
इंदौर में जलजनित मौतों पर भ्रम: मृतकों की संख्या 7, 15 या 23? हाईकोर्ट में खुद सरकार के आंकड़े टकराए!
सरकार ने पेश की 158 पन्नों की रिपोर्ट, पर बीमारी और मौतों का कारण अब भी ‘अज्ञात’!अगली सुनवाई 20 जनवरी को
वरिष्ठ पत्रकार के. के. झा की खास रिपोर्ट
इंदौर: इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से फैले उल्टी-दस्त के प्रकोप और उससे जुड़ी मौतों को लेकर मध्यप्रदेश सरकार की स्थिति मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के इंदौर बेंच में और अधिक असहज होती नजर आ रही है। 158 पन्नों की जिस स्टेटस रिपोर्ट के जरिए सरकार ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की, उसी रिपोर्ट ने मौतों की संख्या, कारण और जिम्मेदारी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट में जहां सात मौतों की आधिकारिक पुष्टि की गई है, वहीं न तो इन मौतों के पीछे किसी स्पष्ट बीमारी का उल्लेख है और न ही यह साफ किया गया है कि दूषित पानी की भूमिका कितनी निर्णायक रही। इससे सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरा अंतर उजागर हुआ है।
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, भगीरथपुरा में उल्टी-दस्त के प्रकोप के दौरान उर्मिला (60), तारा (65), नंदलाल (70), हीरालाल (65), पाँच माह के शिशु अव्यान, अरविंद निखार (43) और भगवान भामे (73) की मौत हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ मरीजों की इलाज के दौरान मौत हुई, जबकि एक व्यक्ति को मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया।
हालांकि, सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पाँच माह के शिशु अव्यान और 43 वर्षीय अरविंद निखार की मौत का कारण “अज्ञात” दर्ज किया गया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) की रिपोर्ट में भी किसी विशिष्ट बीमारी का उल्लेख नहीं है, जिससे पूरे मामले पर संदेह और गहराता है।
मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास मौतों की वास्तविक संख्या को लेकर सामने आया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक के वकील विभोर खंडेलवाल ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार के वकील ने मौखिक रूप से स्वीकार किया कि भगीरथपुरा में कुल 23 मौतें हुई हैं, जिनमें से 15 मौतें दूषित पानी के सेवन से जुड़ी हैं। यह आंकड़ा सरकार की लिखित रिपोर्ट में दर्ज सात मौतों से बिल्कुल अलग है।
हाईकोर्ट के निर्देश पर राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश हुए। उन्होंने बताया कि भगीरथपुरा में फिलहाल टैंकरों के माध्यम से शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। सभी संदिग्ध जल स्रोतों को बंद कर दिया गया है और 51 ट्यूबवेल्स का उपयोग रोकते हुए उनमें क्लोरीनेशन सहित अन्य शुद्धिकरण प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं।
मुख्य सचिव ने यह भी जानकारी दी कि डोर-टू-डोर सर्वे के जरिए लगभग 1.62 लाख लोगों की स्वास्थ्य जांच की गई। उल्टी-दस्त से प्रभावित 440 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से 411 को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई है, जबकि 29 मरीज अभी भी उपचाराधीन हैं। उन्होंने कहा कि सभी मरीजों के इलाज का खर्च राज्य सरकार वहन कर रही है।
सरकार ने यह दावा भी किया कि भगीरथपुरा क्षेत्र में विभिन्न स्थानों से पेयजल के नमूनों की जांच कराई जा रही है और नई जल आपूर्ति पाइपलाइन बिछाने के लिए ठेके जारी कर दिए गए हैं। इस संबंध में राज्य सरकार और इंदौर नगर निगम की अलग-अलग रिपोर्टें अदालत में प्रस्तुत की गईं।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि इन सभी रिपोर्टों की प्रतियां याचिकाकर्ताओं के वकीलों को उपलब्ध कराई जाएं और उनसे 19 जनवरी तक जवाब मांगा जाए। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी, जिसमें मुख्य सचिव को एक बार फिर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होना होगा।
उधर, स्थानीय निवासियों का दावा है कि भगीरथपुरा में दूषित पानी से फैले इस प्रकोप में अब तक 24 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं, सरकारी महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज की एक समिति की ‘डेथ ऑडिट’ रिपोर्ट में भी 15 मौतों को इस जलजनित प्रकोप से संभावित रूप से जुड़ा बताया गया है।
इस तरह, हाईकोर्ट में पेश सरकारी दस्तावेज, मौखिक बयान, मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट और स्थानीय लोगों के दावे—चारों में मौतों के आंकड़े अलग-अलग हैं। यही कारण है कि इंदौर में जलजनित मौतों की वास्तविक संख्या और जिम्मेदारी को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं हो सकी है और अदालत की निगाहें 20 जनवरी की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।





