Wednesday, July 17, 2019
हिन्दी लघुकथा:अतीत के पन्नों से

हिन्दी लघुकथा:अतीत के पन्नों से

मीडियावाला.इन।

‘उदंत मार्तण्ड’ में प्रयुक्त खड़ी बोली गद्य का स्वरूप दिखाने के लिए पत्र के जिस अंश को उद्धृत किया था, वह कथात्मक भी है और न्याय व्यवस्था से जुड़े तत्कालीन भारतीय उच्च-वर्ग की मानसिकता का खुलासा करने में सक्षम भी। आज की तारीख में उच्च और परिष्कृत (!) साहित्यिक रुचि से संपन्न विद्वत वर्ग उसे चुटकुले की श्रेणी में रख सकता है। पुस्तक के ‘आधुनिक गद्य:संवत् 1900 से 1925 तक’ खण्ड में शुक्ल जी ने ‘उदंत मार्तण्ड’ को ‘संवाद पत्र’ बताते हुए लिखा है—‘यह पत्र एक ही वर्ष चलकर सहायता के अभाव में बंद हो गया। इसमें 'खड़ी बोली' का 'मध्यदेशीय भाषा' के नाम से उल्लेख किया गया है।’  जिनमें ‘लघुकथा’ की दृष्टि से उल्लेखनीय उद्धरण यह है:
एक यशी वकील वकालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला, ‘हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था, सो आज फैसला हुआ।’ यह सुनकर वकील पछता करके बोला, ‘तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे, तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप कर समझा था कि तुम भी अपने बेटे-पोते-परोतों तक पलोगे; पर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे।’ 
यह रचना ‘ठट्ठे की बात’ शीर्षक तले ‘उदंत मार्तंड’ के आषाढ़ वदी 8 संवत् 1883 अंक में प्रकाशित हुई थी। इस पत्र मे छपी ‘बहुत मोटा और बड़ा आदमी’, ‘लूट की छूट’ आदि शीर्षक रचनाएँ/खबरें भी ‘कथापन’ की दृष्टि से खोज का विषय हैं। ‘ठट्ठे की बात’ शीर्षक इस उद्धृत रचना पर लेखक के तौर पर किसी का नाम उद्धृत नहीं है, लेकिन शोध से जुड़े कुछेक आचार्यों की स्थापनाओं के आधार पर हम इसे ‘उदंत मार्तंड’ के संपादक जुगुल किशोर शुकुल की रचना मान सकते हैं।  क्यों? इसका कारण डॉ॰ रामनिरंजन परिमलेंदु की स्थापना के आधार पर  आगे स्पष्ट कर रहे हैं।
‘उदंत मार्तंड’ के लगभग 41 वर्ष बाद, 5 अगस्त 1867 को भारतेंदु हरिश्चन्द्र द्वारा ‘कविवचन सुधा’ के प्रकाशन काल तक, मौलिक पद्य लेखन के प्रमाण तो खूब मिलते हैं, गद्य लेखन के नाम पर कुछ पुराने ग्रंथों का अनुवाद ही अधिक प्राप्त होता है, मौलिक गद्य-लेखन नहीं प्राय: नहीं मिलता। उदाहरणार्थ, लल्लूलाल ने उर्दू, खड़ी बोली हिन्दी और ब्रजभाषा तीनों भाषाओं में गद्य की पुस्तकें लिखीं। ये संस्कृत नहीं जानते थे। ब्रजभाषा में लिखी हुई कथाओं और कहानियों को उर्दू और हिन्दी गद्य में लिखने के लिए इनसे कहा गया था, जिसके अनुसार इन्होंने 1869 में 'राजनीति' के नाम से हितोपदेश की कहानियाँ (जो पद्य में लिखी जा चुकी थीं) ब्रजभाषा गद्य में लिखीं। हिंदी साहित्य का इतिहास; रामचंद्र शुक्ल; आधुनिक काल (संवत् 1900-1925)  
32 पृष्ठीय ‘कविवचन सुधा’ में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषयों पर निबंध व समाचार होते थे। 
