
जहरीले पानी को ‘अमृत’ बनाने की राष्ट्रीय चुनौती महानगरों से गाँवों तक
आलोक मेहता
भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में कई बार सम्मानित इंदौर, इस समय एक गंभीर दूषित पानी संकट का सामना कर रहा है। शहर के इलाके में नल के पानी में गंदगी और सीवरेज मिला पानी मिलने की वजह से सैकड़ों लोग बीमार पड़े और कई जानें भी गई | सैकड़ों लोग बीमार पड़े और उन्हें उल्टी-दस्त, बुखार, पेट दर्द जैसी गंभीर लक्षणों के साथ अस्पतालों में भर्ती कराया गया। हजारों लोग प्रभावित हैं, जिनमें कई बच्चों और बुजुर्गों सहित पूरे परिवार शामिल हैं |
यह मामला सिर्फ इंदौर का स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि पूरे देश में जल गुणवत्ता, जल प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा तंत्र की मजबूती पर प्रश्नचिह्न है। राजधानी दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश , बिहार , महाराष्ट्र , पश्चिम बंगाल , हरयाणा , पंजाब जैसे कई राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र की सरकारें मिलकर अब अधिक तेजी से काम कर सकती है | दिल्ली को मॉडल बनाया जा सकता है |
इंदौर की भयावह घटना ने मुझे भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘ अमृत ‘ पेयजल परियोजना का ध्यान आया और शायद राज्यों के भी कान खड़े हों | फिर सरकार ही नहीं सामाजिक स्वयंसेवी संगठनों को भी प्रदूषित पानी और हवा के लिए अधिक सक्रियता से निगरानी अभियान चलाने होंगे |
इंदौर की घटना प्रशासन, इंजीनियरिंग अधिकारियों तथा नागरिकों के बीच जिम्मेदारी, निगरानी और जवाबदेही की को सामने लाती है। सुरक्षित पानी की कमी से स्वास्थ्य, जीवन और सामाजिक विश्वास को बड़ा नुकसान हो सकता है, इसलिए अब समय है कि मजबूत सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए ताकि भविष्य में ऐसी कोई त्रासदी दोबारा न हो।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने शोक व्यक्त किया और मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख मुआवजा देने की घोषणा की।जांच के आदेश दिए गए और एक तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है ताकि यह पता लगाया जा सके कि पानी में मिलावट कैसे हुई। कुछ विभागीय अधिकारी को बर्खास्त और निलंबित किये जाने की कार्रवाई हुई है | जांच से पहले ही यह तो तथ्य है कि पाइपलाइन में लीकेज या खराब कनेक्शन — जिससे सीवरेज (नालियों का पानी) पीने के पानी की सप्लाई लाइन में मिला। सिवरेज चैंबर का गलत निर्माण — रिपोर्टों में यह भी दावा है कि सीवरेज चैंबर को गलत तरीके से मुख्य ड्रिंकिंग लाइन के ऊपर बनाया गया, जिससे अपशिष्ट सीधे जल पाइप में मिला।
इधर राजधानी दिल्ली में भी गर्मियों के दौरान केवल पानी की कमी , बल्कि गुणवत्ता की समस्या भी बड़ी चुनौती है। इसका कारण यमुना नदी का प्रदूषण और कच्चे पानी का अस्थिर स्रोत जर्जर और पुरानी आपूर्ति नेटवर्क सीवर के मिल जाने के जोखिम , पानी की नियमित गुणवत्ता जांच का अभाव और लैब प्रमाणन का मुद्दा रहा है | इन सब वजहों से कुछ क्षेत्रों में गंदे, बदबूदार और स्वास्थ्य-खतरनाक पानी की आपूर्ति होती है, जिससे लोगों को प्रतिदिन की ज़रूरतें भी मुश्किल हो जाती हैं। पिछले साल आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान पूर्वी दिल्ली के निवासियों ने लगभग तीन महीनों से गंदा, दुर्गंधयुक्त पानी मिलने की शिकायत की। इनमें पानी पीने के अलावा त्वचा और पेट से जुड़ी बीमारियाँ भी सामने आईं। गंदे पानी से त्वचा और पेट संबंधी रोगों की शिकायतें सामने आई | सुप्रीम कोर्ट ने भी अनियमित, दूषित पानी की आपूर्ति वाले इलाकों का निरीक्षण करने को कहा है।
