Saturday, October 19, 2019
पुस्तक अंशः कलम के सेनापति; तो ऐसी थी हिंदी पत्रकारिता, ऐसे थे संपादक

पुस्तक अंशः कलम के सेनापति; तो ऐसी थी हिंदी पत्रकारिता, ऐसे थे संपादक

मीडियावाला.इन।सैनिकों के घाव दिखते ही उपचार की व्यवस्था होती है, लेकिन संपादक के घाव-दर्द को देखना-समझना आसान नहीं और उपचार भी बहुत कठिन. संपादक की निष्पक्षता और गरिमा से लोग उन्हें ‘स्टार’ मानते हैं, लेकिन उनके संघर्ष की भनक बहुत कम लोगों को मिलती है. इसी पुस्तक से...वरिष्ठ पत्रकार और संपादक आलोक मेहता आजकल टेलीविजन डिबेट का बड़ा चेहरा हैं. कलम की तेज धार और चेहरे पर मृदु मुस्कान उनकी खास पहचान है. मेहता अपनी लेखनी व विचारों में स्पष्टता के साथ ही अपने बेहतरीन संबंधों के लिए भी मशहूर रहे हैं. सत्ता हो या विपक्ष, वे चाहे जिस भी संस्थान में रहे हों, उनकी पत्रकारीय निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठे. राजधानी के पत्रकारिता जगत ही नहीं सियासी जगत में भी आज उनकी अच्छी-खासी धाक है. पर इस संपादक, पत्रकार आलोक मेहता का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ. इसके पीछे एक लंबे अनुभव का भी हाथ है.

 साल 1971 में 'हिन्दुस्तान समाचार' में संसदीय और राजनीतिक मामलों के रिपोर्टर से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले मेहता साल 1976 से 1979 तक दिल्ली में 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' संवाददाता के रूप में कार्यरत रहे. साल 1979 में मेहता का चयन वायस ऑफ जर्मनी, कोलोन के हिन्दी विभाग में संपादक के रूप में हुआ, जहाँ वे 1982 तक रहे. जब भारत लौटे तो साप्ताहिक 'दिनमान' में राजनीतिक संवाददाता के रूप में कार्य करने लगे.

1988 से 1993 तक 'नवभारत टाइम्स' पटना के स्थानीय संपादक के रूप में योगदान देने के बाद दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स समाचार सेवा' के संपादक बने. साल 1994 से सितंबर 2000 तक 'दैनिक हिन्दुस्तान' के कार्यकारी संपादक रहे. अक्टूबर 2000 से जुलाई 2002 तक 'दैनिक भास्कर' के संपादक रहे.फिर नईदुनिया दिल्ली में कार्यभार संभालला, पर इससे पहले वह 'आउटलुक साप्ताहिक' के भी संपादक रहे.

वह एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे. इस पद पर चुने जाने वाले वह हिंदी के पहले संपादक थे. मेहता भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य भी रहे. इसके अलावा वह नेशनल बुक ट्रस्ट, राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और प्रेम भाटिया मेमोरियल ट्रस्ट के न्यासी के साथ-साथ विदेश मंत्रालय की हिंदी से जुड़ी सलाहकार समितियों और यूनेस्को में भारतीय राष्ट्रीय आयोग के सदस्य भी रहे.

आलोक मेहता को उनकी पुस्तक 'पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा' पर साल 2006 में 'भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था. इसी वर्ष उन्हें हिंदी अकादमी का 'साहित्यकार-पत्रकार सम्मान' तथा उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता भूषण पुरस्कार' से नवाजा गया. वर्ष 2007 में उन्हें 'हल्दी घाटी सम्मान' भी मिला. इसके अलावा वह 'राष्ट्रीय सद्‍भावना पुरस्कार', 'राष्ट्रीय तुलसी सम्मान', 'इंदिरा प्रियदर्शिनी पुरस्कार' तथा 'सर्वोत्कृष्ट पत्रकारिता पुरस्कार' से भी नवाजे जा चुके हैं. साल 1999 में उन्हें उनकी पुस्तक 'आस्था का आँगन' पर दिल्ली अकादमी का श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार और सन्‌ 2004 में सप्रे संग्रहालय भोपाल का 'माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता पुरस्कार' भी प्रदान किया गया.

साहित्य आजतक पर पढ़िए हिंदी पत्रकारिता और संपादकों की भूमिका पर लिखी उनकी पुस्तक 'कलम के सेनापति' का अंश. यह पुस्तक मेहता के संस्मरणों के बहाने हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली युग के साथ ही बाजार के दबाव में उसके व्यवसाय के रूप में परिवर्तित हो जाने की गाथा भी है.

पुस्तक अंशः कलम के सेनापति

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