‘उदंत मार्तंड’ के बाद ‘बिहार बंधु’ में छपी कुछ लघु आकारीय कथापरक रचनाओं का जिक्र डॉ॰ रामनिरंजन परिमलेंदु ने एक लेख (‘बिहार का स्वतंत्रता-पूर्व हिंदी कहानी-साहित्य’; परिषद पत्रिका, स्वर्ण जयन्ती अंक:अप्रैल 2010-मार्च 2011; पृष्ठ 261) में किया है। वे लिखते हैं—1874 में ‘बिहार के सर्वप्रथम हिन्दी साप्ताहिक पत्र ‘बिहार बंधु’ में कतिपय उपदेशात्मक लघु कथाओं का भी प्रकाशन हुआ था। इन लघु कथाओं के लेखक मुंशी हसन अली थे जो बिहार के प्रथम हिन्दी पत्रकार थे। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में मुंशी हसन अली पटना नॉर्मल स्कूल के शिक्षक थे। उन्होंने पटना से ‘मोतीचूर’ नामक एक अल्पजीवी मासिक पत्रिका निकाली थी।
‘बिहार बन्धु’, 6 मार्च शुक्रवार 1874 ई॰ (जिल्द 2 नंबर 1) में ‘नयी-नयी खबरें’ शीर्षक स्तम्भ में पृष्ठ 9 कॉलम एक पर समाचार के आवरण में एक लघु कथा छपी थी जो हू-ब-हू भाषा में किसी भी प्रकार का संशोधन किए बिना, अधोलिखित है—
एक ब्राह्मण पश्चिम से अपने घर को जाता था। 20 फरवरी रात के वक्त यड़ या ईष्ठिसन  के नजदीक खोनान ईष्ठिसन में गाड़ी से उतरकर किसी मोदी के दुकान पर सो रहा। सुबह घर चलता हुआ। कईक लाठी वाले बदमाशों ने आकर उसे घेरा और मारा। वह बेचारा विपत्ति का मारा बहुत ही चिल्लाया, पर कौन किस को पूछता है? बदमाशों की बन आई। उसे मारकर जो कुछ पाया, लेकर रफूचक्कर हुए। कौन जाने तुम्हारी महिमा? पढ़नेवालो! कब कौन कहाँ पर किस भान्त और नियमाधीन हो, इस नापायदार संसार को छोड़ें, सो हम में से कोई भी नहीं जानता। इसीलिए सदा ही होशियार रहना और हर रोज सुबह को एक बेर भी अपने पैदा करनेवाले परमेश्वर को स्मरण कर लेना चाहिए।
डॉ॰ परिमलेंदु आगे लिखते हैं—‘बिहार बन्धु’ के अति आरम्भिक अंकों में ‘नीति’ स्तम्भ के अन्तर्गत अनेक लघु कथाएँ प्रकाशित हुई थीं। ऐसी लघु कथाओं में से एक उदाहरण देखें—
एक राजा ने ऐसा मकान बनवाया जिसमें कुछ दोष न था। गृह-प्रवेश के दिन सब बड़े छोटे को न्योता दिया। दरबार में राजा ने कहा कि इस मकान का ऐब कोई आदमी बतलावे तो उसे मैं बहुत कुछ इनाम दूँगा। लोभ के मारे लोग थक गये पर कुछ कह न सके। तब एक साधु बोला कि इसमें बड़ा भारी दो ऐब है। एक तो यह कि एक रोज यह मकान गिर पड़ेगा और दूसरा यह कि एक रोज इस मकान का मालिक मर जाएगा।
लेकिन यह उदाहरण ‘बिहार बन्धु’ के अति प्रारम्भिक अंक से न होकर  7 अप्रिल 1874 ई॰ (जिल्द 2 नंबर 5, पृष्ठ 33 कॉलम 3) से है यानी ऊपर उद्धृत लघुकथा के लगभग एक माह बाद का। डॉ॰ परिमलेंदु के इस लेख में कहीं भी यह जिक्र नहीं है कि ‘बिहार बन्धु’ में प्रकाशित कथित लघु कथाओं के शुरू या आखिर में कहीं भी, मुंशी हसन अली का नाम लिखा है अथवा नहीं? लेकिन एक अन्य संदर्भ में, (इस लेख के पृष्ठ 262 पर) यह पैरा विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—