दिल्ली का पीने का पानी मुख्यतः यमुना नदी से आता है। यमुना का पानी अत्यधिक प्रदूषित है — रिपोर्टों में बताया गया कि अमोनिया जैसे प्रदूषक स्तर अधिक है, और यह जल उपचार संयंत्रों में आने से पहले ही दूषित होता है। इससे उपचार के बाद भी आपूर्ति की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कई इलाकों में 40-80 साल पुरानी पाइपलाइन है, जिससे पानी की गुणवत्ता बिगड़ रही है। सप्लाई के दौरान सीवर और पानी की पाइपलाइन के पास लीक होने और सीवेज-मिलावट की आशंका रहती है। सरकार ने पहचानते हुए जल और सीवर व्यवस्था को सुधारने की योजना बनाई है।
अब भारतीय जनता पार्टी की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार ने ने पानी सप्लाई, जल संरचना, यमुना नदी की सफाई, और दिल्ली जल बोर्ड को मजबूत बनाने को एक प्रमुख प्राथमिकता बनाया है। इसके तहत बोर्ड को वित्तीय सत्ता दी गई है ताकि बड़े प्रोजेक्टों के लिये पहले की तरह कैबिनेट से मंज़ूरी की आवश्यकता न पड़े, जिससे निर्णय त्वरित और प्रशासनिक देरी कम हो। सरकार ने यमुना नदी का पर्यावरण सुधार और साफ-सफाई कार्यक्रम भी शुरू किया है | भाजपा सरकार के पहले बजट में पेयजल, स्वच्छता और जल संरचना के लिये 9,000 करोड़ रूपये प्रदान किये गए, जो कि नये बोरवेल, पाइपलाइन अपग्रेड, बारिश के पानी का संरक्षण और यमुना सफाई पर जोड़ देता है। बोर्ड ने 735 करोड़ रूपये की धनराशि का प्रावधान किया है , जिससे पानी और सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिकीकरण किया जाएगा — जैसे पाइपलाइन बदलना, लाइन रिप्लेसमेंट, अंडरग्राउंड रिज़र्वॉयर इत्यादि। 300 करोड़ रुपये की नई पाइपलाइन परियोजन11 किलोमीटर कनेक्शन पाइपलाइन की योजना शुरू की गई है ताकि पानी की गुणवत्ता और सप्लाई स्थिरता को बेहतर बनाया जा सके और अमोनिया और दूषित पानी के प्रभाव को कम किया जा सके। लेकिन पूरी तरह से परिणाम जनता तक पहुंचने में समय लगता है | कुछ इलाकों में सुधार दिखाई दे रहे हैं, जबकि अन्य जगहों पर कार्य प्रगति की राह में हैं और सरकार को आगे भी क्रियान्वयन-ताक़त, निगरानी, और गुणवत्ता-जांच ज़्यादा मजबूत करने की आवश्यकता है।
सत्ता के पहले कार्यकाल में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने “हर घर नल से जल ‘ – जल जीवन मिशन शुरू किया | ग्रामीण भारत में हर घर नल कनेक्शन के लक्ष्य के साथ और फिर शहरी जल आपूर्ति के लिये “अटल मिशन फॉर रिजन्यूएशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन ‘ अमृत ” जैसी योजनाओं को शुरु किया।केंद्रीय बजट 2025-26 में ‘जल जीवन मिशन’ के लिये लगभग67,000 करोड़ रूपये आवंटित किये गये हैं, जो पिछले वर्ष के अनुमान (लगभग 29,916 करोड़ रूपये ) से काफी अधिक है। मिशन का कुल अनुमानित बजट पहले ₹3.60 लाख करोड़ था (2019-24) — यह ग्रामीण पेयजल के लिये केंद्र और राज्य मिलकर खर्च करते हैं। सरकार ने मिशन के लक्ष्य को 2028 तक बढ़ाया है, ताकि देशभर के सभी ग्रामीण घरों में नल से पानी की सप्लाई पूरी तरह सुनिश्चित की जा सके।
