
3.Mythological Female Characters: इंदौर लेखिका संघ द्वारा ‘भारतीय पौराणिक कथाओं में महिलाएं ‘विषय पर परिसंवाद-आज चर्चा कर रहे हैं उर्मिला की
परिसंवाद : इंदौर लेखिका संघ द्वारा ‘भारतीय पौराणिक कथाओं में महिलाएं ‘विषय पर परिसंवाद आयोजित किया गया .इस रौचक विषय पर सदस्यों ने उत्साह पूर्वक भाग लेकर भारतीय पौराणिक कथाओं में उल्लेखित विभीन्न महिलाएं पात्रीं पर अपनी कलम चलाते हुए उनके व्यक्तित्व और उनके कार्यों पर प्रकाश डाला .हम इस परिसंवाद के शृंखला के रूप में यहाँ प्रकाशित करने जा रहे हैं ,प्रतिदिन एक पात्र यहाँ प्रकाशित किये जायंगे –
सभी हिंदू धर्मग्रंथ स्त्री को ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का अवतार बताते हैं । स्त्री ईश्वर के उस स्त्रीत्व स्वरूप को प्रतिबिंबित करती है जिससे उन्होंने इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की है, और ईश्वर ने ही स्त्री में प्रेम, सद्गुण, सामर्थ्य, सौंदर्य और त्याग जैसे दिव्य गुण समाहित किए हैं।हिंदू धर्मग्रंथों, पौराणिक कथाओं या मिथकों के अनुसार, वैदिक काल महिलाओं के लिए समृद्ध युग था। गार्गी और मैत्रेयी जैसी महान महिलाएँ थीं। महिलाओं का बहुत सम्मान किया जाता था और परिवार ‘मातृ-सतत्त्व वाले’ (महिला प्रधान परिवार) होते थे। महिलाओं को सुंदर, बलवान, रचनात्मक और कामुक प्राणी के रूप में सम्मानित किया जाता था।
उर्मिला
महाकाव्य में, लक्ष्मण से विवाहित उर्मिला एक ऐसी नायिका हैं जो अक्सर सीता जैसी अधिक प्रमुख हस्तियों के आगे उपेक्षित रह जाती हैं। टैगोर ने उन्हें भारतीय साहित्य की एक भूली हुई नायिका के रूप में उचित रूप से पहचाना है और एक आदर्श पत्नी के रूप में उनकी महानता को स्वीकार किया है। उर्मिला अद्वितीय बलिदान की मिसाल हैं, जिन्होंने राम के वनवास के दौरान 14 वर्ष लक्ष्मण से विरक्त बिताए। कुछ कथाओं के अनुसार, लक्ष्मण की सतर्कता से अवगत होकर, उन्होंने पूरे समय उनकी जगह पर विश्राम किया। सीता को वनवास भेजने के राम के निर्णय का विरोध करने से उर्मिला के चरित्र में गहराई आती है, जो विपरीत परिस्थितियों में उनकी अटूट निष्ठा और शक्ति को दर्शाती है।

1. ‘उर्मिला का सम्पूर्ण जीवन त्याग, धैर्य, निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण का प्रतीक है’- संध्या पाण्डेय हरदा
पौराणिक कथाओं में एक स्त्री पात्र है,जो अत्यधिक प्रमुख होते हुए भी कम चर्चित रहा वह है –उर्मिला।
उर्मिला रामायण की एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित पात्र हैं। वे राजा जनक की पुत्री और सीता की छोटी बहन थीं। उनका विवाह लक्ष्मण से हुआ था।
जब राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब लक्ष्मण उनके साथ चले गए। उस समय उर्मिला ने बहुत बड़ा त्याग किया। वे अपने पति के साथ वन नहीं गईं, बल्कि अयोध्या में रहकर उनके कर्तव्य का सम्मान किया और चौदह वर्षों तक धैर्यपूर्वक उनका इंतजार भी किया।उर्मिला का सम्पूर्ण जीवन त्याग, धैर्य, निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने बिना किसी भी शिकायत के अपने कर्तव्यों को निभाया। इसलिए उन्हें रामायण की “मौन नायिका” भी कहा जाता है।
उर्मिला का चरित्र हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा त्याग और धैर्य में ही दिखाई देते हैं।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब लक्ष्मण चौदह वर्षों तक जागकर राम और सीता की सेवा कर रहे थे, तब उर्मिला ने उनके हिस्से की “नींद” अपने ऊपर ले ली थी। यह कथा उनके त्याग और अदृश्य योगदान को दर्शाती है।
