Monday, October 22, 2018
मणिपुर में चल रहा सूचना युद्ध: क्या सुरक्षा बल तैयार हैं?

मणिपुर में चल रहा सूचना युद्ध: क्या सुरक्षा बल तैयार हैं?

सीबीआई जाँच : हाल ही में सेना के एक अधिकारी के खिलाफ सीबीआई की जांच के आधार पर ह्त्या का मामला दर्ज करना आतंक के खिलाफ सेनाओं के युद्ध में एक नया मोड़ है. 2017 में गठित सीबीआई का विशेष जाँच दल (SIT) कुल 41 (जिस में 19 सेना के हैं) मामलों की जाँच कर रहा है जिनमे 2013 में बनाये गए संतोष हेगड़े कमीशन के 6 मामले भी शामिल हैं. ज्ञात रहे कि एक तरफ़ा सुनवाई के आधार पर हेगड़े कमीशन ने सुरक्षा बलों को सभी मामलों में दोषी ठहराया था. हर नागरिक (जिन में सुरक्षा बलों के सदस्य भी शामिल हैं) को न्यायिक समानता का अधिकार है, और किसी भी दबाव में आ कर इस अधिकार से वंचित किया जाना गलत होगा. सेना ने कभी गलत कार्य का समर्थन नहीं किया है पर इसके साथ ही तंत्र का कर्तव्य है कि पूरी प्रक्रिया को दबाव से परे रख के निष्पक्ष रूप से पूरा किया जाये, ताकि न केवल सेना कि छवि बल्कि सैनिकों के मनोबल पर भी कोई विपरीत असर न पड़े. न्याय प्रक्रिया में निष्पक्ष जाँच और सभी पक्षों को सामान रूप से अपनी बात रखने का अवसर देना महत्वपूर्ण कड़ी है पर सूचना युद्ध के चलते ऐसे मामलों में जल्दी फैसले के लिए बाध्य करना सही कदम नहीं है.

मणिपुर समस्या : मणिपुर में अस्सी के दशक से चल रहा छद्म युद्ध अब सिर्फ फिरौती, अपहरण और चुनिन्दा लोगों की राजनीतिक हत्या का व्यवसाय बन कर रह गया है. एक समय में आतंकियों द्वारा अपने लिए लगभग आज़ाद क्षेत्र घोषित होने के बावजूद ये सुरक्षा बलों का ही अभूतपूर्व योगदान था कि देश की संप्रभुता की रक्षा की जा सकी. आंकड़ों को देखें तो अब तक 4900 आतंकियों को मार गिराया गया है और लगभग 5100 से आत्मसमर्पण किया है. यदि सेनाएँ इतनी ही अनियंत्रित होतीं तो आत्मसमर्पण होते ही नहीं. मणिपुर की भौगौलिक और सामाजिक देश के ही नहीं बल्कि उत्तर पूर्व के अन्य  राज्यों से भी अलग है. राज्य का 70 प्रतिशत हिस्सा नागा और अन्य प्रजातियों के पास है और उनके लिए अलग राजस्व और भूमि संबंधी कानून हैं. 30 प्रतिशत हिस्सा इम्फाल घाटी है और मेइतेइ/ मैती (Meitei) बाहुल्य वाला है. प्रशासन और पुलिस इत्यादि में मेइतेइ / मैती लोगों की बहुतायत है. साथ जुड़े हुए राज्य नागालैंड में होने वाली घटनाओं और नागा आतंकी गुटों के साथ होने वाली बातचीत का सीधा असर मणिपुर पर पड़ता है और मणिपुर के अधिकतर आतंकवादी गुट नागाओं के खिलाफ अपनी पहचान बनाने के लिए बने थे. घाटी क्षेत्र में अब भी उनका बोलबाला है और उन्हें न केवल सामाजिक बल्कि राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है क्यूंकि फिरौती और गैरकानूनी टैक्स लगाकर वसूला गए पैसे का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय नेताओं की जेब में जाता है. हर आतंकी संगठन का एक राजनीतिक चेहरा भी है जो कि प्रचार (प्रोपगैंडा) में लिप्त है और मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संस्थाएं बना कर ये संगठन सरकार और न्यायालयों पर दबाव बनाये हुए हैं. विदेश में बसे मणिपुरी आका इस युद्ध के लिए पैसा जमा करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं. 

आतंरिक सुरक्षा में सेना की भूमिका : सेनाओं का आतंरिक सुरक्षा के लिए इस्तेमाल सिर्फ गंभीर परिस्थिति में किया जाना चाहिए पर पुलिस और प्रशासन थोड़ा दबाव पड़ते ही हथियार डाल देते हैं और सारा ज़िम्मेदारी सेना पर आ जाती है. सैनिक न तो उस इलाके की भाषा जानते हैं न ही वहाँ के आचार व्यवहार से परिचित होते है. सेना दी गयी सूचनाओं पर काम कर सकती है और ये सूचनाएँ स्थानीय पुलिस और सूचना एजेंसियाँ देती हैं. लड़ाई भी अपने ही लोगों के बीच छुपे लगभग अदृश्य आतंकियों के विरूद्ध. आसान नहीं है इस प्रकार एक लम्बे युद्ध में विजय पाना. हमारी सेनाओं ने आतंकियों के विरुद्ध सीमित बल के प्रयोग की अपनी नीति को कभी नहीं छोड़ा. जब कि पूरे विश्व में आतंकियों को मारने के लिए तोपों और यहाँ तक कि हवाई जहाजों का भी प्रयोग किया जाता रहा है. अमरीका, रूस और यूरोपीय देश हथियारबंद ड्रोन से ये लड़ाई लड़ रहे हैं. उस में कितने ही मासूम नागरिकों की जान जा चुकी है पर कोई मानवाधिकार संस्था अमरीकी सेना पर अभियोग नहीं लगाती. हमारे सुरक्षा बल अनुशासनबद्ध है और अकेले मणिपुर में ही अब तक 1900 से भी ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं और लगभग 3000 से अधिक घायल हुए हैं. मानवाधिकार संस्थाएं और मीडिया इन तथ्यों का संज्ञान नहीं लेता.

छद्म युद्ध और जाँच एजेंसियों के समक्ष चुनौतियाँ : जाँच एजेंसियों पर कई तरह का दबाव डाला जाता रहा है और स्वघोषित मानवाधिकार संस्थाएं और अलगाववादी संगठनों के राजनीतिक हलके, प्रदर्शनों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में प्रचार करके सरकारी तंत्र पर दबाव बनाते हैं. ध्यान रहे कि सेना और अन्य सुरक्षा बल वहाँ सरकार के आदेश के तहत तैनात हैं और सैनिकों को भी निष्पक्ष जाँच और न्याय का अधिकार है. वहाँ तैनाती से पहले विशेष कानून के तहत सैनिकों को पुलिस जैसे अधिकार प्राप्त हैं और केंद्र सरकार से अनुमति के बिना सुरक्षा कर्मियों पर कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती. सेना ने कभी भी जाँच से इनकार नहीं किया है पर साथ ही सिर्फ दबाव में आ कर जाँच प्रक्रिया को बदलना या जल्दी में किसी एक दल या संगठन या संस्था के प्रभाव में आना एक गलत संकेत देता है. सुरक्षा बल आदेशों और नीतियों के तहत इस छद्म युद्ध में पिछड़ गए हैं और मानवाधिकार संगठनों ने सुरक्षा बलों की छवि पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. बटालियनों के इन इलाकों से कार्यकाल के बाद वहाँ से चले जाने के बाद ये सब मुद्दे न्यायालयों में गलत तरीके से पेश किये जाते हैं. सैनिकों के पास न उन इलाकों में जाने का कोई और अवसर होता है न ही कोई भी स्थानीय संस्था या नागरिक उनका साथ देता है. जिसके चलते तथ्यों को तोड़ मरोड़ के एक तरफ़ा तस्वीर पेश कर के जांच एजेंसियों को गुमराह किया जाता है जबकि प्रभावित सैनिकों और अधिकारियों को पहले ही गुनाहगार मान लिया जाता है. 

