गौरैया दिवस
कहाँ गई गौरैया…
आँगन की वो चहकती रानी,
छतों की छोटी सी मेहमान,
कहाँ गई वो प्यारी गौरैया,
क्यों हो गया सूना ये जहान ?
नन्हे-नन्हे पंखों वाली,
फुदक-फुदक कर गाती थी,
दाने चुनकर, जल पीकर,
हर सुबह जगाती थी।
कंक्रीट के जंगल बढ़े तो,
टूट गए उसके आशियाने,
मोबाइल टावर, प्रदूषण ने,
छीन लिए उसके ठिकाने।
न पेड़ों की छाँव बची अब,
न मिट्टी की खुशबू रही,
काँच-लोहे के इस युग में,
उसकी दुनिया कहीं खो गई।
आओ फिर से उसे बुलाएँ,
छोटे-छोटे घर बनवाएँ,
दाना-पानी रोज़ रखेंगे,
प्यार से उसे अपनाएँ।
फिर से गूंजेगी चहचहाहट,
फिर महकेगा हर एक द्वार,
लौट आएगी गौरैया अपनी,
लेकर खुशियों की बहार।



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Sadhna Shrivastava और 3 अन्य लोग





