Wednesday, July 17, 2019
शेष रह गया है सब अनकहा, अनसुना

शेष रह गया है सब अनकहा, अनसुना

मीडियावाला.इन।                       भारती पंडित

शेष रह गया

कह दूँगी फिर कभी

सब कुछ तुमसे
सोचते- सोचते 
कितना सब रह गया
कहने- सुनने को
रह गया बताना
कि तुम्हारा यूँ
गहरी नज़र से देखना 
पुलकित कर देता है
भीतर तक मुझे
टेबल पर झुककर
जो कहते हो 
कुछ हौले से
तुम्हारे कानों की 
सुर्ख होती लौ
बढ़ा देती है धड़कनें मेरी
जब थामते हो हाथ मेरा
तुम्हारी हथेली का 
वह कौला सा स्पर्श
सिहरन सी दौड़ा जाता है
शरीर के पोर पोर में
और हाँ
फिर कभी के फेर में
यह भी रह गया कहना तुम से
कि मुरीद हूँ मैं
तुम्हारी निश्छल हँसी की
और तुम्हारे अतिरेकी प्रेम की
तुम्हारी बातें, तुम्हारे गीत
तुम्हारे तरीके, तुम्हारे कायदे
बहुत लुभाते हैं मुझे
और हाँ
कल के फेर में

रह गया यह भी कहना
कि आदमखोरों की इस दुनिया में
तुम ही वह आदम हो
जिसे टूटकर चाहती हूं
मैं
बेपनाह, बेहिसाब और बेतरहा
आज तुम नहीं हो
बस शेष रह गया है
सब अनकहा, अनसुना

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आसान नहीं है प्रेम लिखना

आसान नहीं है प्रेम लिखना

तुम नफरत ही लिखो

लिखोगोले, बारूद, तमंचे

खून खराबा, उन्माद लिखो

आसान नहीं है प्रेम लिखना

तुम नफरत ही लिखो

दंगे औ कत्लेआम लिखो

लड़ाई-झगड़े तमाम लिखो

हाँ तुम नफरत ही लिखो

आसान नहीं है प्रेम लिखना

क्योंकिजीया जाता है प्रेमको

लिखने से बहुत पहले

क्यायहजानते हो तुम?

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