50 साल किराए पर रहने से भी मालिकाना हक नहीं: सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

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50 साल किराए पर रहने से भी मालिकाना हक नहीं: सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

New Delhi: किराएदारी और संपत्ति अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी मकान में 50 साल या उससे अधिक समय तक किराए पर रहने मात्र से किरायेदार को उस संपत्ति का मालिकाना हक प्राप्त नहीं हो जाता। लंबे समय तक कब्जा या निवास, अपने आप में ओनरशिप का आधार नहीं बन सकता।

● लंबे समय का निवास, मालिकाना हक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किरायेदार का अधिकार मूलतः अनुबंध और कानून से नियंत्रित होता है। चाहे किराएदारी कितनी भी लंबी अवधि की क्यों न हो, उससे संपत्ति पर स्वामित्व का दावा स्वतः उत्पन्न नहीं होता। अदालत ने दो टूक कहा कि किरायेदार और मालिक के अधिकारों के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर है, जिसे केवल समय के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

● कब्जा और स्वामित्व में फर्क जरूरी
अदालत की टिप्पणी में यह भी रेखांकित किया गया कि कब्जा और स्वामित्व दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। किसी संपत्ति पर लंबे समय तक कब्जा होना, तब तक मालिकाना हक में नहीं बदल सकता, जब तक कि कानून द्वारा मान्य शर्तें पूरी न हों। केवल किराया देकर रहना या वर्षों तक उसी मकान में निवास करना, ओनरशिप का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

● एडवर्स पजेशन पर भी साफ संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि किराएदारी के मामलों में एडवर्स पजेशन का सिद्धांत सामान्यतः लागू नहीं होता। किरायेदार का प्रवेश ही मालिक की सहमति से होता है, ऐसे में वह बाद में उसी संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि कानूनी रूप से किराएदारी समाप्त होने के बाद भी स्पष्ट और शत्रुतापूर्ण कब्जा सिद्ध न किया जाए।

● मालिकों और किरायेदारों दोनों के लिए राहत
इस टिप्पणी से संपत्ति मालिकों को यह स्पष्टता मिली है कि केवल समय बीत जाने से उनका स्वामित्व कमजोर नहीं होता। वहीं किरायेदारों के लिए भी यह संदेश है कि उनके अधिकार कानून और अनुबंध की सीमा में सुरक्षित हैं, लेकिन वे मालिकाना हक का दावा केवल लंबे निवास के आधार पर नहीं कर सकते।

● भविष्य के विवादों में बनेगा मार्गदर्शक
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में किराएदारी और संपत्ति से जुड़े विवादों में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में काम करेगी। इससे निचली अदालतों में लंबित मामलों को दिशा मिलेगी और अनावश्यक दावों पर अंकुश लगेगा।