माँ नर्मदा जयंती : अस्तित्व का आधार माँ नर्मदा

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माँ नर्मदा जयंती : अस्तित्व का आधार माँ नर्मदा

तुम मुझे माँ कहते हो…

और सच कहूँ, यही मेरा सबसे बड़ा परिचय है।यही मेरा मानवता से आत्मिक रिश्ता है।मैं बहती हूँ, पर केवल जल बनकर नहीं,मैं बहती हूँ ममता, क्षमा और जीवन बनकर।

*मेरा नाम नर्मदा है।*

युगों से समाज ने मुझे माँ नर्मदा कहा है।जब बहुत कुछ जन्म भी नहीं लिया था, तब भी मैं थी।

इसीलिए पुराणों ने मेरे अस्तित्व को शब्द दिए,और रेवा-खण्ड में मेरी सम्पूर्ण कथा अंकित की।

अमरकंटक…

मेरी जन्मस्थली नहीं, मेरी माँ की गोद है।वहीं मैं एक छोटी सी धार बनकर प्रकट होती हूँ।इतनी कोमल कि एक बालक हँसते-हँसते मुझे लाँघ जाए,और इतनी विशाल कि भरूच पहुँचते-पहुँचते,मेरा आँचल बीस किलोमीटर तक फैल जाता है।यह विस्तार मेरे ह्रदय की विशालता का ही है।सब के कंठ को अपने प्रेममय जल से भर दुं।

पत्थरों से टकराकर भी मैंने रास्ता नहीं बदला,पहाड़ों ने रोका तो मैं झुकी नहीं,

मैदानों में आई तो रुकी नहीं।

पूर्व से पश्चिम बहती हुई

*मैं इस धरती की ऐसी धारा हूँ जो विरुद्ध दिशा में भी मर्यादा निभाती है।*

लोग मुझे रेवा भी कहते हैं,

क्योंकि मैं हँसते-हँसते दौड़ती हूँ,

उछलती हूँ, कूदती हूँ,

और *हर कंठ की प्यास बुझाकर भी थकती नहीं।*

करोड़ों लोगों ने मेरी परिक्रमा की।

किसी ने मोक्ष माँगा,

किसी ने शांति,

किसी ने जीवन का अर्थ।

*मैंने निरक्षर को भी अध्यात्म दियाऔर विद्वान को भी विनम्रता सिखाई।*

मेरे उदर से निकला हर कण

शिवलिंग का स्वरूप लेता है,

यह मेरा चमत्कार नहीं,

मेरी आत्मा की शुद्धता का प्रमाण है।

*अब माँ की वेदना सुनो*

तुम मुझे माँ कहते हो…

पर क्या कभी माँ की आँखों में झाँका है?

मैंने स्वीकार किया,जब तुमने मेरी छाती पर बाँध बनाए।मैंने सह लिया,जब तुमने मेरे प्रवाह को बाँध दिया।

*क्योंकि माँ हूँ*

मुझे तुम्हारे खेत हरे रखने थे,तुम्हे अन्न भी प्रदान करना है,तुम्हारे घरों तक जल पहुँचाना था।

पर आज मेरा हृदय भारी है।

तुम मेरे पास आते हो,पवित्र होने के लिए नहीं,मुझे अपवित्र करने के लिए।साबुन, शैम्पू,कपड़े,सब कुछ मेरे आँचल में।

शहरों की नालियाँ,उद्योगों का ज़हर,और घरों की गंदगी सब मुझे सौंप देते हो यह सोचकर कि माँ सब सह लेगी।मेरे तटों पर तीर्थ हैं,जहाँ पूजा के फूलों के साथ प्लास्टिक भी बहाया जाता है।

श्रद्धा के नाम पर मेरा अस्तित्व धीरे-धीरे घुट रहा है।

मैं चुप रही…

*क्योंकि माँ रोती नहीं,वह भीतर ही भीतर टूटती है।*

मेरी बहन क्षिप्रा को,तुमने लगभग खो ही दिया था।मैंने उसे नव जीवन दिया,पर क्या सीख मिली।

*एक अंतिम पुकार*

मेरे बच्चों…

यदि तुमने आज मुझे नहीं बचाया,तो कल तुम्हारे बच्चे मुझे माँ नहीं कहेंगे।वे मुझे केवल एक सूखती हुई नदी के रूप में जानेंगे,और तब इतिहास कहेगा,

एक माँ थी जो सब कुछ देती रही,और बदले मेंउपेक्षा पाती रही।मैं विलुप्त हो जाऊँगी,पर मेरा दुःख तुम्हारी आत्मा पर चिह्न बनकर रह जाएगा।

*मुझे पूजा नहीं चाहिये,मुझे सम्मान चाहिये मुझे नारे नहीं चाहिये,मुझे संरक्षण चाहिये।*

यदि सच में मुझे माँ कहते हो,

तो मुझे बचाओ।

नर्मदे हर।

श्रीकृष्ण शरणं मम॥

नितिन वैद्य