Wednesday, December 12, 2018
मंच वाले सरोजकुमार के इस कवि रूप ने चमत्कृत कर दिया

मंच वाले सरोजकुमार के इस कवि रूप ने चमत्कृत कर दिया

कवि सरोजकुमार का ‘शब्द तो कुली हैं’ काव्य संग्रह करीब तीन साल पहले प्रकाशित हो चुका है, ज्यादातर साहित्यकारों ने उनके इस संग्रह को पढ़ा भी है लेकिन उसी संग्रह से जब सरोज कुमार कुछ कविताएं सुना रहे थे तब इराक (इंदौर रायटर्स क्लब) की गोष्ठी में चाहे राजकुमार कुंभज हो, दादा कृष्णकांत निलोसे या व्यंग्यकार जवाहर चौधरी हों, सुनने वाले उनके अंदाज से, कविताओं के भाव से चमत्कृत नजर आए।किसी कवि का काव्यसंग्रह पढ़ना और उन्हीं कविताओं को खुद कवि से सुनना-जमीन आसमान जितना यह फर्क पूरे वक्त महसूस होता रहा।कवि सम्मेलनों के संचालक के रूप में इंदौर के सरोज कुमार और सत्यनारायण सत्तन की सात समंदर पार तक पहचान है। सरोजकुमार जी की इन कविताओं पर जब चर्चा का दौर चला तो खुद सरोजकुमार ने स्वीकारा कि हजारों हजार श्रोताओं वाले कवि सम्मेलन में भी इन्हें इतना ही पसंद किया जाय यह जरूरी नही क्योंकि वहां सुनने आए लोगों का मिजाज अलग रहता है। 

गुलाब प्रदर्शनी, साइकल से लेकर तांगे,टेंपो, रिक्शा, कार से सफर, पगडंडी, मेरा गुस्सा, कवि की चेतना,चादर के हिसाब से पांव पसारे, मैं जब अपने से बातें करता हूं, खिड़की आदि कविताओं पर चर्चा में दादा निलोसे का कहना था ऐसा लगा भवानी प्रसाद मिश्र मेरे सामने खड़े हैं।सरोज कुमार आज कविता में उन्हीं की तरह ललकारते हुए बोल रहे थे।इतनी अदभुत कविताएं! कवि राजकुमार कुंभज का गुस्सा था कि सरोज भाई ने खुद को नाना प्रकार की गतिविधियों में झोंक कर हिंदी कविता का नुकसान किया है। आपके इस कवि रूप से चमत्कृत हूं,आज सच्चे मन से कविताएं सुनाई है आपने। 

व्यंग्यकार-कहानीकार जवाहर चौधरी बोले कवि सम्मेलनों में आपने वक्त जाया न किया होता तो आप का यह रूप और विराट होता।एक तरह से साहित्य का नुकसान अधिक हुआ है आप की मंचीय व्यस्तता से।इतिहास के प्रोफेसर-लेखक डॉ स्वरूप वाजपेयी का कहना था सर से परिचय तो लंबा है लेकिन पहली बार उन्हें सुना और कविताएं दिल को छू गईं। नरेंद्र शर्मा ने कहा सरोज कुमार जी की कविता में शब्द बहते हैं और बेहद सहजता के साथ आगे बढ़ते हैं ।सुरेश उपाध्याय ने कहा कि सरोज कुमार जी ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं ने मंच को गरिमा प्रदान की । चंद्रशेखर बिरथरे ने कहा कि मैं सरोज कुमार जी की कविताएं सुनकर अभिभूत हूं सरोज कुमार जी की कवि की आत्मा से आज उनका साक्षात्कार हुआ है ।कवि प्रदीप कांत का कहना था ये कविताएं बातचीत की सहज भाषा में कही गई हैं, इस कारण भी अंदर तक उतर गईं।  अर्जुन राठौर ने कहा सरोज कुमार जी की कविताएं भाषा के विभिन्न प्रयोग के माध्यम से बेहद सहजता के साथ सामने आती है।प्रद्युम्न पालीवाल ने कहा की कविता के माध्यम से सरोज कुमार जी बड़ी बात भी सहजता से कह जाते हैं। लकी सोनगरा ने कहा कि उन्हें सरोज कुमार जी की कविताएं सुनने का सौभाग्य मिला यह अच्छी बात है।शैलेश वाणी ने कहा कि सरोज जी की कविताएं चमत्कृत करती है।शब्द हमेशा अमर होता है और सरोज कुमार जी के मुंह से उनकी कविताएं सुनना अदभुत अनुभव है।

काव्य पाठ संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम

अंत में सरोज कुमार जी ने कहा कि काव्य पाठ संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम है । कविता तो कोई भी लिख सकता है लेकिन उससे बड़ी चुनौती है काव्यपाठ।प्रगतिशील लोग भी अच्छा लिखते हैं लेकिन वे मंच से हटने के साथ ही इसके खिलाफ हो गए।जबकि अज्ञेय से लेकर मुक्तिबोध तक ने काव्यपाठ पर जोर दिया है।दरअसल मंचीय कवि को गवैया कहकर नकारने की प्रवृत्ति चल पड़ी इससे नुकसान हुआ। हिंदी में लोकप्रिय होने का मतलब दुर्गुण-घटिया-माना जाता है।क्रिएटिविटी का कोई पैमाना नहीं होता, कविता तो कभी भी लिखी जा सकती है। मंच पर जो सुनाता हूं वो, और यहां जो सुनाई ये सब कविता मेरी ही लिखी हैं कब किसे क्या पसंद आए यह श्रोता-पाठक पर निर्भर करता है। 

खिड़कियां 

सवाल सिर्फ खिड़कियों का नहीं

उनके खुले रहने का है। 

खिड़की होने भर से 

खिड़की नहीं हो जाती

काल कोठरियों में भी होती हैं

बंद रखी जाने के लिए खिड़कियां।

दीवारें जन्म से सबके साथ हैं 

सख्त से सख्ततर होती हुईं खिड़कियां 

दीवारों को भेदकर ही संभव है। 

ताजी हवा फेफड़ों के लिए 

और संसार 

सपनों की सेहत के लिए जरूरी है। 

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कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


संपर्क : 8989789896