खुशवंत सिंह का “दीर्घायु” जीवन दर्शन

67

खुशवंत सिंह का “दीर्घायु” जीवन दर्शन

खुशवंत सिंह की कहानी “दीर्घायु” केवल उम्र लंबी करने की तकनीक नहीं है। यह जीवन के प्रति अनुशासन, मानसिक शांति, स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन का गहरा दर्शन प्रस्तुत करती है। 98 वर्ष की उम्र में भी जब वे रचनात्मक और सक्रिय रहे, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि दीर्घायु केवल जीन या भाग्य पर निर्भर नहीं करती।

उनके अनुसार खाने-पीने की आदतें, नियमित अनुशासन, शारीरिक और मानसिक सक्रियता तथा मन का संतुलन ही लंबे और सार्थक जीवन की असली कुंजी है। उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि बुढ़ापे के साथ तालमेल बिठाना और जीवन को पूरी तरह स्वीकार करना दीर्घायु का सबसे बड़ा रहस्य है।

*▪️दीर्घायु▪️*

अब जब मैं 98 के करीब हूँ और आज भी अपने युवा दिनों से ज़्यादा कमा रहा हूँ, तो लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं यह सब कैसे कर पाता हूँ। वे मुझे दीर्घायु का विशेषज्ञ मान लेते हैं। इस विषय पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ। पिछले दो वर्षों के अनुभव के आधार पर कुछ संशोधनों के साथ वही बातें फिर दोहरा रहा हूँ।

पहले मैंने लिखा था कि दीर्घायु बहुत हद तक व्यक्ति के जीन पर निर्भर करती है। लंबे समय तक जीने वाले माता-पिता की संतानें सामान्यतः अधिक उम्र तक जीवित रहती हैं। यह नियम मेरे परिवार में पूरी तरह लागू नहीं हुआ। मेरे माता-पिता क्रमशः 90 और 94 वर्ष की आयु में चल बसे। उनकी पाँच संतानें थीं—चार बेटे और एक बेटी।

सबसे पहले सबसे छोटा भाई गया। उसके बाद मेरी बहन, जो चौथे क्रम पर थी, का देहांत हुआ। मुझसे तीन वर्ष बड़े मेरे बड़े भाई भी कुछ वर्ष पहले चल बसे। अब हम दो ही बचे हैं—मैं, जो शीघ्र ही 98 का हो जाऊँगा, और मेरा छोटा भाई, एक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर, जो मुझसे तीन वर्ष छोटा है और स्वास्थ्य में मुझसे कहीं बेहतर है। वही हमारी पैतृक संपत्ति की देखभाल करता है।

फिर भी मैं मानता हूँ कि किसी व्यक्ति की जीवन-अवधि तय करने में जीन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेकिन दीर्घायु का विश्लेषण करने से भी अधिक ज़रूरी है—बुढ़ापे से तालमेल बिठाना और उसे स्वीकार करना।

 

*▪️बदलती उम्र और शरीर की ज़रूरतें*

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर के अंगों की सक्रियता घटती जाती है। इसलिए उन्हें सक्रिय रखने के नए उपाय खोजने पड़ते हैं। अस्सी के दशक के मध्य तक मैं रोज़ सुबह टेनिस खेलता था। सर्दियों में लोधी गार्डन के चक्कर लगाता था और गर्मियों में एक घंटा तैरता था। अब यह सब संभव नहीं है।

इस कमी की भरपाई का सबसे बेहतर तरीका है—नियमित मालिश। मैंने कई तरह की मालिशें आज़माईं। तेल टपकाने या शरीर पर तेल मलने से मुझे निराशा ही मिली। अच्छी मालिश वही है जिसमें मज़बूत हाथ सिर से लेकर पैरों तक पूरे शरीर पर काम करें। मैं यह मालिश रोज़ कम से कम एक बार और कभी-कभी दो बार भी करवाता हूँ।

मुझे पूरा विश्वास है कि इसी आदत ने मुझे इतने वर्षों तक सक्रिय रखा है।

 

*▪️संयमित भोजन और जीवनशैली*

उतना ही ज़रूरी है—खाने-पीने की मात्रा में भारी कटौती। मैं सुबह की शुरुआत अमरूद के रस से करता हूँ, जो स्वाद और स्वास्थ्य दोनों की दृष्टि से उत्तम है। नाश्ते में एक स्क्रैम्बल्ड अंडा और टोस्ट लेता हूँ। दोपहर के भोजन में अक्सर पतली खिचड़ी दही के साथ या कोई हल्की सब्ज़ी होती है।

