Sunday, April 21, 2019
समय है राफाल पर राजनीति को बंद करने का

समय है राफाल पर राजनीति को बंद करने का

36 राफाल लड़ाकू विमानों का सौदा भारत सरकार और फ्रांसीसी सरकार के बीच हुआ है. हमारी वायुसेना में विमानों की लगातार घटती संख्या को देखते हुए इस के अलावा कोई और उपाय नहीं था. इस सौदे को अगर राजनीतिक रंग दे कर टाला या रोका जाता है तो देश की सुरक्षा पर विपरीत और गहरा असर पड़ता है. विभिन्न दलों के वक्ताओं ने इसको चुनावी मुद्दा बना लिया है जो कि गलत है और ऐसी बयानबाजी से न केवल देश कि छवि धूमिल होती है बल्कि भविष्य में होने वाले सभी रक्षा सौदों पर गलत असर होगा. दुःख की बात यह है कि सभी पार्टियाँ मुद्दे के तकनीकी पहलू समझे बिना ही बयान ज़ारी कर रही हैं जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरी बन गया है. हर पार्टी को अधिकार है मुद्दे को जानने का पर बिना जाने समझे मीडिया में बयान देना अपरिपक्वता को तो दर्शाता ही है और साथ ही पूरे विश्व में देश के गोपनीय सुरक्षा मामलों को भी उजागर करता है. बयानों में रिलायंस को सौदे से होने वाले लाभ की बात को भी तोड़मरोड़ कर बताया गया है. विपक्ष के नेता का हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के कर्मचारियों से जा कर मिलना और चुनावी आश्वासन देना इस बात का परिचायक भी है कि राजनीतिक पार्टियों को रक्षा मामलों की कितनी समझ है.

कारगिल युद्ध के बाद देश की रक्षा के विषय में दूरगामी फैसले लिए गए और उसके अगले ही वर्ष वायुसेना ने भी अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू जहाजों के लिए प्रस्ताव रखा. ये जान लेना आवश्यक है कि रक्षा उपकरणों की खरीदफरोख्त रक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी है और सेनाएँ केवल अपनी आवश्यकता बता सकती हैं. सेनाओं द्वारा दिए गए मानदंडों के हिसाब से दुनिया भर के हथियार निर्माता अपना अपना प्रस्ताव और कीमत रखते हैं और विशेषज्ञों की टीम सभी प्रस्तावों को नियमानुसार जांचती है. फिर सबसे कम लागत वाले प्रस्तावों को अंतिम परीक्षण के लिए चुना जाता है. चूंकि विदेशों से हथियार और उपकरण खरीदना महंगा पड़ता है इसलिए रक्षा क्रय विनियमावली में तकनीक के आदान प्रदान का भी विधान है. बड़ा हथियार या उपकरण तकनीक के आने के बाद देश में ही बनाया जा सकता है. इसके तहत हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड इत्यादि संस्थाएं वायुसेना के लिए बाहरी कंपनियों के लाइसेंस पर जहाजों का उत्पादन और साथ ही रख रखाव के लिए ज़मीदारी लेती रही हैं. साथ ही न केवल विदेशी जहाजों का लाइसेंस के अंतर्गत उत्पादन बल्कि डीआरडीओ जैसे संस्थानों द्वारा विकसित स्वदेशी विमानों और उपकरणों का भी उत्पादन करती हैं. इस पूरी प्रक्रिया में 10 से 12 वर्ष का समय लग जाता है. वायुसेना के इस प्रस्ताव सन्दर्भ में भी यही हुआ और 2007 तक यूरोफाइटर और राफाल, दो जहाज़ अंतिम परीक्षणों के लिए चुने गए. 126 विमानों में से 18 सीधे दासो (DASSAULT) से तैयार खरीदे जाने थे और बाकी 108 का उत्पादन लाइसेंस के अंतर्गत हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा देश में ही किया जाना था. पर यहाँ बात दो मुद्दों पर अटक गयी. हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा आंकी गयी अनुमानित कीमत दासो की कीमत से लगभग तीन गुना अधिक थी और हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड अपने निर्मित जहाजों की गारंटी लेने को तैयार नहीं था. उनका कहना था की ये गारंटी दासो द्वारा ही दी जानी चाहिए. इस प्रकार सौदे में गतिरोध उत्पन्न हो गया. वायुसेना को दोनों सीमाओं की सुरक्षा के लिए कम से कम 42 स्क्वाड्रन की आवश्यकता होती है आज हमारे पार 32 से भी कम स्क्वाड्रन बचे हैं. सरकार के बदलते ही सौदे को फिर से चर्चा में लाया गया पर गतिरोध ज्यों का त्यों था. अब सरकार के पास तीन विकल्प थे, 126 जहाजों का सौदा हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की गतिरोधक शर्तों के साथ मान लिया जाए, सौदा रद्द कर दिया जाये या फिर आपातकालीन नीति के तहत कम से कम आवश्यकता सीधे सरकारी समझौते के तहत पूरी कर ली जाए.