1878 ई॰ में दामोदर विष्णु सप्रे की ‘चंचनाही औरत’ शीर्षक मौलिक हिन्दी कहानी का प्रकाशन हुआ था। इस कहानी का प्रकाशन पटना से प्रकाशित ‘बिहार बन्धु’, 16 अक्टूबर बुधवार 1878 ई॰ (जिल्द 6 नंबर 42) में हुआ था। इसके लेखक का नाम कहानी के आरंभ अथवा अंत में प्रकाशित नहीं किया गया था। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में संपादक ही प्राय: सम्पूर्ण अंक का लेखक होता था। अन्य लेखकों की रचनाएँ प्रेरित प्राप्त, प्रेरित पत्र, चिट्ठी-पत्री आदि स्तम्भों में लेखक के  नाम सहित प्रकाशित की जाती थीं। शेष रचनाओं में लेखक के नाम का प्रकाशन नहीं किया जाता था। अतएव, इसका रचनाकार ‘बिहार बन्धु’ का तत्कालीन सम्पादक ही था। 
यह तर्क काफी हद तक माना जा सकता है कि ‘उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में संपादक ही प्राय: सम्पूर्ण अंक का लेखक होता था।’ अनेक ‘सिंगल हैंडेड’ पत्रों में यह स्थिति इस इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में यानी 1874 ई॰ से लगभग 144 वर्ष बाद 2018-19 में आज भी हो सकती है। लेकिन फारसी और देवनागरी, दो लिपियों में छपने वाले ‘बिहार बन्धु’ साप्ताहिक अखबार के बारे में कु्छ तथ्य और भी हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। 'जयंती स्मारक ग्रंथ' में राधाकृष्ण प्रसाद द्वारा लिखित ‘बिहार की हिन्दी पत्रिकाएँ’ शीर्षक लेख में पृष्ठ 574-575 पर यह जानकारी छपी है, कि--'बिहार बंधु' के संचालक मदन मोहन भट्ट तथा संपादक हसन अली थे। दोनों बिहारशरीफ के ही रहने वाले थे। इस लेख में वर्णित है कि वर्ष 1872 में पंडित केशव राम भट्ट तथा पंडित मदन मोहन भट्ट के सहयोग से 'बिहार बंधु' नामक साप्ताहिक पत्र बिहारशरीफ से निकाला जाता था। इसका प्रकाशन बिहारशरीफ से और मुद्रण श्री पुरण प्रकाश प्रेस कोलकाता से होता था।  इस संदर्भ में एक अन्य लेख में एन॰ कुमार लिखते हैं--‘1872 से 73 तक भट्ट बंधुओं के सहपाठी मुंशी हसन अली इसके संपादक रहे। उन दिनों हिंदी पत्रकारिता कुछ लोगों के लिए मिशन थी। केशवराम भट्ट उनमें से एक थे। वे खबरें इकट्ठा करने से लेकर प्रूफ रीडिंग एवं छपाई-वितरण का सारा काम स्वयं करते। इस कार्य में उनके परिवार के लोग भी मदद करते।’एन. कुमार, जर्नलिज्म इन बिहार, पृष्ठ 42  धीरेन्द्रनाथ सिंह ने भी लिखा है--'बिहार बंधु' की छपाई एवं वितरण में उनके घर की औरतें भी मदद करती थीं।  इसकी भाषा उर्दू-हिन्दी-मिश्रित थी। अखबार आधा फारसी और आधा देवनागरी लिपि में छपता था। धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, पृष्ठ 164 
