सिर्फ मीटिंग-मीटिंग का ही खेला- इंदौर की इतनी दुर्दशा पहले कभी नहीं दिखी!

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सिर्फ मीटिंग-मीटिंग का ही खेला- इंदौर की इतनी दुर्दशा पहले कभी नहीं दिखी!

सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यूं है / इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है!

राजेश ज्वेल की विशेष रिपोर्ट

इंदौर: भागीरथपुरा जलकांड ने इंदौर की अंदरुनी सड़ांध जगजाहिर की, वही उस सिस्टम की पोलपट्टी भी खोल दी, जो बदलाव के फर्जी ढोल पीटती रहीं है। विकास से जुड़े सारे प्रोजेक्ट लेटलतीफी की भूल-भूलैया में गुम हैं… मंत्री सहित इंदौर के जनप्रतिनिधि जोर-शोर से बैठकें बुलाते हैं और फिर मीडिया बाइट से जो सब्ज बाग दिखाते है , उन पर अमल महीनों ,वर्षों नहीं दिखता और कई फ़ैसले तो भोपाल जाकर डम्प हो जाते हैं… मेट्रो प्रोजेक्ट इसका बढ़िया उदाहरण है, जिसके अंडरग्राउंड रुट को लेकर पहले डेढ़ साल मशक्कत चलती रही और फिर रुट बदलने का जो निर्णय हुआ, उसकी अधिकृत मंजूरी के अभी तक पते नहीं है, सिर्फ हवा-हवाई अनुमान ही लग रहे हैं…

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बीआरटीएस कॉरिडोर का हश्र सबके सामने है, जिसमें हर सुनवाई पर हाईकोर्ट फटकारता है मगर निगम ऐसा ठेकेदार ही तलाश नहीं कर पाया, जो बीआरटीएस तोड़ सके… इसी तरह एबी रोड के एलिवेटेड कॉरिडोर की बीते 7 सालों से जलेबी बन रही है और कई मर्तबा जनप्रतिनिधियों-अफसरों की बैठकें हो चुकी है मगर आज तक ड्राइंग-डिजाइन के साथ ये ही तय नहीं हो सका कि आखिर बनाना क्या है… तथाकथित विशेषज्ञ हर बार नया ज्ञान पेल देते हैं… एक बोलता है हर चौराहे पर फ्लायओवर ठोक दो तो दूसरा विशेषज्ञ टांग अड़ाते हुए कहता है कि नहीं सीधा एलिवेटेड तानो… तीसरा विशेषज्ञ भांजी मारते हुए भुजाएं उतारने की पैरवी करता है… यानि इतने डाक्टर इकट्ठे हो गए कि मरीज का मरना तय है.. सामंजस्य के अभाव में फिलहाल कॉरिडोर फाइलों में ध्वस्त है और इंदौर विकास से जुड़े कई प्रोजेक्ट एलिवेटेड की तरह हवा में लटके है.. और जनता बेचारी जहां दूषित पानी पीकर मर रही है तो गड्ढे कूदने ,यातायात जाम में फंसने के साथ चालान अलग कटवा रही है.

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तमाम मुसीबतें सहने को बेबस इंदौर में अब ना तो ऐसे दमदार अफसर बचे जिनके इशारे पर पूरा तंत्र सूत-सांवल के साथ हरकत में नजर आता और न वैसे जनप्रतिनिधि बचे जो अपने निर्णयों का मैदानी असर दिखा सकें… सिर्फ मीटिंग-मीटिंग का ही खेला है… हर मीटिंग में सिर्फ ये निर्णय होता है कि अगली मीटिंग कब रखे और ये सिलसिला जारी है… इंदौर की इतनी दुर्दशा पहले कभी नहीं दिखी… चौपट सामंजस्य के बीच हर कोई अपनी ढपली-अपना राग अलापने में जुटा हैं… कभी मुंबई को लेकर लिखी शहरयार की मशहूर गजल अब मिनी मुंबई इंदौर पर ज्यादा मुफीद लगती है… सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यूं है / इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है!

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