36 विमानों की खरीद इस तीसरे विकल्प के तहत दो सरकारों के समझौते के अंतर्गत की जा रही है इसलिए इसमें किसी बिचौलिए की कोई भूमिका नहीं है. राफाल वायुसेना और रक्षा मंत्रालय द्वारा उपयुक्त पाया गया है और आज भी अपनी श्रेणी के जहाजों में अग्रणी है. वर्तमान में कीमत सिर्फ जहाज़ की 2008 के मुकाबले 9% कम है और पूरे हथियार और उपकरणों के साथ 20% कम है. ये आँकड़े संसद के समक्ष देश के वित्त मंत्री से रखे हैं. इसलिए यह आरोप कि जहाज़ महंगे खरीदे जा रहे हैं, भी बेबुनियाद है. ये दो स्क्वाड्रन हमारे सामने खड़े सुरक्षा संकट को किसी हद तक टाल देंगी. इसके साथ ही बाकी 110 जहाजों की खरीद की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गयी है. अब मुद्दा आता है कि हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और रिलायंस की इस पूरी प्रक्रिया में क्या भूमिका है जिसको विपक्षी दल और कई संस्थाएँ इस सौदे को टालने के लिए प्रयोग कर रही हैं. जबकि पूरे 36 विमान सीधे दासो से तैयार हालत में खरीदे जा रहे हैं. मुद्दा है कि किसी भी रक्षा सौदे में नियमानुसार विदेशी कंपनी को अपने लाभ का एक हिस्सा भारत में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निवेश करना होता है जिस में कि वो कंपनी भारत में अपने सहयोगियों का चुनाव कर सकती है. इसके तहत दासो ने रिलायंस के साथ साथ 70 अन्य संस्थानों को चुना है. इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि ये भारतीय कम्पनियाँ राफाल का उत्पादन करेंगी या उसमें सहयोग करेंगी. इसका सरल तात्पर्य यह है कि रक्षा उत्पादन में बाहरी कंपनी निवेश करेगी और हमारे ही लोगों को रोज़गार मिलेगा और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में स्वायत्तता को बल मिलेगा.

110 जहाजों के लिए जो प्रक्रिया शुरू की गयी है उसमें फिर से लाइसेंस के तहत हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को निर्माण के लिए आमंत्रित किया जाएगा. यदि तथ्यों को देखा जाए तो हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के पास अगले पाँच वर्ष तक के लिए सेना के विभिन्न अंगों के आर्डर मौजूद हैं और तेजस के विभिन्न मॉडल अभी वायुसेना में शामिल होना बाकी हैं. ऐसे में यह आरोप कि सरकार ने हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ ज्यादती की है, बिलकुल गलत है.

सभी दलों का यह कर्तव्य बनता है कि अपने राजनीति लाभ के लिए देश की सुरक्षा को दांव पर मत लगाएँ. हर दल का यह भी कर्तव्य बनता है कि देश की जनता को भ्रमित करने की कोशिश न करे. प्रत्येक राजनीतिज्ञ के लिए इन सब मामलों के लिए संस्थागत तरीके से जानकारी देनी का प्रावधान होना भी सही दिशा में कदम साबित होगा. फिलहाल सौदा हो गया है और पहला विमान अगले वर्ष सितम्बर तक भारत पहुँच जाएगा. 

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कर्नल अमरदीप सिंह, सेना मैडल

कर्नल अमरदीप सिंह, सेना मैडल (सेवा निवृत), मूलतः देहरादून के निवासी हैं। कर्नल अमरदीप ने जम्मू कश्मीर (कुपवाड़ा, सियाचिन और नगरोटा) तथा मणिपुर (इम्फाल) और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सक्रिय सेवा की है। मणिपुर में बटालियन कि कमान के दौरान विशिष्ट सेवा के लिए इन्हें सेना मैडल प्रदान किया गया।

कर्नल अमरदीप सैनिक विषयों की गहरी समझ रखते है। सेना और वर्दी पर केन्द्रित उनके लेख देश की विभिन्न पत्रिकओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे है। स्वभाव से कवि कर्नल अमरदीप के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके है। अप्रैल 2018 में स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वे पूरी तरह से लेखन से जुड़े है। वे वर्तमान में जयपुर से प्रकाशित एक राष्ट्रीय पत्रिका के संपादक है।

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