संसद का खर्च :6 घंटे के 9 करोड़ रुपये. एक घंटे का 1.5 करोड़. एक मिनट का ढाई लाख. 

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संसद का खर्च :6 घंटे के 9 करोड़ रुपये. एक घंटे का 1.5 करोड़. एक मिनट का ढाई लाख. 

▪️डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी

चर्चा क्या हुई? इल्ले!

देश को क्या मिला? इल्ले!!

नेताओं को भी क्या मिला? इल्ले!!!

नरेन्द्र मोदी : जब बोलना था, लोकसभा से गायब. राज्यसभा में 85 मिनट बोले…. पर बोले क्या – “वो कहते हैं मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी”. कितनी बार कहा? दर्जन भर से ज़्यादा. सच बताइये किसकी इतनी जुर्रत? और? मैं 2 किलो गाली रोज खाता हूं. यानी महीने में 60 किलो, साल भर में 730 किलो!

सदन के नेता और प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में अपना पारंपरिक जवाब देना था, जो वर्षों से चली आ रही परंपरा है। लेकिन विपक्ष के हंगामे और स्पीकर द्वारा ‘अनुचित घटना’ आशंका बताकर उन्हें लोकसभा में न आने की सलाह दी गई।

नतीजा : पहली बार 2014 के बाद ऐसा हुआ कि लोकसभा में प्रधानमंत्री का जवाब नहीं सुनाई दिया (राज्यसभा में तो दिया)। इससे उनकी छवि पर दाग लगा – “संसद में बोलने से बच गए” जैसी विपक्षी टिप्पणियां हुईं।

खोया : संसदीय बहस में भागीदारी का मौका और लोकसभा में अपनी बात रखने की गरिमामयी परंपरा।

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राहुल गांधी : लीडर ऑफ अपोजिशन के तौर पर उन्होंने कई मुद्दों पर जोरदार हमला बोला, लेकिन ‘ग़द्दार’ जैसे शब्द का इस्तेमाल केन्द्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू पर किया. संसद परिसर में, कैमरों के सामने।

खोया : संसदीय भाषा की मर्यादा और गरिमा! बहस मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत हो गई।

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ओम बिरला (लोकसभा स्पीकर) : स्पीकर के रूप में सदन की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है। लेकिन इस सत्र में उन्होंने प्रधानमंत्री को सदन से दूर रखने की सलाह दी, विपक्ष पर महिलाएं पीएम की कुर्सी के पास पहुंचीं जैसी टिप्पणियां कीं, और राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख की किताब का जिक्र करने से रोका। इससे स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठे – विपक्ष ने कहा कि वो सरकार के दबाव में हैं।

खोया : स्पीकर की गरिमा और सदन की स्वतंत्रता की छवि – तार-तार होना तो दूर, सदन की कार्यवाही बार-बार ठप होने से स्पीकर की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए। सदन का संचालन विवादास्पद हो गया।

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प्रियंका गांधी वाड्रा – महिलाओं के सामने खड़े होने को सामान्य बताया, लेकिन स्पीकर के बयान को झूठ कहकर सदन की बहस को और व्यक्तिगत बनाया।

खोया : महिलाओं की गरिमा को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप।

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अमित शाह / जेपी नड्डा : विपक्ष पर ‘संसद की मर्यादा तोड़ने’ का आरोप लगाया, लेकिन खुद भी तीखी भाषा का इस्तेमाल किया।

खोया : बहस को मुद्दों पर केंद्रित रखने का अवसर।

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पूरे सदन का माहौल – हंगामा, स्लोगन, वॉकआउट, निलंबन – संसद की उत्पादकता घटी, जनता का विश्वास कम हुआ।

खोया : लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था की गरिमा और जनता के प्रति जवाबदेही।

*पूर्व सेना प्रमुख भी विवादों में घिरे! उनकी गरिमा भी नहीं बढ़ी!

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कुल मिलाकर, इस सत्र में सभी पक्षों ने संसद की गरिमा को चोट पहुंचाई – चाहे वो हंगामा हो, व्यक्तिगत हमले हों या स्पीकर की भूमिका पर सवाल। अफसोस इस बात का है कि संसद जनता की आवाज का मंच होने के बजाय राजनीतिक स्कोर-सेटलिंग का अखाड़ा बन गई।

जब संसद में हंगामा होता है या सदन बार-बार स्थगित होता है, तो टैक्सपेयर का पैसा व्यर्थ जाता है – और हमारी संसदीय व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है!