SIT जांच में खुलासा: दो घंटे तक पानी में तड़पता रहा युवराज, सिस्टम की चूक ने ली जान

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SIT जांच में खुलासा: दो घंटे तक पानी में तड़पता रहा युवराज, सिस्टम की चूक ने ली जान

Noida: नोएडा में 16 दिसंबर की रात हुआ युवराज मेहता हादसा अब महज एक सड़क दुर्घटना नहीं माना जा रहा। विशेष जांच दल की जांच ने इसे प्रशासनिक लापरवाही, विभागीय तालमेल की कमी और आपदा प्रबंधन की असफलता का गंभीर मामला साबित कर दिया है। SIT की रिपोर्ट में स्पष्ट संकेत मिले हैं कि यदि समय पर रेस्क्यू होता, तो युवराज की जान बचाई जा सकती थी।

● घटना की पृष्ठभूमि: एक गड्ढा, पानी और मौत का इंतजार

16 दिसंबर की रात नोएडा सेक्टर-150 क्षेत्र में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता अपनी कार से जा रहे थे। रास्ते में निर्माणाधीन प्लॉट के पास बना गहरा गड्ढा बारिश और सीवर के पानी से भरा हुआ था। अंधेरे में यह गड्ढा नजर नहीं आया और कार सीधे उसमें जा गिरी। युवराज कार के अंदर फंसे रहे और मदद के लिए आवाज लगाते रहे, लेकिन समय पर कोई प्रभावी रेस्क्यू नहीं हुआ। करीब दो घंटे तक पानी में संघर्ष के बाद उनकी मौत हो गई।

● हादसे से बड़ा सवाल: समय रहते रेस्क्यू क्यों नहीं हुआ

SIT जांच का सबसे अहम सवाल यही रहा कि जब पुलिस, फायर ब्रिगेड और अन्य एजेंसियां मौके पर पहुंच चुकी थीं, तो युवराज को बाहर क्यों नहीं निकाला गया। जांच में सामने आया कि शुरुआती समय में किसी भी विभाग के पास न तो पर्याप्त उपकरण थे और न ही स्पष्ट नेतृत्व। रेस्क्यू ऑपरेशन बिना दिशा के चलता रहा, जिससे बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ।

● SIT जांच: सैकड़ों पन्नों की रिपोर्ट और दर्जनों बयान

सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल ने इस पूरे मामले की गहराई से जांच की। अलग अलग विभागों से रिपोर्ट तलब की गईं। पुलिस, नोएडा प्राधिकरण, फायर विभाग, ट्रैफिक और जल सीवर विभाग से विस्तृत जवाब मांगे गए। 100 से अधिक लोगों के बयान दर्ज किए गए, जिनमें कंट्रोल रूम, SDRF, पुलिसकर्मी और रेस्क्यू टीम के सदस्य शामिल रहे। जांच के दौरान कई जवाब असंतोषजनक पाए गए।

● नोएडा प्राधिकरण पर गंभीर सवाल

जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जिस प्लॉट के पास गड्ढा था, वह पहले से ही खतरनाक स्थिति में था। निर्माण के दौरान खुदाई के बाद न तो गड्ढा भरा गया और न ही सुरक्षा घेरा लगाया गया। फाइलों में काम स्वीकृत था, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई निगरानी नहीं की गई। इस लापरवाही के लिए प्राधिकरण के वरिष्ठ स्तर तक जिम्मेदारी तय की गई है।

● डीएम और आपदा प्रबंधन की भूमिका कटघरे में

जिले की आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर भी SIT ने सवाल खड़े किए हैं। हादसे के तुरंत बाद जिला स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी। जांच में यह बात सामने आई कि मौके पर शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी देर से पहुंचे और पीड़ित परिवार से संवाद भी नहीं किया गया। जबकि घटना से ठीक पहले आपदा प्रबंधन को लेकर बैठक हुई थी, फिर भी कोई तैयार व्यवस्था नजर नहीं आई।

● फायर ब्रिगेड और पुलिस की चूक

फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों ने उपकरणों की कमी और तैराकी न आने की बात कही। मौके पर वरिष्ठ अधिकारियों की अनुपस्थिति ने हालात और बिगाड़ दिए। वहीं पुलिस सबसे पहले पहुंचने के बावजूद रेस्क्यू को सही दिशा नहीं दे सकी। जांच में यह भी सामने आया कि उच्च स्तरीय रेस्क्यू एजेंसियों को समय पर सूचित नहीं किया गया।

● ट्रैफिक और जल सीवर विभाग की अनदेखी

SIT ने पाया कि हादसे वाली जगह पहले से ही ब्लैक स्पॉट जैसी स्थिति में थी, लेकिन वहां न तो चेतावनी बोर्ड थे और न ही रिफ्लेक्टर। जल सीवर विभाग की अनदेखी के कारण आसपास की कई सोसाइटियों का सीवर पानी उसी गड्ढे में भर रहा था, जिससे स्थिति और खतरनाक हो गई।

● बिल्डर की भूमिका और कानूनी कार्रवाई

जिस प्लॉट में गड्ढा था, वहां बेसमेंट निर्माण के लिए खुदाई की गई थी और उसे खुला छोड़ दिया गया। सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई। इस मामले में बिल्डर और उससे जुड़े लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है और कई गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं।

● सिस्टम फेल्योर का प्रतीक बनता मामला

युवराज मेहता की मौत अब एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी बन चुकी है। SIT रिपोर्ट में कई विभागों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपे जाने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

● अंत में•••

यह हादसा चेतावनी है कि शहरी विकास, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में थोड़ी सी लापरवाही भी किसी की जान ले सकती है। युवराज की मौत ने व्यवस्था के उन छेदों को उजागर किया है, जिन्हें समय रहते नहीं भरा गया तो ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे।