Monday, October 22, 2018
मध्‍यप्रदेश में आपसी गठजोड़ है कांग्रेस नेताओं की 'ऑक्सीजन'

मध्‍यप्रदेश में आपसी गठजोड़ है कांग्रेस नेताओं की 'ऑक्सीजन'

मीडियावाला.इन।  कांग्रेस में इस बार फिजा बदली हुई नजर आ रही है। पिछले तीन चुनावों के मुकाबले बड़े नेताओं द्वारा जिस तरह से टिकटों को लेकर दिलचस्पी दिखाई जा रही है, उससे इसके संकेत मिलते हैं। विभिन्न् एजेंसियों द्वारा आए दिन किए जा रहे सर्वे के नतीजों से उत्साहित कांग्रेस नेता सत्ता की चाशनी की महक महसूस करने लगे हैं, यही वजह है कि नेताओं के बीच गुप्त संधियां आकार ले रही हैं, ताकि महक ही नहीं चाशनी का स्वाद भी चखा जा सके।

नेताओं के बीच गठबंधन कांग्रेस की पुरानी परंपरा रही है। भाजपा में यह सब इसलिए नहीं दिखता, क्योंकि वहां हमेशा से एक सिस्टम काम करता है। वहां कांग्रेस के समान न तो नेताओं का कोटा होता है और न ही रियासत की तरह क्षेत्र बंटे होते हैं। जब तक कुशाभाऊ ठाकरे जीवित थे, तब तक वे पूरे प्रदेश का प्रवास कर निचले स्तर से रायशुमारी द्वारा नाम तय करते थे। नामों को अंतिम रूप देने से पहले बाकायदा चुनाव समिति बैठती थी।

चुनाव समिति में मौजूद सदस्य किसी का नाम जुड़वाना चाहता तो उसे उसकी आजादी थी।

बाद में पैनल तैयार कर दिल्ली भेज दिया जाता था, जहां संसदीय बोर्ड नामों को मुहर लगा देता। ठाकरे के जमाने में सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी उसके बाद लखरीम अग्रवाल, विक्रम वर्मा आदि टिकट बांटने की प्रक्रिया में शामिल रहे। ठाकरे के बाद जब से भाजपा में शिवराज युग आया है, तब से सर्वे के नाम पर टिकट बंटने और कटने का उपक्रम चल रहा है।


चुनाव समिति आज भी अस्तित्व में है। किसी भी सीट पर नाम जोड़ने के अधिकार आज भी चुनाव समिति के सदस्यों के पास मौजूद हैं पर होगा वहीं जो संसदीय बोर्ड चाहेगा। संसदीय बोर्ड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से लगाकर तमाम दिग्गज मौजूद रहेंगे। प्रदेश से उस बैठक में मुख्यमंत्री के नाते शिवराजसिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष के नाते राकेशसिंह मौजूद होंगे।


आपसी गठबंधन असरकारक रहा

भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन हो चाहे न हो, सालों से वहां नेताओं का आपसी गठबंधन असरकारक रहा है। 1980 में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी, तब विधायक दल में अर्जुन सिंह का बहुमत नहीं था। लेकिन तब युवा तुर्क कहे जाने वाले कमलनाथ ने अर्जुन सिंह का साथ दिया और वे मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो गए।

इसके बाद दिग्विजय सिंह जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने तब फिर एक गठबंधन ने आकार लिया। उस गठबंधन में कमलनाथ, अर्जुन सिंह, सुरेश पचौरी और दिग्विजय सिंह एक हो गए। दूसरी तरफ शुक्ल बंधु, माधवराव सिंधिया, मोतीलाल वोरा एकजुट हुए।

सिंधिया और वोरा के बीच आपसी तालमेल इतना जर्बदस्त था कि उन्हें मोती माधव एक्सप्रेस पुकारा जाने लगा। 1993 में दिग्विजय जब मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बने तब अजीत जोगी, दिलीपसिंह भूरिया, असलम शेर खान जैसे नेता भी नाथ, अर्जुन सिंह, दिग्विजय के खिलाफ वाले तंबू में प्रवेश कर गए। दस साल तक दिग्गी वाले गठबंधन की धूम रही। यह गठजोड़ तब ठंडा पड़ा, जब 2003 में सूबे से कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया।


सिंधिया को आलाकमान पर भरोसा

लगातार तीन चुनावों की हार के बाद नेताओं ने एक बार फिर कमर कस ली है। इसकी वजह है सत्ता की निकटता की गर्माहट महसूस होना। इस बार अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह इस गठबंधन में शामिल हैं। दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया अकेले हैं। उन्हें पार्टी आलाकमान की मदद का भरोसा है। अगले एक पखवाड़े में कांग्रेस के अधिकांश टिकट तय हो जाएंगे। टिकट वितरण के बाद ही पता चलेगा कि बहुमत आने की स्थिति में मुख्यमंत्री, नेताओं के आपसी गठबंधन से बनता या नहीं।

अगली बैठक के लिए दिग्गी राजा को भेजा बुलावा

कांग्रेस में चुनाव समिति से पहले ही स्क्रीनिंग का काम लगभग पूरा हो गया। स्क्रीनिंग कमेटी में आलाकमान के तीन मेंबर्स के अलावा पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ और विधायक दल नेता अजय सिंह शामिल हैं। दो दिन पहले जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की दखल के बाद चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया स्क्रीनिंग कमेटी में शामिल होने पहुंचे तो कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह को भी अगली बैठक के लिए बुलावा भेज दिया। कांग्रेस सूत्र बताते हैं कि नाथ को यह अंदेशा है कि सिंधिया कहीं ज्यादा टिकट न उड़ा ले जाएं, इसलिए नाथ ने दिग्विजय सिंह और नेता प्रतिपक्ष के साथ मिलकर गठबंधन कर लिया है।

नईदुनिया से साभार
 

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