देवनागरी के वैश्विक प्रसार को नई दिशा: प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत

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देवनागरी के वैश्विक प्रसार को नई दिशा: प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत

UJJAIN: हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि और भारतीय लोक-संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रतिष्ठापन के लिए दशकों से सतत सक्रिय प्रख्यात शिक्षाविद्, साहित्यकार, समीक्षक और शोधकर्ता प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा को नागरी लिपि परिषद् नई दिल्ली का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया है। यह मनोनयन केवल एक पदभार नहीं, बल्कि देवनागरी लिपि को राष्ट्रीय भावात्मक एकता और अंतरराष्ट्रीय संवाद की संपर्क लिपि के रूप में स्थापित करने के उनके दीर्घकालीन, सतत और समर्पित कार्य की औपचारिक स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। साहित्य, शोध, लोक-विमर्श और अकादमिक नेतृत्व के क्षेत्र में उनकी सशक्त उपस्थिति को देखते हुए यह नियुक्ति भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

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● देवनागरी को संपर्क लिपि के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली संस्था

नागरी लिपि परिषद् नई दिल्ली विगत पांच दशकों से देवनागरी लिपि को राष्ट्रीय भावात्मक एकता, विश्व बंधुत्व और देश-विदेश की भाषाओं की संपर्क लिपि के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु निरंतर क्रियाशील रही है। परिषद् का उद्देश्य केवल लिपि संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि सूचना-संचार प्रौद्योगिकी, लोक एवं जनजातीय भाषाओं के साथ देवनागरी के समन्वय को सुदृढ़ बनाकर उसे समकालीन संदर्भों में प्रासंगिक बनाए रखना भी है।

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● सूचना तकनीक और जनजातीय भाषाओं के संवर्धन में सक्रिय भूमिका

सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा लंबे समय से नागरी लिपि परिषद् से जुड़े रहे हैं। उन्होंने सूचना-संचार प्रौद्योगिकी के साथ देवनागरी लिपि के प्रयोग, लोक एवं जनजातीय भाषाओं की लिपिक संरचना और उनके मानकीकरण की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके प्रयासों ने देवनागरी को केवल शास्त्रीय नहीं, बल्कि व्यवहारिक और जनसुलभ लिपि के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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● तीन दशकों से अधिक का सृजन, शोध और विमर्श

पिछले साढ़े तीन दशकों से समीक्षा एवं अनुसंधानपरक लेखन में निरंतर सक्रिय प्रो शर्मा ने साहित्य, भाषा, संस्कृति और लोक परंपराओं के क्षेत्र में व्यापक और बहुआयामी योगदान दिया है। भारतीय और पाश्चात्य शब्दशक्ति अवधारणा, हिंदी काव्यशास्त्र, देवनागरी विमर्श, मालवा का लोकनाट्य माच, गोंडी, भीली, बघेली और मालवी लोक साहित्य, हिंदी भीली अध्येता कोश, हिंदी भाषा संरचना, हिंदी कथा साहित्य, प्राचीन एवं मध्यकालीन काव्य, महात्मा गांधी के विचार और नवाचार, सिंहस्थ विमर्श, अवंती क्षेत्र और सिंहस्थ महापर्व जैसे विषयों पर उनकी पैंतीस से अधिक पुस्तकें अकादमिक जगत में विशेष महत्व रखती हैं।

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● सैकड़ों शोध निबंध और कला समीक्षाएं

शोध पत्रिकाओं और ग्रंथों में प्रो शर्मा के 350 से अधिक शोध एवं समीक्षा निबंध तथा 850 से अधिक कला एवं रंगकर्म समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका लेखन अकादमिक अनुशासन के साथ-साथ लोक चेतना, सांस्कृतिक सरोकार और सामाजिक संवेदनशीलता से भी गहराई से जुड़ा रहा है, जिसने उन्हें समकालीन हिंदी विमर्श का एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बनाया है।

 

● राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सशक्त उपस्थिति

भाषा, लिपि, साहित्य और लोक संस्कृति से संबंधित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों और कार्यशालाओं का सफल समन्वय करते हुए प्रो शर्मा ने भारतीय भाषिक परंपरा को वैश्विक मंचों पर सशक्त रूप से प्रस्तुत किया है। देश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत यह नियुक्ति साहित्यिक, अकादमिक और सांस्कृतिक जगत के लिए गौरव का विषय मानी जा रही है।

 

● शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने जताया हर्ष

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा की इस उपलब्धि पर राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना संगठन मंत्री डॉ प्रभु चौधरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ हरीशकुमार सिंह, मध्यप्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष प्रो हरिमोहन बुधौलिया, सरल काव्यांजलि के संस्थापक संतोष सुपेकर, प्रातिशाख्य परिषद् के प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ अनिल जूनवाल सहित अनेक शिक्षाविदों, संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों ने हर्ष व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं।

मीडिया वाला परिवार की ओर से भी खूब-खूब सारी बधाई, शुभकामनाएं एवं अभिनंदन🌷🌷