Monday, September 23, 2019
भारतीय परंपरा में हमने समष्टि को दो रूपों में देखा है एक सत्य के रूप में एक प्रेम के रूप में:कपिल तिवारी

भारतीय परंपरा में हमने समष्टि को दो रूपों में देखा है एक सत्य के रूप में एक प्रेम के रूप में:कपिल तिवारी

मीडियावाला.इन।भारतीय परंपरा में हमने समष्टि को दो रूपों में देखा है एक सत्य के रूप में एक प्रेम के रूप में यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार लोक संस्कृति के विद्वान कपिल तिवारी का। वे बुधवार से महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज (एमएलबी) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर अतिथि संबोधित कर रहे थे।

भक्तिकाल में कृष्णभक्ति शाखा के अंतर्गत आने वाले प्रमुख कवियों में महिला संतों का भी प्रमुख स्थान रहा है |भक्ति काल की महिला संतों के यहां श्रृंगार की भवभूमि को हमें भारतीय आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में समझना होगा। आज हम जिस विषय पर विचार कर रहे हैं, वह बुद्धि का क्षेत्र उतना नहीं है , जितना भाव का है, संवेदना का है।मीराबाई (१५०४-१५५८) कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं।भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तिस्व को, मूल को अर्जित किया है।उनकी कविताओं में स्त्री पराधीनता के प्रती एक गहरी टीस है, जो भक्ति के रंग में रंग कर और गहरी हो गयी है।[1] मीरा बाई ने कृष्ण-भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है।मीरा की भक्ति में माधुर्य- भाव काफी हद तक पाया जाता था।इन्होंने अपने बहुत से पदों की रचना राजस्थानी मिश्रित भाषा में ही है। इसके अलावा कुछ विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में भी लिखा है। मीरा ने  जन्मजात कवियित्री न होने के बावजूद भक्ति की भावना में कवियित्री के रुप में प्रसिद्धि प्रदान की। मीरा के विरह गीतों में समकालीन कवियों की अपेक्षा अधिक स्वाभाविकता पाई जाती है। इन्होंने अपने पदों में श्रृंगार और शांत रस का प्रयोग विशेष रुप से किया है। भारतीय परंपरा में हमने समष्टि को दो रूपों में देखा है एक सत्य के रूप में एक प्रेम के रूप में यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकारलोक संस्कृति के विद्वान कपिल तिवारी का। वे बुधवार से महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज (एमएलबी) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर अतिथि संबोधित कर रहे थे। 'भारतीय संत परंपरा में महिला संतों के योगदान' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि मीरा की पूरी संबोली  गिरधर गोपाल के लिए है । इस क्रम में उन्होंने कश्मीर की महिला संत लल्लेश्वरी ,सहजोबाई , दयाबाई आदि महिला संतों के आध्यात्मिक एवं रचनात्मक अवदानों को भी रेखांकित किया। डॉ.राजकुमारी शर्मा द्वारा मीरा के भजनों 'पायोजी मैंने राम रतन धन पायो...' और 'मेरे तो गिरधर गोपाल...' की संगीतिक प्रस्तुति दी। साथ ही नृत्यांगना डॉ. लता सिंह मुंशी के निर्देशन में उनकी शिष्याओं ने नृत्य नाटिका 'मीरा' के जरिए जीवन चरित्र पेश किया। कार्यक्रम में कॉलेज की की प्राचार्य डॉ. ममता चंसोरिया ने भारत में महिला संतों एवं विदुषियों की परंपरा की चर्चा करते हुए गार्गी, मैत्रेई, निवेदिता , राबिया आदि के योगदान को रेखांकित किया। संगोष्ठी की संयोजक डॉ उर्मिला शिरीष शर्मा ने अपने प्रस्तावना वक्तव्य में कहा कि भक्ति काल की महिला संतों ने ना केवल अपने समय की वर्जनाओं व सामाजिक कुरीतियों का साहस के साथ सामना किया, अपितु भविष्य की स्थिति को भी देखा व समझा है। उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला।समाज से सीना ठोककर बात करने की शक्ति थी संतो के पास

विशिष्ट अतिथि डॉ. मृदुला पारेख ने गुजरात की महिला संत परंपरा पर केंद्रित करते हुए तोरल, रूपांदे, लोयण आदि के व्यक्तित्व एवं भक्ति पद्धति पर विस्तार से अपनी बात रखी । केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के प्रोफेसर रामवीर सिंह ने कहा कि समाज से सीना ठोककर बात करने की शक्ति संतो के पास थी। इस परंपरा की यह विशेषता है कि यहां संतो के भीतर समाज बोलता है । संतों में इतनी ताकत होती है कि वह ईश्वर को भी अपना गुलाम बना सकता है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुधीर कुमार शर्मा एवं आभार डॉ.प्रज्ञा थापक ने व्यक्त किया। संगोष्ठी के दूसरे सत्र में खालसा कॉलेज मुंबई से आए प्रो. डॉ. मृगेंद्र राय, शिल्पकार शंपा शाह ने अपनी बात रखी। अध्यक्षता साहित्यकार डॉ. उमेश कुमार सिंह ने की। इस अवसर पर संगोष्ठी की संयोजक डॉ. उर्मिला शिरीष शर्मा प्राध्यापक, संगोष्ठी के प्रतिभागी शोधार्थी उपस्थित थे।

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