Monday, August 26, 2019
पर्यावरण संरक्षण की भावना से ओतप्रोत निमाड़ी लोक संस्कार

पर्यावरण संरक्षण की भावना से ओतप्रोत निमाड़ी लोक संस्कार

मीडियावाला.इन।

लोक संस्कृति मर्मज्ञ डॉ सुमन चौरे,

 

जल से लबालब भरे  नदी-सरोवर, हरे-हरितम वृक्षों से बसे वन-उपवन, मुक्त बहती सुरभित पवन, मधुर कोल-किलोल करती मनोहर मंजुल पखेरूओं की जोड़ियाँ, सब कुछ हमारे लोक की अपनी निजी सम्पदा हैं। लोक ने इस धरा की रक्षा की, सबकी सेवा की और इस सम्पदा, इस धरोहर को संरक्षित रखा अपनी अगली पीढ़ि के लिए। लोक का विश्वास है, यह सब, मानव जाति, जीव जगत के लिए ईश्वर का वरदान है।

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लोक ने इस प्राकृतिक सम्पदा का उपयोग तो किया पर उपभोग नहीं किया (जितना धरती से लिया उससे दूना दिया) जो लिया उसको वन्दन कर उपकृत भाव से लिया लोक ने अपनी रीतियों और परम्पराओं में, आस्थाओं में समग्र रूप से अपनी प्रकृति को समाहित किया। पारिस्थितिक तंत्र (ईकोसिस्टम) के प्रति लोक की संवेदनशीलता अपने जीवंत रूप में विभिन्न लोक संस्कारों में प्रतिबिम्बित होती है। कोई भी अवसर हो पूजा-पर्व हो, मंगल-अमंगल हो, संस्कार हो, प्रकृति के आह्वान के बिना कार्य के श्री गणेश की कल्पना भी नहीं की। संस्कारों में गर विवाह संस्कार की बात करें, तो यह एक विस्तृत रूप लिए लोक में विद्ममान है। संस्कार तो भले ही शास्त्रोक्त होता है; किन्तु इसके साथ अनेकानेक परम्पराएँ सन्निहित है। लोक ने परम्पराओं को संस्कारों का पूरक ही रखा। विवाह संस्कार जब सम्पन्न होता है तब उसमें ‘मण्डप’ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विवाह मण्डप का सूक्ष्म अध्ययन किया जाय तो इसमें प्राकृतिक विविधता के दर्शन होते हैं।  इसलिए हमारी समस्त चेतन प्रकृति के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। परम्पराओं के साथ लोकगीतों में इनके नाम ले-लेकर उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है। इन गीतों में विविध वनस्पतियों का उल्लेख किया जाता है। 
मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में विवाह कार्य के सम्पूर्ण विधान मण्डप में ही सम्पादित किए जाते हैं। इस मण्डप में जहाँ वनस्पति और औषधीय जड़ी-बूटियों की पूजा की जाती है, वहीं जैव-विविधता के दर्शन होते हैं। लोकगीतों में मण्डप निर्माण में आने वाली वस्तुओं के नाम लेकर उनकी वन्दना की जाती है-
            ओ म्हारा हरिया मण्डप मानS जड़ावS का रेS मण्डवा 
            करूँ थारी आरती 
            क्वारी जो गौआS को गोबर मँगाया
            नागर वेली पानS का तोरणS लगाया                           
            गजS मोतियन का चौक पुरायाS                                    
