Monday, October 14, 2019
 शिफाली  की कुछ चुनिन्दा कवितायें 

 शिफाली की कुछ चुनिन्दा कवितायें 

मीडियावाला.इन।हिंदी दिवस:१४ सितंबर पर युवा कवि शिफाली (टीवी पत्रकार और लेखिका) की कुछ चुनिन्दा कवितायें 

लाल साड़ी और मांग भर सिंदूर में,
उसे भी खिंचानी थी
तुम्हारे बांई तरफ के कंधे पर
हाथ रखे तस्वीर
उसने कोशिश भी की
पर तुमने झटक दिया हाथ
कहा, ये बेशर्मी मुझे नहीं सुहाती

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तुम्हारा हाथ थामें
समन्दर किनारे
रेत पर बनें उस दिल के
ठीक बीचोंबीच खड़ा होना था उसे
फिलिम में जैसे खड़ी हुई थी
परवीन बाबी अमिताबच्चन के साथ
उसने भीड़ से अलग बुलाया भी तुम्हे
तुमने चिल्ला कर कहा
बच्चे की ऊंगली पकड़ों
जाने होश कहां रहता है हमेशा

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आखिरी बार फेरे लेने के बाद
बैठी थी वो तुम्हारे बाजू
फिर उसके बाद
कितने व्रत त्योहार
कितने पूजा पाठ
कितनी आरतियां
थाली लिए पलटती रही बार बार
और तुम घूरती आंखों से धमकाते रहे
पूजा में भी ध्यान नहीं है तुम्हारा
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मैं कैसी लग रही हूं
शादी के बाद
कितने बरस उसने पूछना चाहा ये सवाल
उस दिन हिम्मत करके पूछ भी लिया
जब तुमने जवाब में भी सवाल किया
कहा,
तीन बच्चों की मां कैसी लगती है
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वो बेवजह उन फूलों को हाथ में लिए शर्माई
जो पहली मुलाकात में तुम उसे रिझाने लाए थे
शरमा कर पूछा, कुछ याद आया आपको
और तुमने झिड़क कर कहा
सब मैं ही याद रखूं
तुम जिम्मेदार कब बनोगी....
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उसकी लाल साड़ी घर के आले का पर्दा है अब
कि छिपा रहे घर का अटाला
सिंदूर, बहन बेटियों में बांट दिया कभी का
अब वो समन्दर किनारे
दिल नहीं,
एक गोला बनाती है....
ढूंढती है गोले से बाहर आने के रास्ते
आईना आखिरी बार कब देखा उसे याद नहीं
बिटिया के हाथ में फूल आते ही उसे समझाती है
फूल संग काटें भी आते हैं
चुभ जाएं तो घाव बन जाते हैं......

....................................शिफाली

दरवाज़े पर स्वास्तिक भी बनाया था
घर को हर बुरी नजर से बचाया था
पैरों से धीरे धीरे चढा पानी...
घर का दालान
कमरा, रसोई
और आला....
आंखों में डूब रहा था घर
उसने किसी तरह खुद को संभाला
इसी घर की देहरी पर
तो ब्याह कर आई थी
नर्मदा किनारे ब्याह रहे बिटिया
बाबा ने तीन गांव चिट्ठी बंटवाई थी

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दरवाज़े की चौखट तक
पहुंच गया है पानी
अम्मा अड़ गई है....
रेवा से लड़ गई है....
पूछ रही है
तू तो जीने का हौसला देती आई थी
मरने की वजह क्यों अपने सर लेती है
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बह गई परचून की दुकान
पूरा खेत बह गया
बह गया
रमता का मकान
गांव देस बह गया
आंसू पीते हैं
छाती में धौंकनी सी
चलती हैं सांसे
पूछो मत, क्यों जीते हैं
सबर जो बांधा टूट रहा है
घर का खूंटा छूट रहा है.....
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डूबा सिर्फ गांव नहीं
डूबा था स्कूल भी
चॉक बत्ती थी डूबी
थी डूबी स्लेट भी....
मास्टर जी का भी पता नहीं
डूब गए या लगे किनारे
मुनिया पढेगी किसके सहारे
किससे पूछेगी ,
किसने नदी पर बांध बनाया था
नदी को इतना गु्स्सा

मुनिया पर ही क्यों आया था.....

शिफाली

बड़वानी....हरसूद हो रहा है.....आज बड़वानी पर रिपोर्ट बनाई, बांध की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है.....

शिफाली हूं की फेसबुक वाल से 

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शिफाली शिफाली

युवा टीवी पत्रकार औरचर्चित कवि , लेखिका,स्तंभकार ।जो अपनी अलग शैली की रचनाओं के लिए पहचानी जाती है