
‘अशांति’ के सागर में ‘शांति’ के मोतियों की कल्पना बेमानी है…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना अशांति के सागर से की जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है। अशांति के ऐसे सागर में शांति के मोतियों की कल्पना बेमानी ही मानी जा सकती है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बोर्ड ऑफ पीस का गठन करना शायद दुनिया का सबसे बड़ा मजाक है। ट्रंप एक तरफ ग्रीनलैंड को हथियाने के लिए यूरोप और डेनमार्क पर खुलेआम दादागिरी कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ बोर्ड ऑफ पीस बनाकर शांति के मसीहा बनने का स्वांग रच रहे हैं। वेनेजुएला पर दादागिरी दिखाकर जबरन कब्जा कर रहे हैं और दूसरी तरफ नोबेल पीस प्राइज पर भी कब्जा करने को आतुर हैं। पूरी दुनिया में आर्थिक आतंकवाद फैला रहे हैं तो सामरिक आतंक फैलाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ऐसे में बोर्ड ऑफ पीस के कितने मायने रह जाते हैं यह कल्पना की ही जा सकती है। और भारत ऐसे किसी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होकर महान भूल नहीं करेगा, यह उम्मीद नहीं बल्कि भरोसा भी किया जा सकता है। ट्रंप और मोदी का मिलन भी अब बोर्ड ऑफ पीस की तरह ही एक जुमला माना जाना चाहिए। और ट्रंप के पागलपन के बाद अमेरिका और भारत में भी अब दोस्ती की गुंजाइश ना के बराबर ही बची है। इसीलिए भारत ही नहीं रूस और चीन जैसे बड़े देशों ने भी अब तक ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस से दूरी ही बनाकर रखी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 जनवरी 2026 को दावोस में बोर्ड ऑफ पीस के गठन का ऐलान कर दिया है। उनकी ओर से इसका जो प्रस्ताव दिखाया गया है, उसमें 8 मुसलमान मुल्कों समेत कई देशों की ओर से सहमति का पत्र था। गाजा को फिर से खड़ा करने के लिए तैयार इस बोर्ड को लेकर मुसलमान देश तो जुड़ गए हैं, लेकिन यूरोपियन यूनियन के देश हिचक रहे हैं। इसके अलावा भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देशों ने भी अब तक इससे दूरी ही बनाकर रखी है। इसके अलावा फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देश भी दूर ही हैं। ऐसी स्थिति में भारत नहीं चाहता कि वह आगे बढ़कर इसकी सदस्यता ले। इसके अलावा गाजा का मामला भारत की आंतरिक राजनीति के लिहाज से भी संवेदनशील रहा है। अब तक इस समूह से इजरायल, जॉर्डन, इंडोनेशिया, मिस्र, बुल्गारिया, बेलारूस, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात जुड़े हैं। ये ज्यादातर ऐसे देश हैं, जो इस्लामी राष्ट्र हैं। गाजा में शांति और वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कराने में इनकी दिलचस्पी है। लेकिन यूरोप के देश तो दूर ही रहे हैं। असल में इसकी वजह यह है कि अमेरिका के करीबी रहे यूरोप के देशों को भी डर है कि कहीं अमेरिका अब ट्रंप के नेतृत्व में सामूहिक की जगह व्यक्तिगत तौर पर खुद का वर्चस्व बनाने को आतुर है। ऐसे में कोई भी महत्वाकांक्षी और जिम्मेदार राष्ट्र अमेरिका के समर्थन में खड़ा नहीं हो सकता। विशेष तौर पर संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने वाले डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने भी आशंकाएं बढ़ा दी हैं। कोई देश नहीं चाहता कि यूएन जैसे बहुदेशीय संगठन की जगह अमेरिका के एकतरफा वर्चस्व वाले बोर्ड ऑफ पीस को ताकत मिले।
वैसे भी बोर्ड ऑफ पीस के भविष्य को लेकर अनिश्चितता की स्थिति है। डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने के बाद वैसे भी यह अस्तित्वहीन हो जाएगा। और भारत ने हमेशा ही संयुक्त राष्ट्र संघ और सामूहिक सहभागिता को महत्व दिया है। और फिलहाल भारत को लेकर ट्रंप का जो व्यवहार है, उसके आधार पर भी भारत और अमेरिका के बीच आपसी समर्थन की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है।
तो यही माना जा सकता है कि भारत अशांति के सागर में डूब कर शांति के मोती पाने की बेमानी कल्पना नहीं कर सकता है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डोनाल्ड ट्रंप को लेकर खट्टे अनुभवों की माटी में अब दोनों देशों के बीच दोस्ती का वट वृक्ष पनपने की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं। पारस्परिक लाभों और हितों की बुनियाद पर अस्थायी मैत्री का दृश्य सामने जरूर दिख सकता है लेकिन यह कतई संभव नहीं है कि बोर्ड ऑफ पीस में भारत अमेरिका के कंधे से कंधा मिलाकर हुंकार भरने की भारी भूल करेगा…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





