‘पा और पा : पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा’ -पार्किन्सन रोग पर डॉ. अपूर्व पौराणिक की हिन्दी किताब

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'पा और पा : पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा

‘पा और पा : पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा’ -पार्किन्सन रोग पर डॉ. अपूर्व पौराणिक की हिन्दी किताब

– डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

डॉ. अपूर्व पौराणिक की किताब ‘पा और पा : पार्किन्सोनिज्म और मेरे पापा’ पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई न्यूरोलॉजिस्ट की सफेद कोट उतारकर, बेटे की आँखों से दुनिया देख रहा हो। यह एक दिल से निकली कहानी है, जिसमें विज्ञान और संवेदना का अनोखा मेल है और यह हिन्दी में ऐसी किताब है जो पार्किंसन रोग जैसी जटिल बीमारी को आम आदमी की भाषा में सरल और रोचक ढंग से समझाती है।
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पार्किन्सन के बारे में मेरी जानकारी अत्यल्प ही है। जो भी जानकारी मिली वह इसी किताब से मिली। एक जाने-माने न्यूरोफिजिशियन हैं, जिन्होंने पार्किंसन के हजारों केस देखे हैं, दवाइयाँ लिखी हैं, व्यायाम बताए हैं।
दूसरी ओर वे ही अपने पिता कृष्णवल्लभजी पौराणिक के बिस्तर के पास खड़े हैं, जिनके आखिरी 15 साल इस रोग की छाया में बीते। डॉ. अपूर्व पौराणिक यहाँ दोनों भूमिकाओं में हैं—डॉक्टर जो कहता है – यह लक्षण है, यह दवा है! …. और एक बेटा है जो चिंतित है कि पापा की आवाज क्यों धीमी पड़ रही है? क्यों हाथ काँप रहे हैं?
यह दोहरी भूमिका किताब की जान है। लेखक खुद लिखते हैं कि चिकित्सा में भावुकता की जगह नहीं, लेकिन इंसान तो इंसान है!संवेदनशील, कमजोर, प्यार करने वाला। यही द्वंद्व किताब को भावुक लेकिन वैज्ञानिक बनाता है।
पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत हिंदी में मेडिकल जानकारी देना है। पार्किंसन रोग क्या है? इसके लक्षण कैसे शुरू होते हैं? क्यों आवाज धीमी और थर्राई हुई हो जाती है? बोलते-बोलते वाक्य के अंत में आवाज गायब क्यों? हाथ-पैर में कंपन, चलने में धीमापन, चेहरा बिना भाव का , सब कुछ विस्तार से, लेकिन आम बोलचाल की भाषा में।
उदाहरण के लिए, आवाज के बदलाव के 8 लक्षणों का वर्णन इतना जीवंत है कि पढ़कर लगता है, जैसे कोई मरीज खुद अपनी कहानी सुना रहा हो। प्रथम अध्याय में रोग का संक्षिप्त परिचय, दूसरे में इतिहास—1817 में डॉ. जेम्स पार्किन्सन द्वारा पहली बार वर्णन, और आयुर्वेद में ‘कंपवात’ के रूप में तीन हजार साल पुराना उल्लेख। यह पुल विज्ञान और भारतीय परंपरा के बीच का है, जो किताब को और गहराई देता है।
खंड दो में पर्सनल टच सबसे ज्यादा छू जाता है। पिता जी पहले किताबें लिखते थे—5 पुस्तकें प्रकाशित! साहित्य, समसामयिक मुद्दों पर गहरी पकड़। लेकिन रोग आने के बाद बौद्धिक तेजी धीरे-धीरे कम होती गई। लेखक बताते हैं कि सक्रिय रहना कितना जरूरी है—व्यायाम, फिजियोथेरेपी से रोग की प्रगति को थोड़ा रोका जा सकता है।
यह हिस्सा सिर्फ जानकारी नहीं, एक बेटे का दर्द भी है।
पाठक को लगता है कि डॉ. अपूर्व सिर्फ इलाज नहीं कर रहे, बल्कि यादें संजो रहे हैं। खंड तीन में उपचार—दवाइयाँ, सावधानियाँ, फिजिकल थेरेपी, डाइट—सब कुछ। लेखक जोर देते हैं कि इलाज दोतरफा है: डॉक्टर के साथ रोगी और परिवार की जिम्मेदारी। अगर मरीज को रोग की पूरी जानकारी हो, तो वे खुद सक्रिय हो सकते हैं, आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
यह किताब उन परिवारों के लिए है जहाँ कोई पार्किंसन से जूझ रहा है। पढ़ते हुए भारीपन नहीं, बल्कि उम्मीद मिलती है। भावनात्मक यात्रा है, जो बताती है कि विज्ञान और प्यार साथ चल सकते हैं। हिंदी में ऐसी किताबें कम हैं, और डॉ. अपूर्व पौराणिक ने एक नई शुरुआत की है। अगर आपके घर में या आसपास कोई इस रोग से पीड़ित है, तो यह किताब जरूर पढ़ें।
– डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी