Bhagirathapura Incident: इंदौर में मौतों से कराह उठे नर्मदा जी के घाट

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Bhagirathapura Incident: इंदौर में मौतों से कराह उठे नर्मदा जी के घाट

विनोद पुरोहित की विशेष रिपोर्ट लगादो

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इंदौर में पानी से लोगों की मौत और इसके बाद मंत्री की घंटा जैसी बदजुबानी की गूंज नर्मदा जी के सभी घाटों तक पहुंच गई है। सबका यही सवाल है कि स्वच्छता में इतने सालों से नंबर एक पर रहने वाला शहर अपने लोगों को स्वच्छ जल तक मुहैया नहीं करा पा रहा है। इस कांड ने शहर को मिल रहे स्वच्छता के तमगे की पोल खोल कर रख दी है। जीवनदायिनी नर्मदा जी के जल को जानलेवा की हद तक दूषित कर देने वालों को मंत्री भले अपने वोट और नोट की खातिर बचाने की कुत्सित कोशिश करे लेकिन लोगों को उन्हें कतई नहीं बख्शना चाहिए। घटना के बाद उसे भूल जाने और जिम्मेदारों को बख्श दिए जाने से ही ऐसे लोगों के हौसले बुलंद होते हैं।

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पानी इंसान की बुनियादी जरूरत के साथ ही उसका प्राथमिक अधिकार भी है। वह भी यदि स्वच्छ नहीं मिल पा रहा तो ऐसे पूरे सिस्टम को धिक्कार है। घटना के बाद तिकड़म और जी हुजूरी करने वाला तंत्र सक्रिय हो गया है और मंत्री को इस्तीफे की सलाह दे रहा है… इस्तीफा से ऐसे लोग उस मंत्री का कद बढ़ाना चाहते हैं। यह ऐसा हृदयविदारक कांड है, जिसमें खुद सरकार को मंत्री को तत्काल बर्खास्त कर देना चाहिए लेकिन अफसोस ऐसा अब तक नहीं हुआ।

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नर्मदा जी परिक्रमा के दौरान दो जगह गंगा कुंड आते हैं। ऐसा माना जाता है गंगा जी खुद इन जगहों पर नर्मदा जी में डुबकी लगाने आती हैं। ऐसी पवित्र और मोक्षदायिनी नर्मदा जी के जल को चंद लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर इतना दूषित कर दिया है। शर्मनाक बात यह है कि जुमलेबाजी कर वोट बटोरने वाले नेताओं और अफसरों को ये लोग नजर नहीं आते हैं। सत्ता के गुरूर ने इनकी खाल इतनी मोटी कर दी है कि इन पर इंसानों की मौतों का कोई असर नहीं होता। यहां तक कि इस बारे में सवाल पूछने पर बदजुबानी करने की घटना जाहिर करती है कि ये सत्ता और रसूख के नशे में इस कदर मदमस्त हैं कि इन्हें किसी की परवाह नहीं। पांच साल बाद फिर वोट के लिए लल्लो चप्पो करने वालों ऐसे नेताओं की भी जनता को क्यों परवाह करनी चाहिए। जल से मौत अक्षम्य अपराध है।

अब मौतों पर आंसू बहाए जाएंगे। दावों-वादों के नए ‘कैलाश’ गढ़े-मढ़े जाएंगे। शासन स्तर से मदद की बातें होंगी। पीड़ितों को तमाम तरह से भरमाया जाएगा। दरअसल, ये कौम जानती है कि चंद दिन जनता को लुभाकर कैसे पांच साल सत्ता की मलाई खाई जाती है।

अधिकारी आपकी नहीं सुनते तो पद का मोह त्याग दीजिए महापौरजी!