            जल जमुना का कलशS भराया, माई रेवा का कलशS भराया।           
            नाँदणS कपासS का बाती वटाया
            सुवरणS दीपक जोति गमकाया 
            करूँ थारी आरती...
भावार्थ: हे मेरे हरिया मण्डप, तेरा श्रृंगार रत्न जड़कर किया गया है, तेरी आरती उतार रही हूँ। क्वारी गाय के हरे गोबर से मण्डप की भूमि को लीपा गया। गज मुक्ताओं से चौक पुराया गया। जमुना और नर्मदा माई के जल से कलश भरे गए। नागरवेली पान का तोरण लगाया गया है। नाँदण कपास की बत्ती बनाई है, जिसको स्वर्ण दीपक में रखकर प्रदीप्त किय है। हे मण्डप मैं तेरी आरती करती हूँ।
निमाड़ में मण्डप निर्माण में चार खम्ब प्रमुख रहते हैं जो आम की लकड़ी के होते हैं। साथ में एक-एक लकड़ी साळई, अंजन, नीम और साल की लगाई जाती है। अंजन वृक्ष की विशेषता है कि वृक्ष से कटने के बाद भी इसकी शाखाओं पर नई कोपलें फूट पड़ती है और शाखा नए बड़े पत्तों से हरी भरी हो जाती है। मण्डप का प्रवेश द्वार दो हरे बाँसों से बनाया जाता है। इस द्वार पर कच्चे सूत के लाल-सिंदूरी-पीले कलावा में आम के पत्ते गूँथकर दोनों बाँसों से तोरण बाँधा जाता हैं। चौखम्बा के मण्डपके ऊपर तूअर की सूखी काठी  डालकर उसपर नीम, आम एवं जामुन के पत्तों की छत्रछाया बनाई जाती है। जिससे मण्डप ठंडा और हरा-भरा रहता है। 
मण्डप के चारों खम्बों के सहारे चारों तरफ मण्डप का तोरण कास की रस्सी एवं कच्चे सूत में बड़,पीपल, आम, जामुन और पान के पत्ते पिरोकर बाँधा जाता है। इस विधि के सम्पादन के  अवसर पर महिलाएँ लोक गीत गाती हैं। जिसमें यह भाव है कि “हे वन के वृक्षों, मैँ तुम्हें अपने  मण्डप में आने का निमंत्रण देती हूँ। मैंने आज तक तुम्हारी सेवा की है, अब अवसर आया है, कि तुम उपस्थित होकर हमारे मण्डप को शोभायमान करो।
        हाँS जी म्हारा मानS मनौती का माण्डवाS....
        मैं तोहे पारसS पिप्पळS  सेवियाS.....
        थारा पानड़ाS हो म्हारा माण्डवाS जोगS...
        मैं तोहे अख्खई वड़S सेवियाS...
        थारा पानड़S हो म्हारा माण्डवाS जोगS
        मानS मनौती का माण्डवाS, जड़ावS का रे माण्डवाS
        मैं तोहे हरिया वासS सेवियाS-
        म्हारा माण्डवाS का तोरणS जोगS-
        मैं तोहे जलS रोस्या सेवियाS
        थाराS पूळानS हो म्हारा माण्डवाS जोगS
        मानS मनौती का माण्डवाS जड़ावS का रे माण्डवा,
        मैं तोहे लीमS अम्बाS सेवियाS                                        
        थारो पानड़ाS नS हो मण्डप छावणS जोगS
        मैं तोहे हरिया जामुणS सेवियाS
        थारा पानड़ा नS हो मण्डप छावणS जोगS
        मान मनौती का माण्डवS, जड़ावS का रे माण्डवाS