सन् 1942 में पुस्तक भंडार, लहेरियासराय के ‘जयन्ती स्मारक ग्रन्थ’ में ‘हिन्दी गद्य निर्माण में बिहार का हाथ’ शीर्षक अपने लेख में पंडित सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ ने लिखा है कि ‘बिहार बन्धु का प्रकाशन सन् 1873 में हुआ।‘हमारी विदाई’, जयन्ती स्मारक ग्रन्थ, लहेरियासराय, 1942, पृष्ठ 537  और रामजी मिश्र ‘मनोहर’ ने लिखा है-‘....1873 में ‘बिहार बन्धु’ नाम का हिन्दी पत्र निकला जिसके द्वारा लगातार तीस वर्षों तक पं. केशवराम भट्ट ने हिन्दी की शैली परिमार्जित करने का अथक प्रयत्न किया। जो पौधा बीसवीं सदी के प्रारंभ में ‘सरस्वती’ ने उगाया उसका बीज चालीस साल पहले ही भट्ट जी ने बोया, सींचा और पनपाया था। भट्ट जी बाबू हरिश्चन्द्र के समकालीन थे। वे भारतेन्दु के साथ हिन्दी की उन्नति में योग देनेवालों में विशेष उल्लेख योग्य हैं।’ (सरस्वती, प्रयाग, भाग 13, अंक 8, अगस्त 1912, पृष्ठ 418; रामजी मिश्र ‘मनोहर’, बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास, के.पी. जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 1998, पृष्ठ 55।)
अत: (यदि लेखक विशेष का नाम ‘बिहार बंधु’ के पन्नों पर प्रकाशित कथित लघु कथाओं के साथ नहीं छपा है तो) यह मानना कि ‘बिहार बंधु’ के सम्पादकीय अथवा अन्य पन्नों पर प्रकाशित लघु आकारीय कथाएँ मात्र मुंशी हसन अली द्वारा लिखित हैं, गलत होगा; क्योंकि इससे ‘केशवराम भट्ट और उनके परिवार की औरतें भी ‘बिहार बंधु’ की छपाई आदि में मदद करती थीं’ जैसे तथ्यों की अनदेखी सिद्ध होती है। 
बहरहाल, यह प्रसन्नता की बात है कि ‘हिन्दी की पहली लघुकथा’ की खोज का कार्य निरंतर प्रगति पर है। कुछ समय पहले, स्वयं मैंने ही अपने एक लेख में भारतेंदु हरिश्चन्द्र की पुस्तक ‘परिहासिनी’ (अभी तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर जिसका प्रकाशन काल 1876 का प्रतीत होता है) में छपी ‘अंगहीन धनी’ और ‘अद्भुत संवाद’ को हिन्दी की प्रथम लघुकथाएँ माना था; लेकिन नये शोधों से स्पष्ट है कि ‘उदंत मार्तण्ड’ में प्रकाशित लघु आकारीय कथा के पश्चात् लघु आकारीय कथाएँ ‘बिहार बंधु’ के अंकों में मिलती हैं, लेकिन इनके लेखक का नाम अनुमान और स्व-निर्मित सिद्धांत पर आधारित है, तथ्यों पर आधारित नहीं है। इन दो के बाद तीसरा नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तक ‘परिहासिनी’ का लिया जाता है जिसे उसके शीर्ष पर अंकित कुछ शब्दों के आधार पर संदेह के घेरे में ले आने की जिद है। जो भी हो, ‘उदंत मार्तंड’  और ‘बिहार बंधु’ में प्रकाशित रचनाओं से अलग ‘परिहासिनी’ की रचनाओं का पुस्तक रूप में उपलब्ध होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहाँ उस संकलन से उद्धृत है, ‘अंगहीन धनी’ शीर्षक यह रचना, जोकि ऊपर उद्धृत दोनों रचनाओं के अनुरूप ही अपने समय के सरोकारों से युक्त है--
एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।
और नौकरों ने पूछा, “क्यों बे, हँसता क्यों है?”
तो उसने जवाब दिया, “भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।”                                                                                   <<<

 

 

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