
सियासत के सितारे : यहां कुर्सी नहीं छीनी जाती, असर छीना जाता है: हितानंद शर्मा की कहानी
▪️राजेश जयंत
सियासत बेरहम है।
यहां फैसले एक झटके में नहीं होते और विदाई कभी अचानक नहीं दिखती। राजनीति में किसी की कुर्सी छीनने से पहले उसकी ताकत छीनी जाती है, उसके प्रभाव को सीमित किया जाता है और धीरे-धीरे उसे निर्णय के केंद्र से बाहर कर दिया जाता है। बाहर से सब कुछ सामान्य और सम्मानजनक नजर आता है, लेकिन भीतर सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल चुका होता है।
मध्यप्रदेश भाजपा संगठन में हितानंद शर्मा के साथ जो हुआ, वह इसी राजनीतिक यथार्थ का एक सटीक उदाहरण है।

● ताकतवर रणनीतिकार का संगठन से विदा होना

मध्यप्रदेश भाजपा संगठन के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार माने जाने वाले हितानंद शर्मा का संगठन से अलग होना कोई साधारण प्रशासनिक बदलाव नहीं है। संगठन महामंत्री के रूप में उनके पास सिर्फ पद नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंच की असली चाबी थी। टिकट वितरण से लेकर जिलों की संरचना, अनुशासन, गुट संतुलन और संगठनात्मक फैसलों में उनकी भूमिका निर्णायक मानी जाती थी। यही कारण था कि उन्हें संगठन की रीढ़ कहा जाता था। उनका हटना एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली शक्ति केंद्र का खिसकना है।
● संघ की वापसी और नई भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हितानंद शर्मा को वापस बुलाते हुए मध्य क्षेत्र का सह बौद्धिक प्रमुख बनाया है। नया ठिकाना जबलपुर तय हुआ है। नाम और गरिमा में यह पद कमतर नहीं है, लेकिन शक्ति के लिहाज से इसका स्वरूप पूरी तरह अलग है। यह भूमिका वैचारिक विमर्श, मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से जुड़ी है। यहां न टिकट तय होते हैं, न संगठनात्मक नियंत्रण होता है और न सत्ता से सीधा संवाद। यह बदलाव सम्मानजनक दिखता है, लेकिन प्रभाव के स्तर पर एक स्पष्ट दूरी को दर्शाता है।
● कुर्सी नहीं गई, असर सीमित कर दिया गया

राजनीति की असली चाल यही होती है। किसी को न अपमानित किया जाता है, न सार्वजनिक रूप से हटाया जाता है, बल्कि जिम्मेदारी का ऐसा पुनर्विन्यास किया जाता है कि व्यक्ति निर्णय के केंद्र से बाहर चला जाए। संगठन महामंत्री की कुर्सी सत्ता का प्रवेश द्वार होती है, जबकि बौद्धिक भूमिका सत्ता से सुरक्षित दूरी बनाए रखती है। यही फर्क इस पूरे घटनाक्रम को साधारण फेरबदल से अलग और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है।
● भाजपा संगठन के भीतर बदलता शक्ति-संतुलन

हितानंद शर्मा का संगठन से हटना इस बात का संकेत है कि भाजपा के भीतर शक्ति-संतुलन का पुनर्गठन हो चुका है। नए चेहरे, नई टीम और नई रणनीति के लिए जगह बनाई जा रही है। ऐसे समय में वे चेहरे जो स्वतंत्र निर्णय क्षमता रखते हैं और जिनका प्रभाव व्यापक होता है, या तो समायोजित किए जाते हैं या धीरे-धीरे हाशिए पर ले जाए जाते हैं। यह बदलाव संगठन की आगामी दिशा और नेतृत्व शैली को भी रेखांकित करता है।
● संघ और भाजपा की अलग-अलग भूमिकाएं
संघ और भाजपा का रिश्ता वैचारिक रूप से जुड़ा हुआ जरूर है, लेकिन उनकी भूमिकाएं अलग हैं। भाजपा सत्ता और संगठन का मैदान है, जबकि संघ विचार, अनुशासन और वैचारिक निरंतरता का मंच। हितानंद शर्मा की संघ में वापसी यह स्पष्ट करती है कि अब उनसे सत्ता संचालन की नहीं, बल्कि विचार संरचना और मार्गदर्शन की अपेक्षा है। यह बदलाव व्यक्ति की क्षमता से अधिक संगठन की प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
● राजनीति में पद नहीं, प्रभाव मायने रखता है
राजनीति में असली सवाल यह नहीं होता कि पद क्या है, बल्कि यह होता है कि उस पद से क्या नियंत्रित किया जा सकता है। टिकट, नियुक्तियां, संगठनात्मक फैसले और सत्ता तक पहुंच- यही प्रभाव की असली परिभाषा है। नई भूमिका में यह सब सीमित है। यही कारण है कि इसे सार्वजनिक तौर पर सम्मानजनक जिम्मेदारी कहा जा रहा है, लेकिन राजनीतिक भाषा में यह प्रभाव का सीमांकन है।
● और अंत में••••
हितानंद शर्मा का संगठन से जाना यह बताता है कि राजनीति में स्थायित्व केवल विचारों का होता है, पदों का नहीं। यहां किसी को हटाने से पहले उसकी ताकत को चुपचाप सीमित किया जाता है। बाहर से यह बदलाव संतुलित और सौम्य दिखता है, लेकिन भीतर यह सत्ता के समीकरणों में आया बड़ा बदलाव है। सियासत वाकई बेरहम है- और शायद सबसे ज्यादा उन्हीं के लिए, जो उसे सबसे बेहतर तरीके से समझते हैं।