भावार्थ- हाँ जी, मेरा मण्डप बड़ा मान मनौती का है। हे पारस पीपल, मैंने तेरी सेवा की है, तेरे पत्ते मेरे मण्डप के तोरण योग्य हैं। हे अक्षय वट, मैंने तेरी सेवा की हैच तेरे पत्ते मेरे मण्डप के योग्य हैं। हे हरिया वन के बाँस मैंने आपकी रक्षा की, आप मेरे मण्डप के तोरण खम्ब बनने योग्य हो। हे आम-जामुन-नीम मैंने आपकी सेवा और रक्षा की है, आप मेरे मण्डप के शोभा बनिए।
मण्डप के छत्र के निर्णाण के बाद इससे आच्छादित भूमि को क्वारी गाय के हरे गोबर से लीपकर, उस पर लाल गेरू से डीक (पट्टी) बनाकर उस आँगन में सफ़ेद मिट्टी से चौक पूरे जाते हैं। मण्डप खम्ब को गेरू से रंगकर उस पर चावल पीसकर उसके सफ़ेद घोल से आम्रवृक्ष की आकृति बनाई जाती है। साथ ही गेरू से रंगे बाँस पर वनदेवी की पुतली बनाकर पूजा की जाती है।
मण्डप निर्माण के बाद मण्डप की प्रतिष्ठा की जाती है। इसमें सप्त धान्य, सप्त नद, सप्त सिन्धु, सोलह मातृका, नवग्रह, नवरत्न का आह्वान कर उनकी प्राण प्रतिष्ठा कर पूजन किया जाता है। नव मेवा, मण्डप शान्ति हेतू सामग्रियों में पंच पुष्प, पंच फल, पंच द्रव्य- गोरस, गोमूत्र, गोबर, गोघृत, दधि तथा मधु सहित समस्त सामग्री से पूजा की जाती है। हर खम्ब के आसपास गोलाकार में  गेहूँ बोए जाते हैं। मण्डप की शान्ति हेतु वर के माता-पिता या घर का कोई भी सदस्य पति-पत्नी पूजन करता है। मण्डप की सुहावनी छटा इस लोकगीत में देखिए- 
भले मोरे मण्डुवाS रळक रह्यो दस मासS तोS 
झिरS-मिरS हो पियुजी, झिरS-मिरS वरसेS छेS नेघS तो
नानी मोठी बून्द निपाSजी।
मण्डप लागS सुहावणोजी,
दोयS मिलS हो पीयुजी दोयS मिलS।
बढ्या सरवरS पाळS तो, सरवरS लागS सुहावणो जी
तुमS ओकाS पीयुजी तुमS हो,
सरवरS केरा हँसS तो वाS धनS सरवरS हंसिणी जी।
तुमतो ओकाS पियुजी,तुमS हो,
पर्वत केरा मोरS तो                                              
वा धनS पर्वत मोयड़ीS जी
दोयS मिलS हो पियुजी, दोयS मिल बढ्या
परवत मॉयS, तो परवतS लागS सुहावणों जी,  
भावार्थ- मण्डप बहुत मनोरम लग रहा है। मण्डप की अनुपम छटा देखने लोग आ रहे हैं। झिरमिर-रिमझिम मेघ बरस रहा है, छोटी मोटी बून्दें मण्डप पर बरस रही हैं, जिसके मण्डप मनोरम लग रहा है। दोनों पति-पत्नी मण्डप की पूजा करते ऐसे शोभायमान हो रहे हैं जैसे सरोवर में हंस और हंसनी का जोड़ा। मण्डप की सुन्दरता और भी निखर उठी है, जब दोनों पति-पत्नी मिलकर मण्डप का अनुष्ठान पूजन कर रहे हैं। वे दोनों ऐसे मनोहारी लग रहे हैं जैसे पर्वत पर मोर और मोरनी साथ में किलोल कर रहे हों। मण्डप की पूजन के अवसर पर और भी कई लोक गीत गाए जाते हैं। जिन गीतो में उन सब वस्तुओं का नाम लिया जाता है जिन वस्तुओं से मण्डप निर्माण से लेकर पूजन पद्धति तक का वर्णन होता है।
वर जब घर से बरात लेकर जाता है तब उसकी माँ अपने वर पुत्र परछन करती है। फिर वर जब पाणिग्रहण संस्कार के लिए मण्डप में उपस्थित होता है, उस अवसर पर वधु की माँ तोरण में वर का परछन करती है। इस अवसर पर वह जिन वस्तुओं से परचन करती है उसमें औषधीय जड़ी बूटियाँ, गोरस, कृषि संबंधी उपकर ही रहते हैं। 
हरिमाई असो म्हारया नित नवोS होयS
साँवळाS हरिS नी आरती जीS
लाओ रेS जंगल रोयस्योS
पड़छोS तेS जदूपति रायS
हरि माई लावो धैय्याँ बिलोवणी 
पड़छो तेS जदुपति रायS 
हरिमाई लाओ रे साळ फटकणूS
पड़छोS ते जदुपति रायS
हरिमाई लाओ रे सूतS को ओटणूS
पड़छोS तेS जदुपति रायS
हरिमाई लाओ रे दाळS को कूटणूS
पड़छोS तेS जदुपति रायS 
हरिमाई असो म्हारय नितS नवो होयS
सावळा हरिनी आरती जी
भावार्थ- हे माँ मेरे घर ऐसा नित्य हो नवीन हो कि मैं अपने पुत्र की यदुपति कान्ह  आरती करूँ। मुझे जंगल की रोशिया घास ला दो, जिससे मैं कान्ह का परछन करूँगी। इस घास से स्पर्श से यदुपति के काया की पीड़ा दूर हो जाएगी। मुझे साल झटकने का उपकरण अर्थात सूप ला कर दो मैं कान्ह का परछन करूँगी। 
मुझे सूत कातने का तकुआ लाकर दो जिससे मैं कान्ह का परछन करूँगी। हे माँ मुझे दही मथने की बिलौनी दो जिससे मैं अपने पुत्र का परछन करूँगी। हे माँ मुझे दही मतने की बिलौनी दो जिससे मैं अपने पुत्र का परचन (नजर उतारना) करूँगी। मुझे दाल कूटना अर्थात मूसल लाकर दो सिससे में कान्ह का परछन करूँगी। मेरे घर नित नवीन कार्य हो। मेरे घर जदुपति की मैं आरती उतारूंगी। माँ यशोदा अपने लाड़ले का परछन करती है कि सुन्दर पुत्र को नजर न लगे बिदा करते हुए माँ अपने पुत्र को हल्दी की गाँठ, पान का पत्ता ताँबे का सिक्का सिर के बाल दि नाड़े में गाँठ लगाकर कलाई में बाँध कर देती ही एवं हाथ में नीम की जाल देकर दही खिलाकर बिदा करती है।

