
An example of journalism: असम में 2 पत्रकारों ने मुख्यमंत्री का उपहार ठुकराया
DHUBRI: असम में सरकार और मीडिया के बीच संबंधों को मजबूत करने के नाम पर पत्रकारों को उपहार दिए जाने की पहल के बीच दो वरिष्ठ पत्रकारों का फैसला चर्चा का केंद्र बन गया है। जहां राज्य के विभिन्न जिलों में सरकारी कार्यक्रमों के दौरान पत्रकारों को सम्मान और सद्भावना उपहार दिए जा रहे हैं, वहीं द इकोनॉमिक टाइम्स और द टेलीग्राफ के दो पत्रकारों ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा दिए जा रहे उपहार को ठुकराकर पत्रकारिता की नैतिकता की मिसाल पेश की है।
▪️नव वर्ष की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुआ घटनाक्रम
▫️पत्रकारों के महत्वपूर्ण योगदान को सम्मानित करने के लिए जनसंपर्क विभाग द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। नव वर्ष के अवसर पर आयोजित पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ओर से पत्रकारों को उपहार स्वरूप मोबाइल फोन दिए जा रहे थे। इसी दौरान द इकोनॉमिक टाइम्स के बिकाश सिंह और द टेलीग्राफ के उमानंद जायसवाल ने शालीनता के साथ यह उपहार स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
Proud of my journalist friends – Bikash Singh of The Economic Times and Umanand Jaiswal of The Telegraph for upholding journalistic ethics by refusing to accept cellphone given as a gift to journalists at the customary press meet by CM Himanta Biswa Sarma on the New Year’s Day.
— sushanta talukdar (@sushanta_t) January 2, 2026
▪️‘निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं’
▫️दोनों पत्रकारों का स्पष्ट मानना है कि सत्ता से किसी भी प्रकार का उपहार स्वीकार करना पत्रकारिता की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि पत्रकार का दायित्व सरकार से सुविधाएं लेना नहीं, बल्कि जनता के सवालों को निर्भीकता से उठाना है।
▪️धुबरी कार्यक्रम से जुड़ा संदर्भ
▫️यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा हाल ही में धुबरी जिले में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान 34 सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सद्भावना उपहार देकर सम्मानित कर चुके हैं। यह कार्यक्रम सर्किट हाउस कॉन्फ्रेंस हॉल में जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित किया गया था, जहां जिला आयुक्त दिबाकर नाथ ने अगमोनी, गोलकगंज, तामारहाट और धुबरी सदर क्षेत्र के पत्रकारों को उपहार वितरित किए थे।
▪️सरकार और मीडिया के रिश्तों पर उठता सवाल
▫️जहां सरकार इस तरह के कार्यक्रमों को मीडिया और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल के प्रयास के रूप में देख रही है, वहीं बिकाश सिंह और उमानंद जायसवाल का फैसला इस बहस को जन्म देता है कि क्या पत्रकारों को सत्ता से किसी भी प्रकार का लाभ या उपहार स्वीकार करना चाहिए।
▪️अप्रत्याशित लेकिन मजबूत संदेश
▫️प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद कई लोगों के लिए यह फैसला अप्रत्याशित था, लेकिन पत्रकारिता जगत में इसे साहसिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह निर्णय किसी टकराव या विरोध के रूप में नहीं, बल्कि पेशेवर मूल्यों के पालन के तौर पर सामने आया।
▪️पत्रकारिता के मूल्यों की याद
▫️ऐसे दौर में जब मीडिया पर सत्ता के करीब होने और समझौतावादी रुख अपनाने के आरोप लगते रहते हैं, यह घटना बताती है कि अब भी ऐसे पत्रकार मौजूद हैं जो अपने पेशे को जिम्मेदारी और मिशन मानते हैं। यह कदम खासकर युवा पत्रकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है।
▪️सम्मान से ऊपर स्वतंत्रता
▫️असम में पत्रकारों को दिए जा रहे उपहारों की पृष्ठभूमि में दो पत्रकारों का यह इनकार बताता है कि पत्रकारिता की असली ताकत सत्ता से मिलने वाले सम्मान में नहीं, बल्कि उससे दूरी बनाए रखते हुए सवाल पूछने में है। यही कारण है कि यह घटना यह भरोसा दिलाती है कि पत्रकारिता में उम्मीदें अभी बाकी हैं।





