सुप्रीम कोर्ट समझ गया, यूजीसी की नासमझी …

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सुप्रीम कोर्ट समझ गया, यूजीसी की नासमझी …

कौशल किशोर चतुर्वेदी

पूरे देश में हो रहे विरोध के बाद भी यूजीसी ने समता संवर्धन संबंधी अपने नोटिफिकेशन पर गौर करने की जरूरत भले ही न समझी हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट पहली सुनवाई में ही यूजीसी की नासमझी को पूरी तरह से समझ गया है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है। और यह आदेश दिया है कि अगले आदेश तक 2012 वाले नियम लागू रहेंगे। यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इन पर रोक लगी दी है। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए। इसी के साथ पीठ ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। है।

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियम, 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 29 जनवरी 2026 को सुनवाई की। कोर्ट में इन विनियमों को सामान्य वर्गों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण होने के आधार पर चुनौती दी गई है।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नए नियम अस्पष्ट हैं। इनका दुरुपयोग हो सकता है। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए या हम पीछे जा रहे हैं। क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं? जिन्हें सुरक्षा चाहिए, उनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए एक विशेष कमेटी भी बनाई जा सकती है।

याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने कहा, ‘आज, सीजेआई ने हमारी दलीलों की सराहना की। हमें कहना होगा कि यह हमारे लिए बहुत बड़ी जीत है। जैसा कि हम खास तौर पर तीन मुद्दों के बारे में बात कर रहे थे, एक है सेक्शन 3 सी, जो जातिगत भेदभाव के बारे में बात करता है और उस खास सेक्शन में, सामान्य जाति को बाहर रखा गया है और बाकी सभी जातियों को शामिल किया गया है। तो, यह खास सेक्शन यह संदेश दे रहा है कि एससी, एसटी, ओबीसी के साथ सामान्य जाति द्वारा भेदभाव किया जा रहा है।’ दूसरा हिस्सा इक्विटी कमेटी के संबंध में है जो इन नए यूजीसी सेक्शन के सेक्शन 18 के तहत बनाई गई है। इन खास नियमों में सामान्य समुदाय के लिए कोई खास प्रतिनिधित्व नहीं बताया गया है। सीजेआई ने भी हमारी इस दलील को माना और सुझाव दिया कि एक खास कमेटी बनाई जानी चाहिए, जिसमें शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हों, जिन्हें इस खास विषय का ज्ञान हो और अब यह मामला 19 मार्च के लिए सूचीबद्ध है और उम्मीद है कि कुछ अच्छा होगा।

दरअसल, यूजीसी रेगुलेशन, 2026 को 13 जनवरी, 2026 को नोटिफाई किया गया था। जिसे लेकर पूरे देश में आक्रोश फैल गया। जिसके बाद इसे कई याचिकाकर्ताओं ने मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के साथ-साथ यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन एक्ट, 1956 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी। यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन के खिलाफ याचिकाएं मृत्युंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल दीवान ने दायर की हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये नियम सामान्य वर्गों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।सूर्यकांत ने नए नियमों पर टिप्पणी करते हुए आगे कहा, विश्वविद्यालय, स्कूल और कॉलेज अलग-थलग नहीं रह सकते। पूरे समाज का क्या हाल होगा। अगर कैंपस में ऐसा होता है तो कैंपस के बाहर लोग कैसा व्यवहार करेंगे?

तो यूजीसी के नए नियमों को लेकर दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि संसदीय समिति की कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशों को जनवरी 2026 की अंतिम गाइडलाइंस में नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट और संतुलित कदम उठाने की मांग की ताकि छात्रों को न्याय मिल सके। यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर दिग्विजय सिंह का मानना है कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए सख्त फैसले जरूरी हैं लेकिन संतुलित कदम भी उठाए जाने चाहिए।

तो अब यह उम्मीद की जा सकती है कि अगर यूजीसी ने गैर जिम्मेदाराना व्यवहार करते हुए समता संवर्धन हेतु यूजीसी विनियम 2026 नोटिफाई कर पूरे देश में सवर्ण बनाम अन्य युद्ध शुरू करवाया है तो सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर संज्ञान लेते हुए यूजीसी की मंशा पर सवालिया निशान लगा दिया है। यहाँ बात जीत-हार की कतई नहीं है बल्कि देश को एक तरह से आंतरिक गृहयुद्ध से बचाने की है। पूरे देश में जातिगत वैमनष्यता रोकने की है। अगर यूजीसी को यह समझ में नहीं आता है और संसदीय समिति की सिफारिशों को भी उपेक्षित किया जाता है तब मामला बहुत गंभीर है। अच्छी बात यही है की सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी की नासमझी को पहली सुनवाई में ही समझते हुए इस पर सीधी-सीधी टिप्पणी कर पूरे देश में न्यायपूर्ण स्थिति निर्मित करने के प्रति उम्मीद जगा दी है…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।