता बचा है उसके लिए!

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मोहन सगोरिया

जन्म- 25 दिसम्बर 1975, भौंरा बैतूल. यहीं आरंभिक पढ़ाई.  स्नातकोत्तर इटारसी से.

रचनाएं-- 'जैसे अभी-अभी', 'दिन में मोमबत्तियाँ'.

पुरस्कार/सम्मान-- रज़ा पुरस्कार, लक्ष्मणप्रसाद स्मृति मंडलोई सम्मान,  शिवा सम्मान,  अम्बिकाप्रसाद दिव्य सम्मान.

संपादन-- साक्षात्कार, पल प्रतिबल,  रचना समय, समझ झरोखा के संपादन  से संबद्ध .

शब्द संगत,  प्रबुद्ध भारती का संपादन--.

विज्ञान कथा संचयन "सुपरनोवा का रहस्य" एवं "संगत" जलतरंग उपन्यास पर समीक्षा ग्पुस्तक का संपादन.

फिलहाल रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में विज्ञान पत्रिका "इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए" के सह संपादक.