— उर्मिला के बारे में अलग अलग काल में कुछ अलग लिखा है ¡ जैसे —
रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने उर्मिला का उल्लेख किया है, लेकिन विस्तार से नहीं। उनका मुख्य ध्यान राम, सीता और लक्ष्मण पर रहा।
वाल्मीकि रामायण में वाल्मीकिजी ने भी मूल रामायण में उर्मिला का उल्लेख किया है, पर उनका चरित्र बहुत विस्तृत रूप से नहीं उभारा गया है।
मैथिलीशरण गुप्तजी ने साकेत में उर्मिला को विशेष महत्व दिया है। गुप्त जी ने उर्मिला के मनोभाव, विरह और त्याग को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।“साकेत” में उर्मिला का चरित्र केंद्र में है। आधुनिक युग में कई आधुनिक लेखकों और कवियों ने उर्मिला को एक “अनदेखी नायिका” के रूप में प्रस्तुत किया है।नारी दृष्टिकोण से उनके त्याग और संघर्ष को नए रूप में समझाया गया है
उन्हें भारतीय स्त्री के धैर्य और शक्ति का प्रतीक माना जाता है ।
वे “मौन त्याग” की प्रतीक हैं उन्होंने बिना शिकायत अपने कर्तव्य निभाए।उनका योगदान परोक्ष होते हुए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उर्मिला रामायण की ऐसी स्त्री पात्र हैं जिनका योगदान दिखता कम है, पर गहरा बहुत है। आधुनिक समय में उनके चरित्र को नई दृष्टि से समझा जा रहा है, और उन्हें रामायण की “अदृश्य नायिका” कहा जाता है।
2.’- वे न केवल एक आदर्श पत्नी थीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा और त्याग की प्रतीक भी थीं।’–सुषमा शुक्ला इंदौर
कथाओं के अनुसार, उर्मिला ने इस अवधि में न केवल अपने व्यक्तिगत दुःख को सहा, बल्कि राजमहल में रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह भी किया। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, उन्होंने लक्ष्मण के स्थान पर चौदह वर्षों तक ‘निद्रा’ का भार अपने ऊपर ले लिया, जिससे लक्ष्मण बिना सोए राम और सीता की सेवा कर सके। यह कथा उर्मिला के अदृश्य त्याग और बलिदान को और भी गहराई से दर्शाती है।
उर्मिला का चरित्र यह सिखाता है कि जीवन में हर नायक के पीछे एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो बिना किसी प्रशंसा के अपना योगदान देता है। वे न केवल एक आदर्श पत्नी थीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा और त्याग की प्रतीक भी थीं। आज के समय में उर्मिला का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्चा त्याग और समर्पण हमेशा दिखावे का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह अपने आप में महान होता है।
3.उर्मिला के चौदह वर्ष- उर्मिला के जलाए दीयो से पूरा राजमहल जगमग हो उठा था- विभा शर्मा
इसे लेकर दो अलग-अलग मान्यताएं हैं। प्रचलित मान्यता के अनुसार उर्मिला ने चौदह वर्ष तक माता कौशल्या की बहुत सेवा की तथा एक भी आंसू नही बहाया। प्रतिदिन वह अयोध्या के राजमहल में भगवान के सामने एक दीपक प्रज्जवलित करती तथा पुराने दीपक को भी बुझने नही देती थी। इस प्रकार चौदह वर्ष तक असंख्य दीपक प्रज्जवलित हो चुके थे। जब लक्ष्मण श्रीराम व माता सीता के साथ अयोध्या वापस लौटे थे तब उर्मिला के जलाए दीयो से पूरा राजमहल जगमग हो उठा था।लक्ष्मण के वनवास से लौटने के पश्चात उर्मिला के दो पुत्र हुए जिनके नाम अंगद व चंद्रकेतु था। उसके बाद उर्मिला ने अपने जीवनकाल में अपनी बड़ी बहन का फिर से वनवास जाना देखा। जब उर्मिला के इस धरती पर रहने का समय समाप्त हो गया तब उसने हंसी-खुशी अपने प्राण त्याग दिए व अपने धाम को चली गयी थी। उर्मिला की मृत्यु पर रामायण में कुछ नही लिखा है।





