Uproar in Indore: हर तरफ मातम और आक्रोश- जहां 15 मौतें, वहां सांसद शंकर लालवानी गायब,रिकॉर्ड चुप्पी चर्चा में!

रिकॉर्ड जीत- रिकॉर्ड अनुपस्थिति!

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Uproar in Indore: हर तरफ मातम और आक्रोश- जहां 15 मौतें, वहां सांसद शंकर लालवानी गायब,रिकॉर्ड चुप्पी चर्चा में!

राजेश जयंत की विशेष रिपोर्ट 

INDORE: भागीरथपुरा में पीने के पानी के जहर बन जाने से 15 लोगों की मौत ने इंदौर को झकझोर दिया है। मातम, गुस्सा और आक्रोश हर गली में है। नगर निगम से लेकर महापौर तक सवालों के घेरे में हैं। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की जवाबदेही पर बहस हो रही है। टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक आलोचना की बाढ़ है। लेकिन इस पूरे हाहाकार के बीच एक नाम ऐसा है, जो चर्चा से नहीं बल्कि चुप्पी से पहचाना जा रहा है।

वह नाम है इंदौर के सांसद शंकर लालवानी।

यह कोई सामान्य अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक रिकॉर्ड तोड़ चुप्पी है। न जनता के गुस्से में, न मीडिया की बहसों में, न सवालों की सूची में उनका नाम दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो शहर पहले से जानता हो कि उनसे सवाल करने का कोई अर्थ ही नहीं है।

*▪️जहां 15 मौतें, वहां सांसद गायब*

▫️भागीरथपुरा की त्रासदी राष्ट्रीय खबर बन चुकी है। स्वास्थ्य व्यवस्था, जल आपूर्ति और प्रशासनिक लापरवाही पर देशभर में चर्चा हो रही है। लेकिन जिस शहर में 15 लाशें गिरीं, उसी शहर के सांसद को न तो किसी ने कोसा, न किसी ने घेरा, न किसी ने याद किया। न धरने में, न बयान में, न पोस्टर में, न ट्वीट में।

यह चुप्पी इसलिए भी ज्यादा चौंकाती है क्योंकि यह किसी विवाद से पैदा हुई चुप्पी नहीं है, बल्कि अपेक्षा के खत्म हो जाने की चुप्पी है।

*▪️गुस्से में भी नाम न आना क्या संकेत है*

▫️आमतौर पर जनप्रतिनिधियों की सबसे बड़ी परीक्षा संकट के समय होती है। लोग गुस्से में ही सही, नाम लेते हैं, सवाल करते हैं, जवाब मांगते हैं। लेकिन यहां स्थिति उलट है। सांसद का नाम गुस्से में भी नहीं लिया गया। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या जनता पहले से ही यह मान चुकी है कि उनसे न संवेदना मिलेगी, न हस्तक्षेप, न आवाज। जब उम्मीद ही शून्य हो जाए, तो सवाल भी जन्म नहीं लेते।

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*▪️रिकॉर्ड जीत, रिकॉर्ड अनुपस्थिति*

▫️इंदौर से रिकॉर्ड मतों से जीतने वाले सांसद का यह भी एक रिकॉर्ड है कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी में भी उन्हें किसी ने याद नहीं किया। यह आंकड़ों से नहीं, भावनाओं से जुड़ा मूल्यांकन है। यह वही सीट है जहां कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने नामांकन भरा था और अंतिम समय में भाजपा में शामिल हो गए थे। मुकाबला कमजोर हुआ, जीत आसान हुई, लेकिन शायद इसी आसान जीत ने जवाबदेही की धार को भी कुंद कर दिया।

*▪️जनप्रतिनिधि या सिर्फ चुनावी चेहरा*

▫️इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए होते हैं या संकट में साथ खड़े होने के लिए भी। यदि विपत्ति में भी जनता को किसी सांसद की याद नहीं आती, तो यह केवल उस नेता की विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक रिश्ते के टूटने का संकेत है।

▫️भागीरथपुरा की मौतें सिर्फ दूषित पानी से नहीं हुईं, वे जवाबदेही की कमी से भी हुई हैं। जब शहर जल रहा हो और उसका सांसद स्मृति से बाहर हो, तो यह राजनीति के लिए खतरे की घंटी है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अभी सांसद को क्यों नहीं याद किया गया, बल्कि यह है कि वोट देते वक्त वे इतने लोकप्रिय कैसे हो जाते हैं, जिनसे बाद में जनता को कोई उम्मीद ही नहीं रहती। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वही होती है, जब प्रतिनिधि से नाराजगी भी खत्म हो जाए और उसकी जगह उपेक्षा ले ले।