पाणिग्रहण के पूर्व और मण्डप प्रतिष्ठा अनुष्ठान पूर्ण होने के पश्चात् लोक परम्परा के अनुसार वर के मामा पक्ष के सदस्य अपनी बहन एवं उसके परिवारजनों को वस्त्राभूषण भेंट करते हैं। उस अवसर पर जो लोकगीत गाए जाते हैं उनकों ममेरा चीगट कहते हैं। तब बहन अपने भाई को अपने घर का परिचय देती है-
बयणीS का आँगणा S मंS पीपळई रेवीरा S...
चुन्दड़ S लावजे।
म्हारा हरिया वास S को माण्डवो S
जेम S छाया S जामुण S का पाल म्हारा वीरा...
चुन्दड़ लावजे S।
भावार्थ- हे भाई तेरी बहन के आँगन में पीपल का वृक्ष है। तुझे पहचानने में देर नहीं लगेगी। मेरे आँगन में हरिया बाँस का मण्डप है, जिसपर जामुन की पत्तियों की छत्रदार छाया है। तू मेरे एवं परिवार के लिए चूनर लेकर आना।
लोक का आग्रह सदैव प्रकृति से जुड़े रहने का ही रहता है। प्रकृति से तादात्म्यभाव स्थापित कर 
वह अपने को सदैव प्रतृतिस्थ ही पाता है। मण्डप के गीत में यही भाव बुना हुआ है। 
म्हारा हरिया मण्डप माँय S।
झड़ाको लाग्यो रे दुई नयणा S सी
म्हारा बाप S अख्खई वड़S / झाड़को लाग्यो रे दुई नयणा रे..
म्हारी सासु सरसती नद्दी वयS..
म्हारी माँय गंगा केरो नीर S.. झाड़को लाग्यो रे दुई नयणा रे..                 
म्हारा स्वामी अगतो सूरिमळ S
म्हारो पुत्र रत्म केरो दीप S झाड़को लाग्यो रे दुई नयणा रे..
म्हारी ववू वरS आँगणा की दुरपली,
म्हारी दीय S केळई रो गोड़ S...
झाड़को लाग्यो रे दुई नयणा रे.. 
भावार्थ- हे मेरे हरिया मण्डप मेरे दो नयना अर्थात् पीयर-सरुराल दोनों पक्ष इस मण्डप के आनन्द में सरोर हो रहे हैं। मेरे ससुर पीपल जैसे गहरे सबको सुख पहुँचाने वाले हैं। मेरे पिता अक्षय वट की तरह सबको छाया देने वाले हैं। मेरी सास गंगा सी पवित्र और मेरी माँ सरस्वती  नदी सी निर्मल है। मेरा पति उदयमान सूर्य से है। मेरा पुत्र र्तम सा दप दिपाता दीपक है। मेरी बहु आँगल की परितमा दुर्वा है और मेरी बेटी केल की गोड़ जैसी है। मेरे आँगन में आनन्द की रनक है। मेरा हरा भरा मण्डप परिवार की समृद्धि बरसा रहा है। इस लोक गीत  प्रकृति की वन सम्पदा के हरेक गुण बखान किया गया है। पीपल और वट हमारे देव तुल्य हैं, गंगा-सरस्वती जीवन अधूरा हैं, सूर्य तो जीवन का आधार है। दुर्वा एवं केल अपने आप ही बढ़ती-फैलती हैं, जिससे दुर्वा, केल और बाँस सब वंश वृद्धि के प्रतीक हैं।
