Protein: प्रोटीन का खजाना, फ्री में है पाना तो, सेम की एक बेल लगा लो

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Protein:प्रोटीन का खजाना, फ्री में है पाना तो, सेम की एक बेल लगा लो

प्रोटीन का खजाना, फ्री में है पाना तो, सेम की एक बेल लगा ही लो। इसके बीज व फल दोनो मजेदार हैं।और ये बात समझ न आये तो फिर ले आइयेगा हजारों रुपयों वाला प्रोटीन पाउडर, जिसमे लिखा होगा। प्रोटीन ..X,
आइये लौटिये, प्रकृति के साथ मेरी पोस्ट पर। वैसे तो सेम दाल परिवार का सदस्य होने के नाते प्रोटीन से भरपूर होता ही है लेकिन प्रोटीन के अलावा कई सूक्ष्म और वृहद पोषक तत्व भी इनमें दबाके पाये जाते हैं।
 हमारे पातालकोट सहित कई जंगली इलाको में ये ठंड के मौसम में सब्जी का स्त्रोत होते हैं तो वहीं साल भर दाल का। एक कमाल की बात बताऊं न तो इसे लगाने के लिए बहुत अधिक सिंचाई की आवश्यकता है और न ही इसमी कभी रासायनिक खाद या कीटनाशक के प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है। हाँ अधिक उत्पादन का लालच जब इसमें शामिल हो जाती है तो फिर क्या सही और क्या गलत।
पातालकोट अपने आपमें प्राकृतिक और मिश्रित खेती का श्रेष्ठम मॉडल है, हालांकि इसके बाबजूद इसका नाम, इस मामले में दुनिया की किसी किताब में नही मिलेगा। गुरूदेव डॉ. Deepak Acharya के साथ मैंने इस मॉडल का खूब दर्शन किया है। गुरूदेव ने बताया था कि दुनिया के कई देशों में भी ठीक यही पैटर्न है विकास। न जाने इनका व्यवहारिक ज्ञान इतनी दूरियों और विविधता के बाद एक ही पॉइंट पर आकर कैसे मिल जाता है, यह सोचने वाली बात है।
असल मे पातालकोट में मक्के की फसल के साथ ही सेम, बल्हर, पोपट, तेवड़ा, चौड़ा, आदि के बीज बो दिये जाते हैं। मक्के की फसल से मक्का तोड़ने के बाद मक्के के ठूठ इन सेम परिवार के सदस्यों के लिए आधार का काम करते हैं। इनसे जब चाहे तब ताजी फलियाँ तोड़ ली जाती हैं। और जितने की आवश्यकता नही होती वे पेड़ पर लगी लगी सूख जाती हैं। आखिर में सूखी फलियाँ तोड़ कर साबुत रख ली जाती है। और इनसे भी जब आवश्यकता हो तब बीज निकालकर दाल दर ली जाती है।
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अब सोचने और समझने वाली बात यह है कि ये लोग खेतो में सिंचाई क्यो नही करते, तो इसका जबाब है कि अभी तक इनखे पास सिंचाई की सुविधा नही है, और इनका मानना है कि खेती लायक पानी भगवान खुद बरसा देते हैं। दूसरा कि खाद क्यो नही डालते तो इसका उत्तर है कि ये दाल परिवार के सदस्य नाइट्रोजन फिक्सेशन की क्षमता रखते हैं तो स्वयं खुद के लिए और दूसरी फसल के लिए खाद तैयार कर देते हैं। तीसरा की सेमी की फसल के बाद मक्के की ठूठ खेत के लिए परेशानी बन जाता होगा तो नही। क्योंकि ये सूखी लतायें और मक्के के पेड़ गाय बेलों के लिए उस समय चारा बन जाता है जब जंगलों से भी घास पूरी तरह सूखकर समाप्त होने को आती है। जब ये पशु खेत पर चरने आते हैं तब वही गोबर त्याग कर देते हैं और अपने चारे की कीमत किसान को दे जाते हैं। है ना गजब का संतुलन? जल्द ही पातालकोट से बल्हर और पोपट लेकर आपके समक्ष आऊँगा तब तक गाँव मे मेरी बेटी और मेरी मेहनत से तोड़ी गई काली/ जामुनी सेम से काम चलाइये।
इस मौसम की अपने बगीचे वाली पहली सेम तोड़ने का मजा ही कुछ खास है। दाल परिवार का यह सदस्य प्रोटीन भंडार होने के साथ साथ एक स्वादिष्ट सब्जी भी है। इसे खिचड़ी, पुलाव, फ्राय चावल, मिक्स वेज, सांभर व भाजी बड़े आदि में भी खूब प्रयोग किया जाता है। जिसमे इसके कोमल फल व बीज शामिल होते हैं। इसकी फलियाँ हरी सब्जियों में शामिल हैं जबकि बीजो से भी कई तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं।
वैसे तो सेम की भी कई प्रजातियां हैं लेकिन पांढुर्ना (म. प्र. का मराठी भाषी क्षेत्र) जाने के पहले में तो सभी को सेम ही कहता था, किन्तु वहां जाने के बाद पता चला कि इनके आकार, रंग, बीजो का आकार, आकृति, रंग आदि के आधार पर इनके नाम, स्वाद व बनाने के तरीके भी अलग अलग हैं। #बालोरफली, #बाला_च_सेंग, #कुलथी, #पोपट, #बल्लहर, #दूध_मोंगरा, महा सेंग जैसे कई नाम हैं इनके।
कुछ प्रकार की बीन्स के तो केवल बीज ही सब्जियों की तरह प्रयोग किये जाते हैं। जिनसे स्वादिष्ट #महाराष्ट्रीयन_व्यंजन बनाये जाते हैं। में जब लावाघोघरी- सांवरी क्ष्रेत्र में था तब वहाँ पोपट और बल्लहर के बीजों को उबालकर या सीधे ही फ्राय करके नास्ते में परोसने का चलन था।
मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में लगने वाले नागद्वार मेले में भी आपको बल्हर और पोपट के उबाले बीज ताजी कटी प्याज, हरी मिर्च और नींबू के साथ पलाश के पत्तों में बेचते हुये वनवासी बंधु मिल जायेंगे। इस पोस्ट को आप सबका स्नेह मिला तो इन सभी व्यंजनो की सीरीज जल्द ही तैयार करूँगा।
वैसे मेरी लिस्ट और पसंद में सभी क्षेत्रों का अनुभव शामिल है। तो आज इस काली सेम की सब्जी का आनंद उठाया जाएगा।
डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिन्दवाड़ा (म.प्र.)