Wednesday, December 12, 2018
सारा खेल ही कढ़ी का है, कढ़ी-फाफड़ा अहा.....!

सारा खेल ही कढ़ी का है, कढ़ी-फाफड़ा अहा.....!

मीडियावाला.इन।

इंदौर । पिछली बार तो गया और ‘खत्म’ शब्द सुनते ही मैं झल्ला पड़ा क्या यार ये चौथी बार आया हूं।पहली बार मूंग भजिए खाए, फिर कचोरी, तीसरी बार दही बड़े,चौथी बार कढ़ी ही मिली। आखिर किस टाईम मिलते हैं? उसका जवाब था दोपहर में एक बजे के बाद आओ कढ़ी-फाफड़े मिल जाएंगे। 

प्रेस क्लब से निकलते वक्त याद आई और मैंने गाड़ी रानीपुरा (झंडा सिंह उस्ताद व्यायामशाला) की तरफ मोड़ दी, मन में यही विचार चल रहा था आज तो मिल जाना चाहिए।वो जहां रेडिमेड कपड़ों की कतार से दुकानें हैं उन्हीं में से एक दुकान के बाहर फेमस चाट सेंटर के नाम वाले ठेले पर कढ़ी-फाफड़े व अन्य चाट भी 10 रु में मिल जाती है। 

आज तो है ना? उसने हां में गर्दन हिलाई। लाओ दो फटाफट एक प्लेट। डिस्पोजेबल प्लेट में फाफड़े और उसी प्लेट में दोने में गर्मागर्म कढ़ी रख कर मेरी और बढ़ा दी।पता तो था कि कढ़ी गर्म है लेकिन दिल है कि मानता नहीं...और तालू जला बैठे। खैर इससे बढ़कर आनंद था उस स्वाद का।एक बार तो बस कढ़ी तैयार हुई थी, फाफड़े का घान कुछ देर से निकलेगा यह सुनकर अपन ने तो पांच रुपए में एक दोना कढ़ी ही उदरस्थ कर ली थी, लिहाजा कढ़ी के तो चटोरे हो ही गए थे।

अभी जब गर्म कढी में डुबो डुबो कर फाफड़े खाते-खाते मैंने इस डिश को बनाने वाले इंद्रजीत सिकरवार से तारीफ में कहा गजब का टेस्ट है कढ़ी का। सिकरवार के चेहरे की चमक देखने लायक थी, गर्दन में हल्की सी अकड़ के साथ जवाब दिया सारा खेल कढ़ी का ही तो है।(पंगत में जैसे रायते वाले को आते देख फटाक से दोना खाली करते हैं कुछ इसी अंदाज में) मैंने खट से दोना आगे बढ़ा दिया, उसने कढ़ी के तपेले से ढक्कन हटाया और दोने में आधा कटोरी कढ़ी वर्षा कर दी। अपन ने भी बाकी बचे फाफड़े तोड़ कर दोने में डाले और गरम कढ़ी में वो गल के बेसन हों उससे पहले चम्मच से गपक करते गए। हां पहले मुंह (तालु) जला चुके थे (दूध के जले होने से..) इसलिए अब यह एहतियात जरूर बरती कि फिर से कोई कांड ना हो जाए।इंदौर सफाई में नंबर वन है इसका अहसास यहां भी कचरे के लिए रखे कनस्तर से हो रहा था।   

तेल में शायद धीमी आंच पर तले होने से फाफड़े हल्के गुलाबी नजर आ रहे थे।कई होटलों पर तली हुई हरि मिर्च, जिसका स्वाद नीबू-अमचूर आदि से तीखा-खट्टा हो जाता है, के साथ फाफड़े मिलते हैं। गुजराती फरसाण में कढ़ी-फाफड़ा की वैसी ही सदाबहार जोड़ी है जैसे जलेबी-पोहा की अमर कहानी। 

हां जिन लोगों को इन ठेलों वाली चाट से हाइजिन की हिचक हो वो तो स्ट्रीट फूड के चटखारे से दूर ही रहें।

दस रु प्लेट में मूंग भजिए खा लो या दहीबड़ा, दो कचोरी ले लो या एक प्लेट कढ़ी-फाफड़ा।अब और क्या जान लेओगे दस रु में।कभी रानीपुरा से गुजरें और कढ़ी-फाफड़े की याद करते हुए जीभ पानी पानी सी होने लगे तो मन को मारना मत। 
 

1 comments      

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  • vinodkashive 2 months ago
    आपने कड़ी फाफडा को इन्दोरी जलेबी पोहा जैसे गुजरात से निकालकर इसे इन्दोरी बना दिया जिस स्वाद और चटखारे के साथ आपने परोसा है लाजवाब मुह में पानी आगया /

कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


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