हमारी रसोई : भगवान्  शंकर के पूजन में लोकप्रिय प्रसाद गांकड़

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 हमारी रसोई: भगवान्  शंकर के पूजन में लोकप्रिय प्रसाद गांकड़

विकास शर्मा
गांकड या बाटी हमारे भोजन का सबसे सरलतम रूप है, जो प्राचीन समय से लेकर आज तक हमारे भोजन और प्रसाद का हिस्सा रहा है। इसके स्वरूप में जरूर क्षेत्रीय स्तर पर छोटा मोटा परिवर्तन हुआ है लेकिन इसका स्वाद, प्रासंगिकता और पवित्रता आज भी जस की तस बनी हुई है।
साधारण आटे की लोई को जब कंडे की मद्यम आँच में सेंका जाता है तब इसे हमारे क्षेत्र में गांकड़ के नाम से जाना जाता है। श्रवण मास में खासकर भगवान भोलेनाथ के दिन सोमवार को गांकड़ का प्रसाद बनाकर गुड़ के साथ प्रसाद ग्रहण किया जाता है। भाप में पकाकर जब इसे आग में भूना जाता है तो यह दाल बाटी तो कहीं दाल बाफले बन जाते हैं। इसमें मसाला भरकर जब भरते के साथ परोसा जाता है तो यह लिट्टी चोखा बन जाता है। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र में पलाश के पत्तों में लपेटकर सब्जी और मसाला भरकर इन्हें जब तैयार किया जाता है तो यह पानगे कहलाने लगते हैं। कहीं कहीं इन्हें गाखरे भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में बाटी को बैगन भरता के साथ खूब पसंद किया जाता है। इसीलिए हमारे यहाँ हमेशा इसके साथ बनायी जाती है दाल, भरता और हरी मिर्च का ठेसा।
Rajasthani Bharwan Masala Bati Recipe । राजस्थानी भरवां मसाला बाटी रेसिपी - News18 हिंदी
स्वादिष्ट गांकड़ बनाने के लिए गेंहू के आटे में लगभग एक चौथाई मात्रा का मक्के का आटा और बेसन (आधा आधा) मिला लें। थोड़ा जीरा, अजवाईन, सौंफ और स्वादानुसार नमक डालें। दो – चार चम्मच दही डालकर अच्छी तरह आटा गूथ लें। अब इसकी गोल गोल बाटियाँ बना लें और कंडे की बनी आग में इन्हें रख दें ऊपर से भी कंडे से ढक दें। 5 मिनट से 10 मिनट तक पकने दें। गांकड़ तैयार हो जायेंगी।
दाल को स्वादिष्ट बनाने के लिए मिक्स दाल का प्रयोग करें, पोई की भाजी, पत्तेदार प्याज और जो कुछ भी अन्य साग भाजी उपलब्ध हो इनका प्रयोग भी किया जा सकता है। 2- 3 टमाटर या 2 चम्मच आमचूर खटाई डालकर अच्छी तरह पकायें और बाद में इसे मिलाकर/ घोंटकर बघार लगा दें। ठेसा बनाने के लिए हरी मिर्च, जीरे, थोड़ी हरी धनिया, खड़ा धना, 8-10 काली लहसन आदि को तबे पर थोड़ा तेल डालकर भूनें और फिर इसे सिल बट्टे पर पीस लें। आवश्यकतानुसार दाल- बाटी में मिलाकर ग्रहण करें।।
वैसे बाटी के के साथ बैगन का भर्ता, टमाटर की चटनी, मिक्स दाल आदि पकाई जाती है किन्तु बाटी इन सभी में आधार स्तम्भ की तरह महत्वपूर्ण है। जिसे किसी भी व्यंजन के साथ परोस दिया जाये स्वाद आ ही जाता है। यह न सिर्फ भोजन है, बल्कि इसे हमारे यहाँ इसे गांकड के रूप में भगवान् भोलेनाथ के प्रसाद के तौर पर भी चढ़ाया जाता है। 16 सोमवार के पूजन का यह मुख्य प्रसाद / भोज है। पूजन करने वाले श्रद्धालु इसी प्रसाद को हलवे के साथ ग्रहण करते हैं।
मेपंचक्रोसी यात्रा  में श्रद्धालुओ के भोजन का मुख्य स्त्रोत यही बाटियाँ होती है। सावन में माह में ऋषि मुनि भी इसे विशेष तौर पर ग्रहण करते हैं। बाटी बहुत से क्षेत्रो की संस्कृति से जुड़ी हुयी है, खासतौर पर मालवा, मेवाड़ और बुंदेलखंड की संस्कृति का यह महत्वपूर्ण अंग है। गुजरात के मित्र इसे दाल बाफले के रूप में पकाते हैं और ग्रहण करते हैं।
इन सभी विशेषताओ के साथ मुझ जैसे घुमक्कड़ और आलसी इंसान के लिए भी यह पसंदीदा व्यंजन है, क्योंकि जब मैं घर से दूर अकेला रहकर पढाई करता था, तब खिचड़ी और गांकड़ मेरे महीने में 20 दिन बनने वाले व्यंजन थे। समय की बचत और पोषण का सम्पूर्ण ख्याल वाली कहावत इसी व्यंजन के साथ पूर्ण होती है।
डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म. प्र.)