Anandpur Trust case: कलेक्टर आदित्य सिंह की रवानगी से सरकार और IAS तंत्र की कार्यप्रणाली कटघरे में

"जब कार्रवाई की रफ्तार सवालों से तेज हो जाए"

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Anandpur Trust case: कलेक्टर आदित्य सिंह की रवानगी से सरकार और IAS तंत्र की कार्यप्रणाली कटघरे में

BHOPAL:अशोकनगर कलेक्टर आदित्य सिंह को हटाने का आदेश जिस तेजी और गोपनीयता के साथ जारी हुआ, उसने प्रशासनिक हलकों में असहजता पैदा कर दी। यह वही अधिकारी थे जिनके कामकाज की सराहना हाल ही में एसआईआर के तहत की जा रही थी और जिनका नाम बेहतर प्रशासनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तावित था। आदेश में न तो किसी जांच का उल्लेख था और न ही किसी ठोस प्रशासनिक विफलता का। ऐसे में यह मामला केवल ट्रांसफर नहीं, बल्कि सरकार और आईएएस अधिकारियों के बीच भरोसे के संकट का संकेत बन गया है।

● आनंदपुर ट्रस्ट से जुड़ी शिकायतें और प्रशासनिक टकराव
पिछले कुछ महीनों से आनंदपुर ट्रस्ट को लेकर जिले में लगातार शिकायतें सामने आ रही थीं। किसानों और स्थानीय निवासियों का आरोप था कि ट्रस्ट से जुड़े लोग उनकी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं और प्रशासन से कार्रवाई की मांग की जा रही थी। जनसुनवाई में ये शिकायतें बार-बार दर्ज हुईं। कलेक्टर आदित्य सिंह ने कई मामलों में मौके पर सख्त रुख अपनाते हुए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करवाई, जिससे ट्रस्ट और जिला प्रशासन के बीच तनाव की स्थिति स्पष्ट रूप से उभरने लगी थी।
● नामांतरण विवाद और रिश्वत के आरोपों की वास्तविक स्थिति
कलेक्टर पर आनंदपुर ट्रस्ट से जुड़े एक कथित नामांतरण के बदले तीन करोड़ रुपये मांगे जाने का आरोप सामने आया। लेकिन प्रशासनिक रिकॉर्ड की स्थिति यह दर्शाती है कि ट्रस्ट का ऐसा कोई नामांतरण लंबित नहीं था। ट्रस्ट में नया गुरु छह वर्ष से अधिक समय से पदभार संभाले हुए है, ऐसे में नामांतरण की प्रक्रिया पहले ही पूर्ण मानी जाती है। इस विरोधाभास ने आरोपों की गंभीरता और उनकी टाइमिंग दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
● ट्रस्ट के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान
आनंदपुर ट्रस्ट केवल धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि एक संगठित और प्रभावशाली संरचना के रूप में उभरा है। बीते तीन वर्षों में ट्रस्ट के भीतर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर लगातार खींचतान की खबरें सामने आती रही हैं। पुराने संतों को हटाया जाना, नए प्रभावशाली चेहरों का उभरना और आंतरिक गुटबाजी ने ट्रस्ट को विवादों के केंद्र में रखा है। इस अंदरूनी संघर्ष का असर अब प्रशासनिक फैसलों तक पहुंच गया, ऐसा स्थानीय स्तर पर खुलकर कहा जा रहा है।
● सरकार की कार्यशैली और आईएएस अधिकारियों में असुरक्षा
इस पूरे घटनाक्रम ने आईएएस अधिकारियों के बीच यह संदेश दिया है कि शिकायत आते ही अधिकारी को हटाना प्राथमिक विकल्प बनता जा रहा है। बिना विभागीय जांच, बिना निष्कर्ष और बिना सार्वजनिक स्पष्टीकरण के कार्रवाई होना प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। हालिया बैठकों में यह टिप्पणी सामने आना कि कोई भी कलेक्टर बिना पैसे लिए काम नहीं कर रहा, पूरे प्रशासनिक तंत्र को एक साथ कटघरे में खड़ा कर देता है।
● कार्रवाई पहले, जांच बाद में की प्रवृत्ति
आदित्य सिंह की रवानगी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान व्यवस्था में पहले निर्णय और बाद में तथ्यों की तलाश की प्रवृत्ति मजबूत हो रही है। न तो किसी आपराधिक मामले की पुष्टि हुई और न ही कोई विभागीय रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, फिर भी उन्हें हटाने का आदेश जारी कर दिया गया। इससे यह संदेश गया है कि प्रभावशाली संस्थानों से टकराव करने वाले अधिकारियों की स्थिति कमजोर हो सकती है, चाहे उनका रिकॉर्ड कैसा भी रहा हो।
● प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव
कलेक्टर के अचानक हटने से जिले में प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित हुई है। जिन मामलों में कार्रवाई चल रही थी, विशेषकर जमीन से जुड़े विवाद, वे अधर में लटक गए हैं। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठने लगा है कि क्या अब शिकायत करने वाले किसानों को न्याय मिलेगा या फिर मामला दब जाएगा। प्रशासनिक फैसलों पर जनता का भरोसा तभी टिकता है जब कार्रवाई निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे।

▪️निष्कर्ष: एक आदेश, कई सवाल
आदित्य सिंह की रवानगी एक व्यक्ति का मामला नहीं रह गई है। यह सरकार की प्रशासनिक सोच, प्रभावशाली संस्थानों की भूमिका और आईएएस तंत्र की स्वतंत्रता पर सीधा सवाल बन चुकी है। जब बिना ठोस जांच के कार्रवाई होती है, तो सिस्टम की विश्वसनीयता कमजोर होती है। यह प्रकरण बताता है कि प्रशासनिक सख्ती और राजनीतिक-सामाजिक दबाव के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।