मण्डप के मध्य में गंगाल (ताँबे का पात्र) में जल भरकर रखा जाता है।इस जल में सप्त सिंधु- सप्त नदियों का आव्हान किया जाता है। इस गंगाल के आमने-सामने दूल्हा-दुलहन को बैठाया जाता है। फिर दूल्हे के हाथ में दुलहन का हाथ सौंपकर उसपर जल डालकर कन्यादान कर पाणिग्रहण संस्कार संपन्न करवाया जाता है। जल की साक्षी में जीवन का नया अध्याय प्रारंभ करने की यह एक लोक परम्परा है। जीवन के लिए जल शाश्वत है, यह एक गुप्त संदेश भी है।
विदाई के पूर्व एक बड़ी ही मार्मिक परम्परा है। जिसे अम्बो छिछणू कहते हैं। अर्थात् आम्रवृक्ष के सींचना। बेटी विदा होने के पहले अपने बाग-बगीचे लता-वृक्ष सींचे बिना नहीं जाती। लोक का यही प्रकृति प्रेम है इसने पर्यावरण तो संरक्षित रखा ही, प्रकृति से तादात्म्य भाव स्थापित कर उसके पूरक रहा। लोकगीतों में यही भाव गाए जाते हैं। 
फूड़ला बिणन्ति तू चली ओ लाड़कली S 
आपणा पिताS जी की बागS मंS
कछु हो बिण्या, कछु बिणवा हो लाग्या,
एतरां मंS आया दुल्लव रायS जी,
चलो लाड़कली तुम बठो पालकड़ीS,
चलो ते अपणाS, देश जीS
जवंS म्हारा आजा जी अम्बो सियाड़्यS
तवS जाई जावाँ तुम्हरा  साथS जी।
भावार्थ- अपने पिताजी की लाड़कली बेटी बाग-बगीचों में फूल चुन रही थी। इतनी ही देर में दूल्हे राजा आ गए। दूल्हे राजा ने कहा "हे पिता की लाड़कली बेटी तुम पालकी में बैठकर अपने देश चलो।" तब दुलहन बोली "हे स्वामी मेरे दादाजी के साथ बागों में जाकर पहले आम्रवृक्ष और अन्य वृक्षों को जल से सींचूंगी तब आपके साथ चलूंगी।"
इस गीत में कितना कोमलकान्त भाव है कि बेटी अपने बाग-बगीचों को सींचे बिना नहीं जाएगी। वहीं वृक्षों से फूल तोड़ने की बात नहीं अपितु वृक्षों से झरे हुए फूलों को चुनने की बात कही गई है।
लोक परम्परा की इस रीति का प्रतिबिम्ब सैकड़ों वर्षों पहले के महाकवि कालिदास के महाकाव्य 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' में भी दिखता है। कण्व ऋषि के आश्रम से राजा दुष्यंत के साथ विदा होने के पहले शकुन्तला ने वृक्ष और बेलों को सींचकर गले से लगाया और आश्रम के पशु-पक्षियों से मिलने के बाद अश्रुपूरित नयनों से विदा हुई थी। 
 मण्डप से विदा होते समय बेटी अपने दोनों हाथों में ज्वार और धान लेकर पीछे मुड़े बिना यह ज्वार और धान घर में फेंकती हैं। ये इस  बात का प्रतीक है कि बेटी की यह कामना है कि उसके पिता का घर अन्न से भरा रहे। इस अवसर पर एक गीत गाया जाता है जिसमें वन के बाँस की बाँसुरी की बेटी की विदाई से तुलना की है। 