कानून से ऊपर कोई नहीं है. अगर आँकडे देखें तो सेना ने किसी भी अधिकारी या जवान को न्यायिक प्रक्रिया से बचाने की कोशिश नहीं की है. मुद्दा सिर्फ यह है कि जाँच और आगे की प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से पूरी की जाये. दबाव में आ कर की गयी जाँच और उस पर किया गया फैसला सैनिकों के मनोबल पर विपरीत असर डालता है और अलगाववादी और आतंकी ताकतों को सुरक्षा बलों के खिलाफ एक और प्रभावी हथियार दे देता है. इसके साथ ही सेना और सरकार का कर्तव्य है कि अपने सैनिकों को कानूनी मदद दे और मीडिया और न्यायालयों में अपना पक्ष खुल कर रखे. शांति बहाल होने के साथ ऐसे कई मुद्दे तोड़ मरोड़ कर पेश किये जायेंगे, वक्त है चुप्पी तोड़ कर अपने अधिकारियों और जवानों के अधिकारों की रक्षा का. 


 

6 comments      

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  • Beautifully explained problem in very simple language and analysed the problem in great deapth and reaching to actual reason. Kuddo Colonel Saab
  • Good comprehensive ideas. You are such a competent writer. सूचना संग्राम एक ऐसा युद्ध है जिसमें जितना मुश्किल है, कोई जीता भी नहीं, लेकिन लड़ना आवश्यक है। क्षणिक जीत शास्वत नहीं। लेकिन सेना हर युद्ध में पूर्णतया नैतिकता के साथ ही आगे बढ़ेगी। देश का विश्वास ही सेना की ताकत है और भारतीय सेना सर्वदा सही होने के बाद भी हर अग्निपरीक्षा के लिए तैयार रहेगी। देश के लिए एक और अग्निपरीक्षा। अपनो से कैसा युद्ध। फिर विजयी होंगे।
  • Avebibdra 2 months ago
    अब मेरा देश लोकतांत्रिक नहीं रहा,,मीडिया जर्जर है,,आम आदमी बेबस,,सेना का अधिकांश नेतृत्व थका हुआ,,युवा पीढ़ी दिशा हीन,,, दिग्भ्रमित ,,,सत्ता बिकाऊ,,, नक्सलवाद हर प्रदेश के युवाओं की मजबूरी बन उभरेगी,, अपने देश मे खुद ही बेहूदा हो गए हम ,, अब तो ईश्वर भी मौन है,,, ये कैसा दौर बन पड़ा है,,,
  • Anuj Upadhyay 2 months ago
    A very thoughtful and introspective article on issue of National Importance by the author.All responsible citizens should stay in touch with such blogs.
  • High time army does not get involved in such situations which is making of political short sightedness and insures if involved steps are taken to prevent harassment of staff otherwise army too will become an incompetant organisation and involved in such situations
  • Tanima Bhardwaj 2 months ago
    So thoughtful write up...we people of India should try to understand the problems which are existing in our surroundings and spread awareness as Col Amardeep always tries them in his writings...

कर्नल अमरदीप सिंह, सेना मैडल

कर्नल अमरदीप सिंह, सेना मैडल (सेवा निवृत), मूलतः देहरादून के निवासी हैं। कर्नल अमरदीप ने जम्मू कश्मीर (कुपवाड़ा, सियाचिन और नगरोटा) तथा मणिपुर (इम्फाल) और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सक्रिय सेवा की है। मणिपुर में बटालियन कि कमान के दौरान विशिष्ट सेवा के लिए इन्हें सेना मैडल प्रदान किया गया।

कर्नल अमरदीप सैनिक विषयों की गहरी समझ रखते है। सेना और वर्दी पर केन्द्रित उनके लेख देश की विभिन्न पत्रिकओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे है। स्वभाव से कवि कर्नल अमरदीप के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके है। अप्रैल 2018 में स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वे पूरी तरह से लेखन से जुड़े है। वे वर्तमान में जयपुर से प्रकाशित एक राष्ट्रीय पत्रिका के संपादक है।

सम्पर्क - 7999356350