Monday, October 14, 2019
ग़ज़ल

ग़ज़ल

मीडियावाला.इन।

इस दुनिया मे क़दम-क़दम पर अजब-ग़जब क़िरदार मिले
कुछ   जीने  को  मरते,  कुछ  मरने   हरदम  तैयार  मिले।

सच   के  बंदे   देखे   सच   पर   जीते  सारे  दुख  सहकर
उनकी    बदहाली   पर   हँसते   झूठों   के  सरदार   मिले।

काजल  आँख  से  चोरी  कर  लें, पता  आपको नहीं चले
ऐसे-ऐसे   हुनरमंद,    होशियारी    के    अवतार     मिले।

हुआ   गर्व  से यह  सिर  ऊँचा  कुछ  'छोटों'  के कर्मों पर
हमको   आयी  शर्म  'बड़े'  कुछ  ऐसे  भी  मक्कार  मिले।

"सिस्टम"  को  कुछ  बदकारों  ने  बना  लिया अपनी चेरी
कुछ  अच्छा   करने   को  तत्पर  लोग बहुत लाचार मिले।

मुझे   पूछने   हैं   सवाल   कुछ,   टेढ़े-से,  कुछ    सीधे-से
अगर   बनाने   वाला   जग   को  मुझे कहीं  एकबार मिले।

नाचें   ठुम्मक-ठुम्मक    देहली   पर   सत्ता   की   बे-कपड़े
ऐसे   भी   कुछ   धनी  कलम  के और कई  फ़नकार मिले।

कुछ    संसारी   देखे,   जिनके   भीतर   था   संसार    नहीं
और    कहीं   वैरागी   के   मन   मे   सौ-सौ   संसार   मिले।                                                                  दिनेश मालवीय "अश्क"

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दिनेश मालवीय

जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ पद से सेवानिवृत ,वरिष्ठ साहित्यकार ,गजलकार श्री दिनेश मालवीय का हिंदी ,उर्दू ,अंग्रेज़ी पर समानाधिकार .श्रेष्ठ अनुवादक के रूप में कई महत्वपुर्ण साहित्यिक ,धार्मिक ,सामाजिक ग्रंथों का अनुवाद कर ख्याति एवं सम्मान अर्जित किया सभी विधाओं में लेखनरत