हराS नीळा वासS की बांसुरी
वाS भी बाजती जायS
मोठा जी भाई की बैण छे लाड़कलीS
वाS भी सासराS जाय।
भावार्थ- हरे ताजे बाँस की बांसुरी बजती जा रही है। बांसुरी को बजना ही है। ऐेसे ही बड़े भाई की बहन को ससुराल जाना ही है।
बेटी की विदा के बाद माँ अपने पल्लू को कच्चे दूध में डुबोकर मंडप के खम्बों के पास एवं द्वार पर रोपित गेहूँओं को सींचती है। लोक ने रीति-रिवाज़ अपने आचरण में गूँथ लिए हैं। यही प्रकृति संरक्षण का मन्त्र है।
विवाह के पश्चात् दूल्हे का घर हो या दुलहन का मण्डप उठाने की परम्परा एक ही है। इसकी अवधि सवा महीना या सवा साल होती है। सवा साल बाद जब मण्डप उठाया जाता है तो अंजन वृक्ष का खम्ब हरा भरा हो उठता है। जो आँगन में एक वृक्ष बनकर विवाह को यादगार बना देता है। मण्डप उठाने के अवसर पर गीत गाया जाता है-
मण्डुवा के राजाS मोठा जी भाई उमरावS  
नानाजी भाई उमरावS
नित उठी डोंगरS जावियाS
डोंगरS रह्यो रे लहरायS    
मोठी ववूS नितS सींचीयाS
भली करी रे म्हारा हरिया डोंगरS
थारी नित उठी करS ववूS चाकरी।
तुनS म्हारी शोभा निपजियाS।
भावार्थ- मण्डप के राजा बड़े और छोटे भाई हैं। नित्य उठकर सबसे पहले जंगल की देखरेख के लिए जाते हैं। जंगल हरा-भरा घना हो रहा है। बड़ी बहू प्रतिदिन उन वृक्षों को सींचती और सेवा चाकरी करती है। हे हरिया जंगल तूने बहुत भला किया। तेरे वृक्ष, पत्ते, फूल-फल से मेरे विवाह मण्डप की शोभा निखर उठी। 
लोक से संबद्ध प्रत्येक परम्परा के पर्यावरणीय पहलू को तो यहाँ उल्लेखित नहीं किया जा सकता है। एक प्रतिनिधि संस्कार के रूप में विवाह संस्कार की परम्पराओं के पर्यावरणीय उत्प्रेरक तत्व को प्रकाश में लाने का प्रयत्न किया है। विवाह संस्कार से एक नयी जीवन यात्रा का शुभारंभ माना जाता है। प्रकृति के उपहारों से आच्छादित विवाह संस्कार की परम्पराओं के माध्यम से लोक  नयी यात्रा प्रारंभ करने वाले युगल को स्पष्ट संदेश देना चाहता है। गणगौर का महालोकपर्व हो या वट सावित्री पूजन और आँवला नवमी या फिर मकर संक्रांति जैसी विविध परम्पराएं ये सब लोक द्वारा प्रकृति के साथ अपने दीर्घकालीन अनुभवों द्वारा पोषित हैं। आवश्यकता इस बात की है कि लोक परम्पराओं को केवल एक सामाजिक या सांस्कृतिक मजबूरी मानकर ही पूरा न किया जाए अपितु इन्हें मनाने के पीछे के चिंतन को समझा जाए। जो कि लोकजीवन के हर अंग को प्रत्यक्षरूप से पर्यावरण से संबद्ध करता है।
लोक में समझ है कि प्रकृति हमारे जीवन का प्राथमिक स्रोत है। इसलिए लोक ने इन वस्तुओं को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया। लोक ने न कोई नारा दिया कि प्रकृति की रक्षा करो या पर्यावरण बचाओ अपितु असने  मन-प्राण से उनकी सेवा की, रक्षा की, और अपनी परम्पराओं और संस्कारों में उनकी उपस्थिति अनिवार्य बना ली। अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया या यूँ कहें कि तन-प्राण का संबंध लोक ने प्रकृति में पाया। इसलिए आजतक जो परम्पराएँ रहीं, स्वस्थ रीतियाँ रहीं तो हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहा। अब हम उपयोग नहीं उपभोग की नीति पर  गए हैं इसलिए जीवन से नहीं वनस्पति से नारों का संबंध स्थापित करने लगे।

डॉ. श्रीमती सुमन चौरे,
13, समर्थ परिसर, ई-8 एक्सटेंशन,
बावड़िया कला, भोपाल.
PINCODE 462039

09424440377
09819549984

 

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