Indore Nagar Nigam: एक हादसे ने उतार दिया मेकअप..अफसर आपस में भिड़े, व्यवस्था टूटी!

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Indore Nagar Nigam: एक हादसे ने उतार दिया मेकअप..अफसर आपस में भिड़े, व्यवस्था टूटी!

अभिषेक मिश्रा की विशेष रिपोर्ट

इंदौर नगर निगम की चमक-दमक को अगर कोई आधिकारिक नाम दिया जाए तो शायद उसे “पोस्टर मॉडल गवर्नेंस” कहा जाना चाहिए। बाहर से सब कुछ इतना उजला कि आंखें चौंधिया जाएं, भीतर झांकिए तो व्यवस्था ऐसे बिखरी हुई जैसे किसी ने फाइलों की अलमारी को जानबूझकर भूकंप में छोड़ दिया हो। भागीरथपुरा की घटना इसी भूकंप का पहला झटका थी, जिसने यह भ्रम तोड़ दिया कि सब कुछ नियंत्रण में है।

दरअसल नियंत्रण सिर्फ विज्ञापनों में था, ज़मीन पर नहीं। इस घटना के बाद नगर निगम की आंतरिक हालत ऐसी हो गई, मानो कोई सामूहिक मौन अनशन चल रहा हो..अधिकारी आपस में बोल नहीं रहे, विभाग एक-दूसरे से कटे हुए हैं और जिम्मेदारी को ऐसे इधर-उधर धकेला जा रहा है जैसे कोई बोझिल फाइल हो, जिसे हाथ लगाना भी जोखिम भरा हो। स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि जिस विभाग को हमेशा “कमाऊ” कहा जाता रहा, वहां कमाई का मतलब अब राजस्व नहीं, बल्कि रस्साकशी समझा जाने लगा है। कार्यालय के भीतर दो अधिकारियों का आमने-सामने उलझ जाना, निगम के स्वास्थ्य की लाइव रिपोर्ट थी..जिसमें नाड़ी भी अनियमित थी और धड़कन भी।_

शहर की सड़कों पर यह अव्यवस्था किसी गोपनीय दस्तावेज़ की तरह छिपी नहीं है। अवैध कब्जे अब अवैध नहीं लगते, वे तो स्थायी नागरिक बन चुके हैं। फुटपाथों और सड़कों के दोनों ओर ठेलों की ऐसी बाढ़ है कि सड़कें खुद को गली समझने लगी हैं। रिमूवल विभाग में ऊपर बैठे अधिकारी एक अवैध गुमटी पर हाथ डालने से पहले उतना नहीं सोचते जितना एक संभावित फोन कॉल की घंटी के बारे में सोच रहे हैं। मेट्रो स्टेशन के आड़े रहे अवैध कब्जे व्यवस्था को चिढ़ा रहे हैं.. इसी बीच वर्षों से धूल खा रही काली फाइलें अचानक चमकने लगी हैं..क्योंकि उन्हें “शहर सुधार” के लिए नहीं, बल्कि “व्यक्तिगत भविष्य सुधार योजना” के तहत बाहर निकाला गया है। क्योंकि आपदा में वो अवसर मिल गया है,जिसका इंतजार भी लंबे समय से था। इसके ठीक विपरित वाली वित्तीय हालत की बात करें तो नगर निगम की स्थिति उस मरीज जैसी है, जिसे आईसीयू की ज़रूरत है, लेकिन इलाज सिर्फ मेकअप से किया जा रहा है। राजस्व बढ़ाने की जिम्मेदारी जिस तंत्र पर है, वहां लूप लाइन में पड़े भ्रष्ट अधिकारियों की वापसी के साथ खुद के लिए वसूली आधारित जाल बिछा दिया गया है। नतीजा यह होगा कि टैक्स का पूरा बोझ फिर उसी ईमानदार नागरिक के कंधे पर रहेगा, जो पहले ही महंगाई और अव्यवस्था से जूझ रहा है, जबकि प्रभावशाली वर्गों के लिए नगर निगम खुद लाल कालीन बिछाकर खड़ा है..मानो नियम उनके स्वागत में हों। यह पूरी कहानी किसी एक घटना या एक विभाग की नहीं है। यह उस नगर निगम की कहानी है, जो चमक को शासन समझ बैठा, और व्यवस्था को फोटो फ्रेम में कैद कर दिया। भागीरथपुरा ने बस इतना किया कि फ्रेम तोड़ दिया और भीतर की तस्वीर सबके सामने रख दी।