
चिंता करें, जनता ने हिसाब मांग लिया तो !
अन्ना दुराई
आम जनता से जुड़े मुद्दों के प्रति अनदेखी एक बड़ा कारण है कि आए दिन विकट हालात पैदा होते हैं। हम दिल दहला देने वाले हादसों के शिकार होते हैं। अपने आम नागरिकों को सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण देने का वादा करके चुनाव तो जीते जाते हैं लेकिन वास्तविक धरातल पर नजर कुछ नहीं आता। चुनाव जीतने के बाद नेतागीरी के अलावा कुछ नहीं होता। विशाल आयोजनों, योजनाओं की लालीपाप से जनता को सिर्फ बरगलाया जाता है। ये इंडिया वो इंडिया, ये शहर वो शहर। जनता को इस लोक लुभावन चकाचौंध में इतना डूबा दिया जाता है कि वह अपना अच्छा बूरा समझ नहीं पाती। आज भी सड़क, पानी, ड्रेनेज, बिजली, यातायात रोजमर्रा के आम जन जीवन के ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं, जिन पर गंभीरता से काम होना चाहिए। विषय विशेषज्ञों की कमी भी हमेशा खलती है। होता यह है कि मूल समस्याएं मुंह बांए खड़ी रहती है और इनमें से कई के लिए तो जनता को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। नेता भी जनता को काम पर लगाए रखने में माहिर हो गए हैं। विभिन्न सरकारी दफ़्तरों में अपना नाम पता सुधरवाने और एक दूसरे से लिंक कराने में ही उसका आधा जीवन कट जाता है। खुद के करने वाले कार्यों के लिए भी जनता को मैदान में उतार दिया जाता है। देश, शहर हित में कभी ये दौड़, कभी वो दौड़। कभी ये समिट कभी वो सम्मेलन। जनता भी दौड़ती रहती है लेकिन इस दौड़ में उसके मूल मुद्दे काफी पीछे छूट जाते हैं।
लंबा अर्सा हो गया, इस देश, प्रदेश और शहर कस्बों ने कई दर्दनाक हादसे देखे हैं, लेकिन जिन नेताओं और अधिकारियों को इस तरह की घटनाओं के लिए कटघरे में होना चाहिए, वे तो निर्णायक की भूमिका में नजर आते हैं। नेता तो ठीक है, आजकल अधिकारी भी अपनी निजी आस्था का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से करने में लगे रहते हैं। जनता से जुड़े मुद्दे दरकिनार रहें तो रहें, अपना अधिकांश समय न किए जाने वाले कार्यों में गुजार देते हैं। और तो और जहां जनता के दर्द और दुख की कोई सीमा नहीं है, वहीं अब तो ख़ुशियाँ भी उधार की हो गईं है। आप अपनी खुशी से खुश नहीं हो सकते। कोई ओर तय करता है, आप इस बात पर खुश हो सकते हो। इस पर आप खुशियां नहीं मना सकते। इतनी रोक टोक और पाबंदी लगाई जाने लगी है, मानो जितनी तो एक बेटा भी अपने माता पिता तक की सहन ना करे। समय आ गया है, जनता को इधर उधर घुमाने की बजाय उनकी तकलीफ और पीड़ा को समझें। उनकी आम जरूरतों की पूर्ति सरकार करे। होता यह है कि आम जनता हर दम हर पल सरकार को हिसाब देती रहती है लेकिन फर्ज करो किसी दिन जनता ने सरकार से हिसाब मांग लिया तो सत्ता चाहे किसी दल की हो, कहीं की नहीं रह जाएगी।