पहले ग्रामीण घरों में केवल लगभग 3.24 करोड़ घरों में टेप कनेक्शन था, लेकिन मिशन के लागू होने के बाद अब तक 15.5 करोड़ से अधिक घरों को नल से पानी मिल रहा है, यानी लगभग अस्सी प्रतिशत ग्रामीण घरों को कनेक्शन मिल चुका है। मिशन के तहत 2.66 लाख से अधिक गांवों में हर घर तक नल जल पहुँचाया जा चुका है, और कई क्षेत्र में स्थानीय महिलाओं को पानी की गुणवत्ता जांचने के लिये प्रशिक्षित किया गया।
अटल मिशन फॉर रिजन्यूएशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन ‘ अमृत ‘ 2015 में शुरू की गयी शहरी विकास योजना है। इसका उद्देश्य है शहरी क्षेत्रों में पानी की बेहतर आपूर्ति और सीवेज/स्वच्छता सुविधाओं को मजबूत करना। ‘ अमृत ‘ का दूसरा चरण 2.0, अक्टूबर 2021 में शुरू किया गया, जिसमें खासतौर पर शहरी टेप कनेक्शनों पर ज़ोर है — योजनाओं के तहत 4,700 से अधिक शहरों/नगरीय निकायों में पाइप जल आपूर्ति विकसित की जानी है, जिससे हर घर को पर्याप्त साफ पानी मिल सके। ‘अमृत ‘ 2.0 का कुल अनुमानित बजट लगभग 2.77 लाख करोड़ से 2.99 लाख करोड़ रूपये तक है, जिसमे केंद्र सरकार का हिस्सा लगभग 86,760 करोड़ रपये बताया गया है। इस बजट से पर्याप्त वॉटर सप्लाई नेटवर्क का निर्माण, जल भंडारण टैंकों की स्थापना, और घरों तक पाइप कनेक्शन देने का कार्य होता है।
उत्तर प्रदेश में हर घर जल योजना तेज़ी से आगे बढ़ रही है | अमृत 2.0 के अंतर्गत बरेली और कानपुर में बहुत बड़ी पेयजल परियोजनाएं लागू हो रही हैं। हालांकि, कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि बजट के अभाव या संचालन मुद्दों के कारण संविदा कर्मियों और इंजीनियरों को वेतन नहीं मिल रहा था, जिससे योजना में देरी हुई। मध्य प्रदेश में ‘हर घर नल से जल’ योजना की तरफ़ गहरा प्रयास किया जा रहा है और कुछ विभागों ने उज्जैन संभाग में लक्ष्य प्राप्त करने का दावा किया गया है, जिससे ग्रामीण इलाकों में नवीन सुधार देखकर सकारात्मक असर पड़ा है। शहरी क्षेत्रों में भी ‘ अमृत ‘ के तहत बड़ा निवेश हुआ है | भोपाल में 582 करोड़ रुपये की पेयजल परियोजना का भूमि पूजन किया गया जिससे तीन सालों में 100 प्रतिशत पानी नेटवर्क लक्ष्य पूरा करना है। हालांकि कहीं-कहीं मीडिया रिपोर्टों में यह भी आया कि अमृत/जलावर्धन योजनाओं पर खर्च के बावजूद कई इलाकों में पानी टैंकरों पर निर्भरता जारी है जो वास्तविक क्रियान्वयन की जटिलता को दर्शाता है।
राजस्थान सरकार ने शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति को बेहतर करने के लिये लगभग 5,120 करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है, जिससे राज्य के 176 शहरों और कस्बों में नए टेप कनेक्शनों का विस्तार होगा। इसके अलावा जल जीवन मिशन के तहत कुछ बड़ी जल परियोजनाओं के लिए 5,184 करोड़ की स्वीकृति दी गयी है। राज्य के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जल क्षेत्र को प्राथमिकता बताते हुए पानी स्रोतों, जल भंडारण और व्यवस्था सुधार पर ध्यान केंद्रित किया है। बिहार में भी बड़े स्तर पर पेयजल समस्याओं के समाधान के लिये परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं, जैसे गंगा वाटर लिफ्ट परियोजना जो मुख्य रूप से गंगा नदी से सप्लाई करके दक्षिण बिहार के शहरों में सुरक्षित जल पहुँचाने का प्रयास करती है। इस तरह अन्य राज्यों को भी अपनी जल परियोजनाओं का तेजी से क्रियान्वयन करना होगा | वहीँ शुद्ध जल के लिए सामाजिक जागरुकता और अभियानों की आवश्यकता होगी |





