सामूहिक शक्ति का महत्व बतातीं मां चंद्रघंटा…

306

सामूहिक शक्ति का महत्व बतातीं मां चंद्रघंटा…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

नवरात्रि का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह प्रतिपादित करता है कि सामूहिक शक्ति की बराबरी कोई नहीं कर सकता। जब असुरों के आतंक से देवता त्राहि-त्राहि करने लगे, तब शिव विष्णु और सभी देवताओं ने सामूहिक रूप से अपने अस्त्र-शस्त्र मां चंद्रघंटा को सौंप दिए थे। और मां चंद्रघंटा ने असुरों का संपूर्ण नाश कर देवताओं को निर्भय किया था।

जब महिषासुर जैसे राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचाया था, तब देवताओं ने अपनी सामूहिक शक्ति मां दुर्गा को समर्पित की थी। मां चंद्रघंटा के स्वरूप को युद्धभूमि में अजेय बनाने के लिए प्रत्येक देवता ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए थे। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, अग्निदेव ने शक्ति (शूल), वायुदेव ने धनुष और बाण, वरुणदेव ने शंख, इंद्रदेव ने वज्र और घंटा, यमराज ने कालदंड, कुबेर ने गदा एवं सूर्यदेव ने तलवार और ढाल, मां चंद्रघंटा को सौंप दिए थे। तब माँ ने समस्त असुरों का नाश किया था। माँ चंद्रघंटा की कृपा से देवताओं को इस युद्ध में विजय प्राप्त हुई थी। मां चंद्रघंटा के शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। ऐसी देवी चंद्रघंटा का वाहन बाघ है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा गया है। माता के इस स्वरूप की दस भुजाएं हैं। उनके बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल हैं, और पांचवा बायां हाथ वरद मुद्रा में है। अपने चार दाहिने हाथों में माता ने कमल, तीर, धनुष और जपमाला धारण की है, और पांचवा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। बाघ पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए।

देवी चंद्रघंटा के मुखमण्डल से सौम्यता और शांति के भाव झलकते हैं, और इनके दर्शन और पूजन मात्र से ही साधकों को सुख-शांति का आशीर्वाद मिलता है। वेदों में कहा गया है कि माँ चंद्रघंटा की आराधना करने से मनुष्य को अलौकिकता का आभास होता है।

ऐसी मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की साधना करने से घर में समृद्धि का वास होता है, और माता अपने सभी भक्तों को दीर्घायु होने का आशीर्वाद देती हैं, साथ ही उनका कल्याण करती हैं। शुक्र ग्रह मां चंद्रघंटा द्वारा शासित होता है, इसीलिए नवरात्रि के तीसरे दिन माता की आराधना करने से साधकों पर शुक्र ग्रह की कृपा बनी रहती है। नवरात्रि के तीसरे दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में उपस्थित होता है, इसीलिए इस दिन उन्हें स्थिर मन के साथ माता की पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से उन्हें अपने आसपास माता की दिव्य शक्ति का आभास होता है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए। तीन नेत्रों वाली और दस शस्त्रों को धारण करने वाली माता चंद्रघंटा खतरे में और अप्रिय स्थिति में भय को नियंत्रित करने की क्षमता देती है।

एक मान्यता यह भी है कि भगवान शिव से विवाह करने के लिए मां दुर्गा ने उनकी प्रार्थना की और उन्हें प्रभावित किया। ऐसे में भगवान शिव विवाह करने के लिए तैयार हो गए और विचित्र बारात लेकर रवाना हुए। भगवान शिव का पूरा शरीर राख से मला हुआ था। इसके अलावा उनके गले में कई सांप थे और उनके बिखरे बालों ने जटाओं का रूप ले रखा था। भगवान शिव के इस डरा देने वाले रूप से और बारात में शामिल पिशाचों, संतों और बैरागियों की उपस्थिति के कारण मां पार्वती का परिवार हैरान था और लगभग मूर्छित हो गया था। इस सारी शर्मिंदगी से बचने के लिए माता पार्वती ने माता चंद्रघंटा का रूप ले लिया, देवी पार्वती का भयंकर रूप। इस भयंकर रूप में माता चंद्रघंटा ने भगवान शिव से एक सुंदर राजकुमार का रूप धारण करने की याचना की। ऐसे में भगवान शिव शाही कपड़ों और आभूषणों से सजधज कर एक आकर्षक राजकुमार में बदल गए। विवाह सभी वैदिक रीति-रिवाजों और पूजा विधान के साथ संपन्न हुआ।

तो मां चंद्रघंटा का स्वरूप केवल देवी का तेजस्वी रूप नहीं, बल्कि देवताओं की सामूहिक शक्ति का प्रतीक भी है। उनके अस्त्र-शस्त्र हमें यह संदेश देते हैं कि जब अधर्म बढ़ता है तो धर्म की रक्षा के लिए हर शक्ति एकजुट होती है। मां चंद्रघंटा का यह स्वरूप आज भी भक्तों को साहस, पराक्रम और विजय का आशीर्वाद देता है। वर्तमान संदर्भ में हम सामूहिक शक्ति का महत्व इस तरह से समझ सकते हैं कि भारतवासी सामूहिक रूप से स्वदेशी को अपनाते हैं तो देश को आत्मनिर्भर बनाकर विदेशी निर्भरता को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है और विकसित भारत की यात्रा तय की जा सकती है। भारत की आजादी की लड़ाई में सामूहिक शक्ति का प्रभाव ज्ञात है और हाल ही में पड़ोसी देश नेपाल में सामूहिक शक्ति ने सरकार को गिराकर नई सरकार बना दी… तो मां चंद्रघंटा सामूहिक शक्ति का यही महत्व बतातीं‌ हैं…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।