Controversy In West Bengal: क्या ममता बंगाल में राष्ट्रपति शासन चाहती है ?

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Controversy In West Bengal: क्या ममता बंगाल में राष्ट्रपति शासन चाहती है ?

रमण रावल

कानूनी तौर पर ममता बैनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री है, लेकिन उनका आचरण नितांत गैर कानूनी,अमर्यादित,आपत्तिजनक,अराजक और अव्यावहारिक नजर आता है। 8 जनवरी को ईडी की कार्रवाई के दौरान एक निजी पीआर एजेंसी के कार्यालय पहुंचकर बीच कार्रवाई से वे अनेक फाइलें,दस्तावेज उठाकर चलती बनी। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की पहली ऐसी घटना के तौर पर दर्ज की जायेगी, जिसमें किसी शासकीय जांच एजेंसी की कार्रवाई के बीच मुख्यमंत्री जैसे संवैधाननिक पद पर बैठे व्यक्ति ने बेजा दखल दिया हो। चूंकि मार्च-अप्रैल 2026 में बंगाल में विधानसभा चुनाव है तो इस घटना को उससे ही जोड़कर देखा जाना स्वाभाविक है। वैसे,केंद्र सरकार के खिलाफ उनके निरंतर जारी अमर्यादित व्यवहार के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि वे किसी भी तरह केंद्र को उकसाकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने को बाध्य करना चाह रही है। इससे वे जनता के बीच सहानुभूति पाने की मुहिम चलाते हुए गैर भाजपा दलों से समर्थन की अपेक्षा कर सकेगी । इतना तय है कि यह घटना बिना किसी ठोस कार्रवाई के तो नहीं रहेगी।

देश लंबे अरसे से देख रहा है कि ममता बैनर्जी ने केंद्र की सत्ता को हमेशा ठेंगे पर रखा और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने से पूरी तरह परहेज किया। वह एक संप्रभु राष्ट्र के अंदर ऐसे स्वतंत्र राज्य के मुखिया की तरह आचरण करती रही है,जिसमें केंद्र सरकार गौण है। विसंगति यह है कि किसी भी अन्य गैर भाजपाई राजनीतिक दल ने इसका विरोध या निंदा करना तो दूर ममता के इस व्यवहार का समर्थन ही किया । देश में इस तरह के दोहरे आचरण की अब तो भरमार रहने लगी है। याने मौका आने पर वे भी वैसा ही करने को तत्पर रहेंगे। कुछ अन्य गैर भाजपाई सत्ता वाले राज्य कम-अधिक यह करते भी रहे हैं। इसमें कर्नाटक,तेलंगाना,तमिलनाडु प्रमुख हैं। साथ ही देश के गंभीर मामलों में ज्ञान देने वाले,हस्ताक्षर अभियान चलाने वाले,आतंकवादियों के मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले, सुप्रीम कोर्ट को आधी रात खुलवाने वालों में से भी किसी के कान पर जू नहीं रेंगी। किसी को न तो लोकतंत्र खतरे में दिखा, न संविधान से खिलवाड़ नजर आया।

दरअसल,2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता आने के बाद से ही कांग्रेस समेत ज्यादातर भाजपा विरोधी दलों ने भाजपा की सत्ता को मानने से इनकार तो किया ही,अपनी मनमर्जी का आचरण भी किया । भले ही संवैधानिक व्यवस्था पर आघात हुआ हो। यदि ममता की ही बात करें तो उन्होंने एकाधिक मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बंगाल दौरे का बहिष्कार किया। कभी वे उनका रस्मी स्वागत करने एअरपोर्ट ही नहीं पहुंची तो कभी किसी पूर्व निर्धारित प्रवास का बहाना बनाकर एअरपोर्ट वे वापस चली गई ।

इसके अलावा भी बंगाल में पिछले दस साल से घोर अराजकता मची हुई है । वहां भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न और हिंसा आम बात है। मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू त्यौहारों के मनाने पर फसाद को रोका नहीं जाता। तुणमूल के कार्यकर्ताओं को चंदा दिेये बिना उनके वर्चस्व वाले इलाकों में कोई मकान तक नहीं बना सकता। अनेक अवसरों पर सीबीआई और ईडी के दलों पर हमले किये गये और हद तो यह है कि उन अधिकारियों पर ही एफआईआर दर्ज कर ली गई । ममता ने अनेक बार राज्यपाल तक के साथ शिष्टाचार निभाना जरूरी नहीं समझा और राजभवन के खिलाफ शिकायतें की गईं ।

बंगाल में हुई ताजा घटना ने तो लोकतंत्र की जड़ें हिलाकर रख दी हैं, लेकिन विपक्षी दलों में से किसी ने भी उफ तक नहीं की। मामूली घटनाओं पर लोकतंत्र व संविधान को खतरे में बताने वालों की जबान अंटार्कटिका की बर्फ की तरह जम गई है। यह समझ और तर्कों से परे है कि जिस आई पैक संस्थान के

मुखिया प्रतीक जैन के घर व दफ्तर पर ईडी ने छापा मारा, वहां पहुंचकर कार्रवाई में बाधा डालने व हार्ड डिस्क,मोबाइल,लेपटॉप के साथ ही अनेक फाइलें ले जाने जैसा गैर कानूनी काम मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को क्यों करना पड़ा ? यह संस्था लंबे समय से तृणमूल का चुनावी प्रबंधन कर रही है, सिर्फ इसलिये उसे यह अधिकार नहीं हो जाता कि वे केंद्र सरकार की जांच एजेंसी की कार्रवाई के दौरान हस्तक्षेप करे और उम्मीदवारों की सूची व अन्य पार्टी संबंधी दस्तावेजों के नाम पर असंवैधानिक कार्य करे ?

ऐसे में देश भर में यह प्रतिक्रिया होना लाजमी है कि ममता बैनर्जी को यह आशंका हो चली है कि वे आगामी विधानसभा चुनाव में विजयी नहीं हो सकती,इसलिये इस तरह के हथकंडे अपना रही है, जिससे राज्यपाल बंगाल में कानून व्यवस्था का राज समाप्त होने के आधार पर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करे, जिसे मान्य कर लिया जाये। इसके बाद वे चुनाव अभियान की धुरी ही राष्ट्रपति शासन को बताकर बंगाल की जनता का समर्थन जुटाये। वह सोचती है कि इससे वह एक बार फिर बंगाल की सत्ता पा सकती है।

यह तो बंगाल की जनता को ही तय करना रहेगा कि वे ममता के हठधर्मी,असंवैधानिक रवैये को खारिज करते हुए भाजपा को सत्ता सौंपते हैं या ममता को बनाये रखते हैं। फिर भी इतना तो तय ही है कि अगले चुनाव ममता के अस्तित्व का निर्धारण करने वाले साबित होंगे। मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण(एसआईआऱ) में बांग्लादेशी और म्यांमार के घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें मतदान से वंचित करने और यह नया हथकंडा देश के संवैधानिक ढांचे को सीधी चुनौती है।लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले अब प्रतीक्षा कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ममता को चलता करेगी या तीन माह होने वाले लोकतांत्रिक हथियार चुनाव के जरिये उन्हें आईना दिखायेगी ?