Indore: दम तोड़ चुके शहर की दास्तान

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Indore: दम तोड़ चुके शहर की दास्तान

जयश्री पिंगले

यह किसी बस्ती में बिछी हुई मौतों का मंजर नहीं यह दम तोड़ चुके शहर की दास्तान है. जहां कोहरे की चादर भी फिजां में लिपटे हुए कफन की तरह दिखाई दे रही है. सब कुछ धुंधला हो गया है. जैसे काल दबे पांव चहलकदमी कर रहा है. उन लाशों को अपने कंधे पर ढ़ो रहा है. जिनका गुनाह सिर्फ यह है कि वे इस शहर उस बस्ती में थे.

शहर जिंदा रहता है अपने बाशिंदों की धड़कनों में, उन मासूम आंखों में, उन नन्हीं सी हथेलियों में जिन्होंने तितलियों की तरह थामकर इसे उड़ान दी है. शहर इतराता है उन औरतों के खनकते कंगनों में, उनकी बेखौफ लहराती चाल में. वह जिंदा रहता है उन मर्दों के जूनून और बाजुओं की ताकत में, जहां बच्चे मीनार की तरह चढ़कर झूलते हुए गाते हैं.

इस शहर को किसने दश्त में तब्दील कर दिया. किन हालातों ने इसे मुकम्मल बरबादी की राह पर धकेल दिया. किन लोगों ने इसे अपनी वहशी ख्वाहिशों की चंगुलों में जकड़ लिया. जुल्मों की फेहरिस्त बेहिसाब है. नकाब ओढ़ कर आए हबीबों की शक्लें भी एक सी हैं. यह अपनी सल्तनत के 25 साल पूरे करने वाली भाजपा का फेल मॉडल है. जहां एक जिंदा शहर दम तोड़ने पर आमादा है. वह शहर जो सत्ता के आकाओं की सबसे बड़ी ताकत हो. उसे ही लूट कर खात्मा लिखा जा रहा है.

शहर उन नाकाबिल अफसरों के नाम कर दिया गया है, जो जनता की बजाय अपने आका की सलामी कर रहे हैं. नेता जनता की बजाय अपने पट्‌ठों की फिक्र कर रहे हैं. उन्हें दलाली से लेकर ठेकेदारी तक के कितने काम मिल रहे हैं उससे अपना वजन तोल रहे हैं. कब्जों से लेकर तोड़ बट्‌टे तक किस की चल रही है, उससे अपनी ताकत आंक रहे हैं. धंधा करने वालों की पेशी करवा कर कौन चमका सकता है, इससे अपना रसूख आंक रहे हैं. सत्ता धंधे का खेल हो गई है, जहां बेटे- भतीजों- रिश्तेदारों, पट्‌ठों की गैंग चल रही है. न कोई रोकने वाला है न कोई देखने वाला न टोकने वाला. इधर जनता पीने के पानी पर दम तोड़ रही है. क्योंकि उसकी फिक्र अब किसी को नहीं है. 15 सौ रू. में वह जेब में रख दी गई है. फ्री फोकट के अनाज के दम पर वह सत्ता के दालानों में बांध दी गई है. इसीलिए मौतें भी सत्ता की दीवार गिराकर हाहाकार नहीं मचाती. रुदालियों के दम पर शोक का तांडव मचाया जाता है और शाही सवारी आंख की कोर भिगोएं बगैर निकल जाती है.

अब यह बेशक्ल नहीं है कि इंदौर भाजपा की सत्ता में चल रहे अंदरूनी घमासान का शिकार है. मुख्यमंत्री मोहन यादव और कैलाश विजयवर्गीय के बीच भारी उठापटक और खींचतान है. कैलाश हर बार मुख्यमंत्री पद के लिए नकार दिए गए हैं. उमा भारती राज में वह अपने खड़ाऊ बाबूलाल गौर को देकर चलती बनीं. क्योंकि अपने आखिरी दौर में उमा के रिश्ते अपने सबसे खास कैलाश से बिगड़ गए. गौर को दिए गए खड़ाऊ तो उमा को भी वापस नहीं मिले. प्रमोद महाजन ने यह शिवराज को पहना दिए. जिन्हें 16 साल तक वे पहने रहे. इस दौरान भी कैलाश कहते रहे ठाकुर के हाथ कटे हुए हैं. लेकिन इस बार तो खेल तगड़ा हो गया .

