इतना सन्नाटा क्यों है भाई…

49

इतना सन्नाटा क्यों है भाई…

कौशल किशोर चतुर्वेदी
मशहूर फिल्म शोले में इमाम चाचा की भूमिका कोई भुला नहीं सकता। गब्बर के हाथों अपने बेटे की मौत के बाद जब इमाम चाचा सन्नाटे को महसूस करते हैं, तब उनका यह संवाद “इतना सन्नाटा क्यों है भाई?”, दर्शकों के दिल को झकझोर करके रख देता है। जिस फिल्म में हर किरदार अपना लोहा मनवा रहा था उसमें इमाम चाचा के रूप में एके हंगल की भूमिका भी अविस्मरणीय है। अवतार किशन हंगल यानि एके हंगल की शौकीन (1982) फिल्म में एक बुजुर्ग के रूप में भूमिका को भी याद किया जाता है। फिल्म शौकीन में उनकी रंग मिजाजी बुजुर्ग इंद्रसेन उर्फ एंडरसन के रूप में उनका अभिनय काबिले तारीफ है। नमक हराम (1973) में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनके संवाद चरित्र की ईमानदारी और सादगी को आज भी याद किया जाता है। अवतार (1983) में एक परित्यक्त पिता के रूप में, उनके संवाद अक्सर दिल को छू लेने वाले थे। तो साल 1975 में बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाने वाली फिल्म ‘शोले’ के इमाम साहब हों, या खुद्दार के रहीम चाचा या फिर नरम गरम के मास्टरजी या फिल्म ‘लगान’ के शंभू काका, दर्शकों ने हर रूप मे उन्हें सराहा और पसंद किया है। उनकी अदाकारी ऐसी थी कि दर्शक भी उससे आसानी से जुड़ जाते थे।
आज हम एके हंगल की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 1 फरवरी 2014 को भारत के सियालकोट, पंजाब, में उनका जन्म हुआ था। उनका जन्म एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था, उन्होंने अपना बचपन और युवावस्था पेशावर, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में बिताई, जहाँ उन्होंने थिएटर में प्रदर्शन किया था। उनके पिता का नाम पंडित हरि किशन हंगल था। उनकी माता का नाम रागिया हुंदू था। 1930-47 के बीच स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हंगल ने विशेष भूमिका निभाई। इस दौरान उन्हें कई कष्टों का सामना भी करना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के दौरान जहाँ उन्हें तीन साल पाकिस्तानी कारावास की सजा भी हुई। वहीं साल 1944 में हंगल की पत्नी मनोरमा का निधन हो गया। पाकिस्तानी कारावास से सजा काटने के बाद हंगल ने अकेले ही अपने बेटे विजय की परवरिश की। 1949 में भारत विभाजन के बाद एके हंगल मुंबई आ गए और बॉलीवुड में कदम रखा। लेकिन बॉलीवुड में कदम रखने से पहले ही एके हंगल रंगमंच से जुड़ चुके थे। वह 1936 से 1965 तक रंगमंच कलाकार भी रहे, और उन्होंने रंगमंच पर अपनी सेवाएं दीं। एके हंगल ने 1966 मे आई बासु भट्टाचार्य निर्देशित फिल्म तीसरी कसम से बॉलीवुड में डेब्यू किया। उस समय हंगल की उम्र 52 साल थी। हंगल बॉलीवुड में सबसे अधिक उम्र में कदम रखने वाले पहले अभिनेता थे। उनके बारे मे कहा जाता था कि- ‘एके हंगल बॉलीवुड का वह अभिनेता है जो बूढ़ा ही पैदा हुआ है।’ फिल्मों में वह अक्सर मुख्य किरदार के करीबी के रूप में ही नजर आये है। हंगल को चरित्र अभिनेता भी कहा जाता था। हंगल साहब ने अपने 50 साल से अधिक के करियर में लगभग 225 फिल्मों में अभिनय किया।
8 फरवरी 2011 को, हंगल ने मुंबई में अपनी समर लाइन के लिए फ़ैशन डिजाइनर रियाज गंजी के लिए व्हीलचेयर में रैंप वॉक किया।
हंगल ने मई 2012 में टेलीविजन श्रृंखला। मधुबाला – एक इश्क एक जूनून में अपनी अंतिम उपस्थिति दर्ज की, जिसमें उनका कैमियो था। मधुबाला – एक इश्क एक जूनून भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर एक श्रद्धांजलि थी। हंगल को दिखाने वाला एपिसोड कलर्स पर 1 जून को रात दस बजे प्रसारित हुआ। 2012 की शुरुआत में, हंगल ने एनीमेशन फिल्म कृष्ण और कंस में राजा उग्रसेन के चरित्र के लिए भी अपनी आवाज दी, जो 3 अगस्त 2012 को रिलीज हुई थी। यह उनकी मृत्यु से पहले उनके करियर का अंतिम काम था। उग्रसेन का उनका चित्रण समीक्षकों द्वारा बहुत सराहा गया। भारत सरकार ने हंगल को 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था।
एके हंगल के जीवन के शुरुआती हिस्से में उनका प्राथमिक व्यवसाय एक दर्जी का था। तो वह बॉलीवुड के ऐसे कलाकार हैं, जो आज भी दर्शकों के दिलों मे जीवित है। फिल्म जगत मे ए.के हंगल को फिल्मों मे उनके अभिनय और योगदान के लिए हमेशा याद किया जायेगा। एके हंगल की बायोग्राफी ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ एके हंगल’ में उनके जीवन के अनसुने पहलुओं पर बात की गई है। किताब के अनुसार, एके हंगल के पिता के करीबी दोस्त ने उन्हें दर्जी बनने का सुझाव दिया था। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड के एक दर्जी से इसका काम भी सीखा था।
फिल्मों में आने के बाद उनकी उम्र भले ही बढ़ती गई, लेकिन फिल्मों में काम करने का जुनून बरकरार रहा। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने एके हंगल को 2006 पद्म भूषण अवॉर्ड से सम्मानित किया था। उन्होंने 26 अगस्त 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
एके हंगल का मानना था कि सब लोग अच्छे होते नहीं, सब बुरे भी नहीं होते।
इस देश को क्रांति की जरूरत है और मुझे पूरा विश्वास है कि वो जरूर आएगी। नहीं तो भारत में अराजकता हो जाएगी, धर्मनिरपेक्षता आंदोलन और लोकतांत्रिक मूल्य हार जाएंगे। अरे इतना सन्नाटा क्यों है भाई…आइए सन्नाटे को चीरते हुए साल 2026 में फरवरी के पहले दिन और माह के पहले रविवार को हम एके हंगल को याद कर दिन की शानदार शुरुआत करते हैं…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।