
ज्ञानरंजन: रचना को नाम से ऊपर रखने वाला संपादक और मनुष्य
▪️डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी▪️
हिंदी साहित्य में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका मूल्यांकन केवल उनकी रचनाओं से नहीं किया जा सकता। वे अपनी वैचारिक दृढ़ता, मानवीय संवेदनशीलता और साहित्यिक ईमानदारी से एक पूरी पीढ़ी को दिशा देते हैं। ज्ञानरंजन ऐसे ही रचनाकार और संपादक थे, जिन्होंने कहानी को शिल्प नहीं, जीवन की सच्ची अभिव्यक्ति माना। उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए एक गहरी और मौन रिक्तता है।
▪️ज्ञानरंजन▪️
वे जिन्होंने ‘समय सरकता नहीं’, ‘पिता’ और ‘अपने-अपने युद्ध’ जैसी शानदार कहानियां लिखी. साहित्यिक पत्रिका पहल के संपादक रहे, जिस पत्रिका ने नई पीढ़ी के कई लेखकों को मंच दिया.
ज्ञानरंजन कहानीकार तो ज़ोरदार थे ही, इंसान भी ज़ोरदार थे. अपनी नव-ब्याहता पत्नी को विदाई के समय रिक्शे पर बिठाकर ले गए थे.
ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ को एक ऐसा मंच बनाया जहाँ उन्होंने स्थापित नामों की बजाय रचनाशीलता को तरजीह दी गई. एक पूरी नई पीढ़ी के लेखकों को तैयार किया. कई बार पहल पत्रिका विवादों में भी घिरी, लेकिन उन्होंने रचनात्मकता को कभी समझौता नहीं किया.
ज्ञानरंजन बड़े-बड़े नामों की बजाय रचनाओं को महत्व देते थे. वे खुद कम लिखते थे, लेकिन जो लिखते थे, वह गहरा प्रभाव छोड़ता था.
▪️विनम्र श्रद्धांजलि…
ज्ञानरंजन केवल एक चर्चित कहानीकार नहीं, बल्कि साहित्यिक मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उन्होंने रचना को पहचान से और लेखक को नाम से ऊपर रखा। ‘पहल’ के माध्यम से उन्होंने जोखिम उठाए, विवाद सहे, लेकिन रचनात्मक ईमानदारी से कभी समझौता नहीं किया। उनका व्यक्तित्व उतना ही सादा और मानवीय था जितना उनका साहित्य गहन और प्रभावशाली। ज्ञानरंजन का जाना एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उस दृष्टि का क्षय है जो साहित्य को सत्ता और प्रतिष्ठा से मुक्त रखना चाहती थी।
Mediawala परिवार की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि





