
अधिकारी आपकी नहीं सुनते तो पद का मोह त्याग दीजिए महापौरजी!
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की खास रिपोर्ट
तीन बरस हो गये ये सुनते-सुनते कि नगर निगम के अधिकारी हमारी बात ही नहीं सुनते। कभी महापौर पुष्यमित्र भार्गव तो कभी ख़ुद नगरीय कल्याण मंत्री कैलाश विजयवर्गीय सार्वजनिक तौर पर यह कहते नज़र आते हैं कि निगम के अधिकारी उनकी बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं।
क्यों? प्रदेश में आपकी पार्टी की सरकार है, केंद्र में आपकी पार्टी की सरकार है, आप उसके निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं और जन प्रतिनिधि भी वह जिन्हें इंदौर की जनता ने एक लाख से अधिक वोट से जिताया है- तो क्या इसलिए कि आप ये शिकायत ही करते रहें कि उस नगर निगम में आपकी कोई सुनता ही नहीं जिसके आप महापौर हैं और जिसके मंत्री इंदौर के ही वरिष्ठतम नेता हैं जिन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज जी के प्रत्याशी का सीधा विरोध कर आपके प्रथम नागरिक बनने की राह आसान की थी?
तीन साल हो गये हैं ये सुनते-सुनते कि अधिकारी हमारी सुनते नहीं। अरे, अगर पार्टी और सरकार के लिये आप इतने भी उपयोगी नहीं कि आपको ठीक से काम करने दिया जाए तो क्या ज़रूरत है ऐसे पद से मोह रखने की? क्या गाड़ी-बंगले और प्रथम नागरिक होने की चमक एक ऐसे प्रतिभाशाली वकील की बौद्धिक दबंगता को लील गई है जिसने बेहद कम उम्र में अपनी पेशेगत ईमानदारी से एक शानदार मुक़ाम हासिल किया था?
या फिर कारण कुछ और है? महापौर पद पर आपकी विजय के सारथी रहे पार्टी के एक गुट विशेष से कहीं आप इतना अनुगृहित तो नहीं हो गए कि ख़ुद एक पार्टी बन गए? या राजनीति में तैयार जनाधार की आकांक्षा आपको तराज़ू के उस पलड़े पर बैठा गई जहां स्थानीय स्तर पर तो आपका पलड़ा नीचे झुका हुआ दिखाई देता है लेकिन दूसरी तरफ़ से देखें तो आप एक गुट विशेष की बैसाखी से टिके ऐसे नेता नज़र आ रहे हैं जिसका पलड़ा लगातार ऊपर, ऊपर और ऊपर ही जा रहा है।
राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच आपने जिस तरह सोशल मीडिया का दामन थामा है उससे आपका चेहरा लोगों की मोबाइल स्क्रीन पर तो छाया रहता है लेकिन यक़ीन मानिए लोगों को इस बात पर भरोसा नहीं होता कि नगर निगम आपके नेतृत्व में चल रही है? आपको विचार करना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है?
आपको लग रहा है कि निगम में काम हों या न हों- सक्रियता दिखाई देती रहनी चाहिए। आप पैसों की कमी की बात करते हैं लेकिन क्या आपने कभी यह पता करने की कोशिश की कि आपके गुट के विधायक जिस विधानसभा क्षेत्र-२ से चुनकर आते हैं उनके इलाक़े में कितनी गलियों में अच्छी-भली कांक्रीट की सड़कों को उखाड़कर फिर से कांक्रीट क्यों की ja रही है या उन रहवासियों से आप कभी पूछने गये कि उनका पार्षद अच्छे पेवर को निकालकर क्यों नए पेवर लगाने पर ज़ोर दे रहा है? क्या निगम में फ़ाइलों से पार्षदों-विधायकों के घर भरने का दौर फिर शुरू हो गया है?
महापौर जी, हमें एक कमजोर और याचना करता प्रथम पुरुष नहीं चाहिये। इस शहर ने आप पर विश्वास किया है और एक लाख वोट से आपको विजयी बनाया है- उनके भरोसे और वोट की लाज रखिए। अपनी पार्टी से कहिए कि सत्ता और संगठन को यदि आप जैसे व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है तो साफ़ कहे वरना इन्दौर अपने महापौर को
इतने कमजोर रूप में देखने को तैयार नहीं है। इंदौर से भर-भरकर वोट लेने के बावजूद यदि पार्टी अपने युवा प्रतिभावान महापौर को सपोर्ट नहीं कर सकती तो त्याग दीजिए ऐसा पद। क्या ही मोह रखना…!
पुनश्च: पुष्यमित्र भार्गव जी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ। आप हमेशा स्वस्थ और प्रसन्न रहें!
(हेमंत शर्मा इंदौर से प्रकाशित लोकप्रिय दैनिक प्रजातंत्र के संपादक हैं।)





