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उन्होंने कहा कि भक्तिकाल लोकतांत्रिक काव्य सृजन का काल था, जिसमें निर्गुण और सगुण, विविधता और सहिष्णुता का सम्मान दिखाई देता है। भक्ति के अनेक स्वर इस काल में मुखर हुए। ईश्वर न बड़ा होता है, न छोटा, न शक्त, न अशक्त। ईश्वर का महत्व उतना ही होता है जितना विशाल भक्त का हृदय होता है।

प्रो. मिश्र ने कहा कि जैसे शिव के आश्रय में टेढ़ा चंद्रमा भी वंदनीय हो जाता है, वैसे ही गुरु के सान्निध्य से अल्प ज्ञानी भी पूज्य बन सकता है। दृष्टि के बिना संसार का बोध संभव नहीं और यह दृष्टि गुरु ही प्रदान करते हैं।
● भक्त कवियों ने भक्ति को लोकजीवन से जोड़ा: प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि भक्ति प्राचीन काल से मानव जीवन का पाथेय रही है, किंतु मध्यकालीन संत और भक्त कवियों ने अपने आचरण और वाणी से इसे लोकजीवन से जोड़ा। उनका संदेश भारत की सीमाओं से बाहर देश देशांतर तक पहुंचा। उन्होंने कहा कि संत कवि विश्व मानवता के उद्धारक हैं। प्रेम भक्ति रस में समस्त प्राणियों को डुबोने का उनका प्रयास आज भी उतना ही प्रासंगिक है। भारतीय साहित्य, संस्कृति, दर्शन, समाज और कला परंपराओं के विकास में भक्ति आंदोलन का योगदान अविस्मरणीय है।

● प्रो चित्तरंजन मिश्र का सारस्वत सम्मान
संगोष्ठी के दौरान विद्वान साहित्यकार प्रो चित्तरंजन मिश्र का अंगवस्त्र, मौक्तिक माल और साहित्य अर्पित कर सारस्वत सम्मान किया गया। यह सम्मान उनके साहित्यिक अवदान और अकादमिक योगदान के लिए प्रदान किया गया।
यह संगोष्ठी भक्ति आंदोलन को केवल अतीत की परंपरा नहीं, बल्कि समकालीन समाज के लिए भी प्रासंगिक चेतना के रूप में रेखांकित करती है। भक्ति काव्य का मानवीय, समतावादी और लोकतांत्रिक स्वर आज भी भारतीय समाज को दिशा देने में सक्षम है।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी पूजा परमार ने किया। आभार प्रदर्शन ललित कला अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष एवं आचार्य प्रोफेसर जगदीश चंद्र शर्मा ने किया।