Monday, September 23, 2019
वरमाला रौंद दूंगी:नारीवादी रमणिका गुप्ता की कविता 

वरमाला रौंद दूंगी:नारीवादी रमणिका गुप्ता की कविता 

मीडियावाला.इन।

आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाली साहित्यकार और नारीवादी रमणिका गुप्ता का नई दिल्ली में निधन हो गया, वे 89 साल की थींउनकी कविता 

स्त्री विमर्श विषयक कृतियां हैं,रमणिका गुप्ता देश की वामपंथी प्रगतिशील धारा की प्रमुख रचनाकार थीं.

22 अप्रैल 1930 को पंजाब में जन्मी रमणिका ने आदिवासी व दलित साहित्य को नया आयाम दिया. वह साहित्य, समाज सेवा और राजनीति कई क्षेत्रों से जुड़ी हुई थीं.

वह सामाजिक सरोकारों की पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक थीं. उन्होंने स्त्री विमर्श पर बेहतरीन काम किया.

                                       1-वरमाला रौंद दूंगी 

एक
बड़ी बारादरी में
सिंहासनों पर सजे तुम
बैठे हो-
कई चेहरों में
वरमाला के इंतजार में
बारादरी के हर द्वार पर
तुमने 
बोर्ड लगा रखे हैं
‘बिना इजाजत महिलाओं को बाहर जाना मना है
परंपराओं की तलवार लिए
संस्कार पहरे पर खड़े हैं
संस्कृति की
वर्दियां पहने

मैं 
वरमाला लिए
उस द्वार-हीन बंद बारादरी में
लायी गयी हूं
सजाकर वरमाला पहनाने के लिए
किसी भी एक पुरुष को
मुझे
बिना वरमाला पहनाए
लौटने की इजाजत नहीं
मेरा ‘इनकार’
तुम्हें सह्य नहीं
मेरा ‘चयन’
तुम्हारे बनाए कानूनों में कैद है

वरमाला पहनानी ही होगी
चूंकि बारादरी से निकलने के दरवाजे
मेरे लिए बंद हैं
और बाहर भी
पृथ्वीराज मुझे ले भागने को
कटिबद्ध है
मेरा
‘न’ कहने का अधिकार तो
रहने दो मुझे

मेरा 
‘चयन’ का आधार तो
गढ़ने दो
बनाने दो मुझे

पर
तुम-जो बहुत-से चेहरे रखते हो
मुखौटे गढ़ते हो
स्वांग रचते हो
रिश्ते मढ़ते हो
संस्कृति की चित्रपटी पर
केवल
एक ही चित्र रचते हो
मेरे इनकार का नहीं
और
आज मैंने इनकार करने की हठ ठान ली है...
वरमाला लौटाने का प्रण ले लिया
‘न’ कहने का संकल्प कर लिया है

इसलिए
हटा लो
संस्कारों के पहरेदारों के
दरवाज़ों पर से
नहीं तो-
मैं
तुम्हारे मुखौटे नोच दूंगी
होठों से सिली मुसकानें उधेड़ दूंगी
ललाट पर सटा कथित भाग्य उखाड़ दूंगी
हाथों से दंभ के दंड छीन लूंगी
हावों से अधिकार की गंध खींच लूंगी
आंखों में चमकते आन के आईने फोड़ दूंगी
और तेरी आकांक्षाओं में छिपे
शान और मान के पैमाने तोड़ दूंगी
तेरी नजर के भेड़ियों को रगेदकर
दरवाजों पर खड़े पहरेदारों को खदेड़कर
वरमाला रौंद दूंगी
पर
नहीं पहनाऊंगी
तुम्हारी सजी हुई कतार में से किसी को
क्योंकि
इस व्यवस्था में
‘चयन’ का मेरा अधिकार नहीं है!

2-मैं आजाद हुई हूं


खिड़कियां खोल दो
शीशे के रंग भी मिटा दो
परदे हटा दो
हवा आने दो
धूप भर जाने दो
दरवाजा खुल जाने दो

मैं आजाद हुई हूं
सूरज गया है मेरे कमरे में
अंधेरा मेरे पलंग के नीचे छिपते-छिपते
पकड़ा गया है
धक्के लगाकर बाहर कर दिया गया है उसे
धूप से तार-तार हो गया है वह
मेरे बिस्तर की चादर बहुत मुचक गई है
बदल दो इसे
मेरी मुक्ति के स्वागत में
अकेलेपन के अभिनन्दन में
मैं आजाद हुई हूं

गुलाब की लताएं
जो डर से बाहर-बाहर लटकी थीं
खिड़की के छज्जे के ऊपर
उचक-उचक कर खिड़की के भीतर
देखने की कोशिश में हैं
कुछ बदल-सा गया है

सहमे-सहमे हवा के झोंके
बन्द खिड़कियों से टकरा कर लौट जाते थे
अब दबे पांव
कमरे के अन्दर ताक-झांक कर रहे हैं
हां ! डरो मत! आओ न!
भीतर चले आओ तुम
अब तुम पर कोई खिड़कियां
बन्द करने वाला नहीं है
अब मैं अपने वश में हूं
किसी और के नहीं
इसलिए रुको मत

मैं आजाद हुई हूं

कई दिनों से घर के बाहर
बच्चों ने आना बन्द कर दिया था
मुझे भी उनकी चिल्लाहट सुने
लगता था युग बीत गया
आज अचानक खिड़कियां खुलीं देख
दरवाजे़ खुले देख
शीशों पर मिटे रंग और परदे हटे देख
वे भौंचक-से फुसफसा रहे हैं
कमरे की दीवार से सटे-सटे
ज़ोर से बोलो न
चिल्लाओ न जी भर कर
नहीं
मैं कोई परदेश से नहीं लौटी हूं
नई नहीं हूं इस घर में
बरसों से रहती हूं
खो गई थी किसी में
आज अपने आपको मिल गई हूं
अपनी आवाज और अपनी बोली भी भूल गई थी
सुनना भी भूल गई थी
सुनाना भी
अब सनने लगी हूं
इसलिए खूब बोलो
दीवारों से सटकर नहीं
खिड़कियों से झांक कर हंसकर चिल्लाओ
कोई तुम्हें रोकने वाला नहीं है

मैं आजाद हुई हूं

अब आजाद हैं सभी
मेरा शयनकक्ष भी
जो एक बन्दी-गृह बन गया था
बन्द हो गया था तहख़ाने की तरह
तिलस्म के जादू के ताले पड़ गए थे जिस पर
आज खुल गया है

मैं आजाद हुई हूं!

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