संघ के बड़े नेता सुरेश सोनी जिन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का रास्ता साफ किया था. उन्होंने अपने सबसे खास कैलाश विजयवर्गीय की बजाय अपने नंबर दो खास मोहन यादव को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनवा दिया. यह भाजपा के लिए चौंकाने वाला था वहीं कैलाश के लिए बड़ा झटका था. अपने बेटे की राजनीतिक बल्ले के कारण पिटाए कैलाश को अपने से जूनियर को मुख्यमंत्री बनते स्वीकार करना पड़ा. सरकार बनने के बाद सोनी के दरबार में सुलह की कोशिश हुई लेकिन इस वजह नाकामयाब रही कि यादव ने इंदौर पर रखा अपना हाथ नहीं हटाया. अफसर ही नहीं कैलाश के खासम खास नेताओं को भी अपने दरबार में हाजिरी के लिए मजबूर कर दिया. हालत यह हो गए कि पूरे प्रदेश के नगरीय निकायों की कमान थामे बैठे कैलाश अपने घर में अपना नगर निगम नहीं चला पा रहे हैं.

अब बगैर शोर किए कह रहे हैं अफसर सुनते नहीं है. वक्त बदल गया है, पार्टी बदल गई है. एक वक्त था जब पटवा के राज में कैलाश ने तेवर दिखाते हुए मुख्य सचिव निर्मला बुच के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. कुशाभाऊ ठाकरे पार्टी अध्यक्ष थे तब अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी थी. अब हालात ऐसे नहीं है, उमा भारती कह रही हैं, जनता के बीच क्यों नहीं गए? कैलाश को पता है जनता के बीच जाना यानी जनता हो जाना है. मोदी की पार्टी कब किस को घर बैठा दे नहीं पता. खुद उमा भी तो घर बैठी हुई है.

आज कैलाश की ताकत उनके दो नंबरी पट्‌ठे हैं, उनकी ताकत से चुनाव जीतकर आए कमजोर महापौर हैं. और भाजपा अध्यक्ष बनकर बैठे उनके खास समर्थक हैं. उन्हें इन सब में उलझाकर मुख्यमंत्री यादव इंदौर के कभी घोषित तो कभी अघोषित प्रभारी बन गए हैं.

अफसर सब जानकर सब को किनारे रख अपने तरीके से शहर चला रहे हैं. शहर से लीडरशीप गायब हो गई है, जनता सड़कों पर बेहाल हैं, स्मार्ट सिटी के नाम पर बर्बादी के नज़ारे से जूझ रही है. तीस किमी के दायरे में मेट्रो कैसे चलेगी इसका पूरा प्लान पक्का तैयार नहीं है फिर भी आधे अधूरे प्लान के साथ ताबूत खड़े कर दिए गए हैं. पूरा शहर खोद खोद कर गुम कर दिया गया है. पानी की लाइनों में सीपेज मिल रहा है. लेकिन न तो महापौर को होश है न किसी विधायक, पार्षद को.

जिस जनता के आंदोलन के दम पर शहर को नर्मदा मिली, उस जन आंदोलन की ख्याति बटोरने वाले स्वयंभू नेता, जन संगठन सब गायब हैं. हिंदूवादी विचार की धारा इतनी हावी है कि संवेदना के पुल टूट गए हैं. कांग्रेस किस कदर जनता से बेखबर होकर चल रही है. वह दिन ब दिन और गाढ़ा होकर दिखाई दे रहा है. एक नेता एक संगठन मौत की आगोश में समा चुके लोगों के नाम पर राजबाड़ा पर मोमबत्ती जलाने नहीं गया. कांग्रेसी गए भी तो उनके घर जहां मौतों से आंखें नहीं सूख रही है.

इस पूरे दिल दहलाने वाले दौर में पत्रकार को घंटा बोलकर कैलाश ने एक तरह से मोहन यादव के लिए काम आसान कर दिया. सेल्फगोल में माहिर कैलाश ने प्रभारी मंत्री को फारिग कर दिया.

बेगुनाह मासूम मौतों से बड़ी कहानी घंटे के नाम पर चल पड़ी. प्रभारी मंत्री से सवाल की बजाय सब दूर घंटे बजते रहे. भाजपा में पत्रकारों को हड़काना नया नहीं है. दिल्ली से लेकर असम तक, उत्तर प्रदेश तक इसकी धमक है. कैलाश तो पुराने नेता है, जिन्होंने दांव उल्टा पड़ता देख माफी चिपका दी. पर वह पत्रकार जिसे घंटा बोला, जिसने करारा जवाब दिया,उसी का चैनल पूरे घटनाक्रम को पी गया.

संघ प्रमुख भागवत ने हाल ही में बयान दिया है कि भाजपा को देखकर संघ को समझने की भूल न करे. पर जब तक संघ अपने प्रचारक को संगठन मंत्री बनाकर भाजपा में भेजता रहेगा, तब तक यह सवाल उठते रहेंगे कि सत्ता के दो ताकतवर नेताओं का अखाड़े में शहर की सांसों को दांव पर कब तक लगाया जाएगा.