मैं शाम की चाय नहीं लेता। शाम को एक पैग सिंगल-माल्ट व्हिस्की लेता हूँ, जो मुझे झूठी भूख से बचाती है। रात का खाना खाने से पहले मैं खुद से कहता हूँ—“ज़्यादा मत खाओ।”

मेरा मानना है कि भोजन में एक ही प्रकार की सब्ज़ी या मांस हो और उसके बाद चुटकी भर चूरन लिया जाए। अकेले और शांति से खाना सबसे अच्छा होता है। खाते समय बातचीत करने से भोजन का सम्मान नहीं होता और आदमी ज़्यादा खा लेता है।

अब न मुझे पंजाबी भोजन चाहिए, न मुग़लई। दक्षिण भारतीय इडली, सांभर और कसा नारियल मुझे अधिक सुपाच्य और स्वास्थ्यकर लगते हैं।

*▪️पेट, अनुशासन और मन की शांति*

कब्ज़ होने मत दीजिए। पेट तमाम बीमारियों का घर है। बैठा-बैठा जीवन हमें कब्ज़ की ओर ले जाता है। पेट को साफ रखें—जुलाब, एनीमा या अन्य किसी उपाय से। महात्मा गांधी पेट साफ रखने के महत्व को भली-भांति समझते थे।

अपने जीवन में कड़ा अनुशासन रखें। ज़रूरत पड़े तो स्टॉप-वॉच का उपयोग करें। मैं नाश्ता 6:30 बजे, दोपहर का भोजन 12 बजे, पेय 7 बजे और रात का खाना 8 बजे लेता हूँ।

*▪️मन की शांति*

मन की शांति विकसित करें। इसके लिए आर्थिक सुरक्षा भी आवश्यक है। यह ज़रूरी नहीं कि धन करोड़ों में हो, बस भविष्य की ज़रूरतों और बीमारी के समय पर्याप्त हो। कभी गुस्सा न करें। कभी झूठ न बोलें। हमारे राष्ट्रीय आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” को हमेशा याद रखें।

*▪️दान, संतोष और जीवन का आनंद*

दिल खोलकर दान दें। याद रखें, इसे अपने साथ नहीं ले जा सकते। बच्चों, कर्मचारियों या समाज के लिए दें। देने में आनंद है। उन लोगों से ईर्ष्या न करें जो आपसे आगे निकल गए हों।

एक पंजाबी पंक्ति इसे सुंदर ढंग से कहती है—

रूखी-सूखी खाइ के ठंडा पानी पी

ना वेख पराई चोपड़ियां, ना तरसें जी

*▪️ सिर्फ पूजा पाठ हार मान लेने जैसा है*

बुज़ुर्गों को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह हार मान लेने जैसा है। इसके बजाय कोई शौक अपनाएँ—बागवानी करें, बोन्साई उगाएँ या बच्चों को पढ़ाएँ।

*▪️ध्यान और आत्मिक संतुलन*

एक अभ्यास जो मुझे अत्यंत प्रभावी लगा- मोमबत्ती की लौ पर ध्यान केंद्रित करना, मन को विचारों से खाली करना और भीतर-ही-भीतर “ॐ शांति, ॐ शांति, ॐ शांति” का जप करना। यह सचमुच काम करता है।

मैं संसार के साथ शांति में हूँ। हम सब सौ साल की उम्र में मैराथन दौड़ने वाले फौजा सिंह नहीं बन सकते, लेकिन दीर्घायु और रचनात्मकता में उनके बराबर तो हो ही सकते हैं।

मैं अपने सभी पाठकों को लंबी, स्वस्थ और आनंदपूर्ण ज़िंदगी की शुभकामनाएँ देता हूँ।

— खुशवंत सिंह

*▪️दीर्घायु और जीवन का सार*

यह कहानी सिखाती है कि दीर्घायु केवल समय बढ़ाने का नाम नहीं है, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन, अनुशासित दिनचर्या और सामाजिक संतुलन ही इसका वास्तविक आधार है।

खुशवंत सिंह का जीवन अनुभव बताता है कि बुढ़ापे को स्वीकार कर, उसकी सीमाओं के अनुरूप जीवनशैली अपनाकर ही लंबा और सार्थक जीवन जिया जा सकता है।

खुशवंत सिंह(1915- 2014)