Saturday, December 15, 2018
कुछ बात है कि गाली मिटती नहीं हमारी

कुछ बात है कि गाली मिटती नहीं हमारी

मीडियावाला.इन।

कुछ दिन पहले  तेरह साल के एक बच्चे की प्रतिभा जान कर मैं खुशी से बेजान सा हो गया।इस बच्चे नेपरीक्षा में कम नंबर आने पर अपने ही अपहरण की सफल योजना बनाई थी।पुलिस की मूर्खता सेयोजना असफल हो गई।फिर भी मैं बच्चे की प्रतिभा का कायल हो गया।इसलिए भी क्योंकि उसनेपुलिस समेत कुछ घरवालों को परंपरा के पाठ्यक्रम में निर्धारित गालियां दीं।मैंने सुना कि पुलिस नेअपने पाठ्यक्रम को विस्तार से याद किया। मुझे पुलिस पर गुस्सा आया।बच्चे को प्रोत्साहित करने केस्थान पर उसको हतोत्साहित किया।यह हमारे समाज की परंपरा के खिलाफ है ।समाज में अक्सर नरबच्चे को परंपरा के प्रहरी गालियां सिखाते हैं।या ऐसा प्रेरणा प्रदान करने वाला माहौल बना देते हैं किगालियों का लालन पालन सही हो सके।
 
कन्या बच्चे को परंपरा के प्रहरी इसलिए नहीं सिखाते क्यों कि उसे जीवन के हर चरण में गालियांस्वीकार करनी हैं।देनी नहीं। बल्कि उसे तो इस बात के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए कि बिन मांगे मोतीमिले की आदर्श स्थिति के अनुसार गालियों के मोती माणिक घर गली गांव महानगर  बरसते ही रहेंगे।यह बात भी कितनी अच्छी है कि जाने कितने ज़िम्मेदार लोग आज भी कन्या को जीवन के नाम परगाली मानते हैं।इसीलिए गर्भ से ही शुरू होने वाला सफाई अभियान लगातार जारी है।
 
नर बच्चे प्रशिक्षण के बाद अपनी मेहनत और लगन से यह कला विकसित करते हैं।होनहार गालियांबताने लगती हैं कि बिरवा के पत्ते चिकने हैं।भरोसा जागता है कि ये लगातार चिकने होंगे।इतने होंगे किसभ्यता, लोकतंत्र, संवेदना की एक भी बूंद इन पर नहीं टिकने पाएगी।पूत के पांव पालने में दिखते हैं।आगे चलकर पांव लात में बदलते हैं।जो धत्तेरी लत्तेरी के सामाजिक अनुष्ठान में काम आते हैं।इनसेलंगड़ी मारने और ठोकर लगाने का लोकप्रिय काम भी किया जाता है।मौके पर अपने निशान न छोड़नेवाले चरण इसी कोटि में आते हैं।पूतों के पांव पालने से पार्लियामेंट तक नज़र आते हैं।आ ही रहे हैं।
 
गालियां एक सामाजिक प्रक्रिया की देन हैं।बड़ी मुश्किल से होती हैं चमन में गालियां पैदा।इसलिए येआदमी की खासियत भी बन जाती हैं।कि यार उसने चुन चुन कर गालियां दीं।या भाई वह तो छूटते हीदेने लगता है।या वह बिना गाली बात नहीं करता।या गाली उनकी ज़बान पर रहती है।कितना महान हैयह समाज जहां गालियों को इतना सम्मान मिलता है।कण कण में भगवान है तो गाली गाली में भीहोगा।वैसे ,औरों का प्राण लेने में निपुण कुछ धर्मप्राण लोगों ने ऊपरवाले का ऐसा इस्तेमाल किया है किउसका नाम भी गाली लगने लगा है।मजहबी गाली गाली न भवति।
 
गाली ही ऐसी चीज़ है जिसे प्यार से देने पर अपनापन बढ़ जाता है।वरना डंडा और गोली चाहे जैसे मारोपरिणाम एक ही आता है।गाली का जलवा है।शादी में साली सलहज आदि न दें तो आदमी कुंठित होकरअपने पुरखों का नामजप करने लगता है।यह सोच कर कितना सुख मिलता है कि चाहे स्त्री न्यौते यापुरुष बके,निशाने पर स्त्री ही रहती है। जैसे कला कला के लिए होती है और कला समाज के लिए होती है।वैसे एक तरह की गाली केवल गाली के लिए है।दूसरी तरह की सामाजिक हित के लिए।पुलिस वाले,दबंगलोग, जातिमद में मस्त महान नागरिक, मर्दवाद में चूर पति आदि सामाजिक हित में गालियां उचारतेहैं।हमें इनके सरोकारों का सम्मान करना चाहिए।ये रिसर्च स्कालर हैं।आदमी पर बात करते हुए उसकेस्रोतों की खोज भी करना चाहते हैं।
 
ख़ास गाली और आम गाली में वही अंतर है जो मनोरोगी और पगलैट में है।संसदीय गरिमा औरनागरिक मर्यादा का पालन करने वाले लोग इसका अंग्रेज़ी अनुवाद प्रयोग करते हैं।अगर कभी गालियोंका महाकोश बने तो भारतीय राजनीति के बिना उसका एक भी पृष्ठ पूरा नहीं हो सकता।कहीं भी चुनावका पवित्र पर्व आते ही तहा तहा कर रखे पावन प्रसंग बाहर निकल आते हैं।कितना सुखद है कि मीडियाऔर जनता भी मुद्दों से ज़्यादा इन लोकतांत्रिक शब्दों में रुचि लेने लगती है।
 
कोई कुछ भी कह ले गालियां हमारी संस्कृति का ज़रूरी हिस्सा हैं।कुछ बात है कि गाली मिटती नहींहमारी।

 

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सुशील सिद्धार्थ

ग्राम भीरा, जिला सीतापुर (उ.प्र.) में 2, जुलाई 1958 को जन्म। हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी.

व्यंग्य, आलोचना और कथा साहित्य में लंबे समय से संलग्न। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें व आलोचनायें प्रकाशित।

दूरदर्शन से 30 वृत्तचित्त प्रसारित। पटकथा एवं संवाद लेखन के अतिरिक्त अनेक पत्रों में स्तंभ लेखन। पढते-लिखते’, ’कथाक्रम’ में ’राग तन्तरानी’ और ’लमही’ में ’कथा प्रान्तर’ का लेखन।

व्यंग्य संग्रह: ’प्रीति न करियो कोय’, ’मो सम कौन’ और ’नारद की चिन्ता’,मालिश महापुराण आदि

कविता संग्रह: ’बागन बागन कहै चिरैया’, ’एका’।

अवसान -17 मार्च 2018