डील से ढील

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डील से ढील

-एन के त्रिपाठी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत के आधे से अधिक मूल्य की वस्तुओं पर बढ़ी हुई और दंडात्मक टैरिफ़ को मिलाकर 50% से घटाकर 18% करने की घोषणा की है। इससे भारत-अमरीकी संबंधों के तनाव में कुछ ढील आयी है। यद्यपि संसद के कोलाहल में राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ मंद हैं, परंतु भारतीय आर्थिक क्षेत्रों में उनकी घोषणा का उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया है, जो सेंसेक्स से स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त यह डील ऐसे समय में आयी है जब भारत भू-राजनैतिक रूप से असहज हो रहा था। विश्व की तीन बड़ी शक्तियों में से उसे केवल रूस पर भरोसा रह गया था जो स्वयं आर्थिक दृष्टि से बहुत दुर्बल है। दो वास्तविक विश्व शक्तियों चीन और अमेरिका दोनों से उसे एक साथ कठिनाई आ रही थी। स्वतंत्रता के पश्चात से ही आज तक चीन भारत को निरंतर दबाव में रखने का प्रयास करता रहा है।तियानजिंग में सितंबर में हुई शंघाई सहयोग की बैठक में रूस, चीन और भारत के शीर्ष नेताओं ने बड़े आत्मविश्वास के साथ फ़ोटो खिंचवाई थी। ट्रंप ने उसे ध्यान से देखा था। परन्तु वास्तव में भारत चीन पर कभी विश्वास नहीं कर सकता है। अमेरीका के साथ भारत के संबंध पूर्व में ऊँचे-नीचे रहें हैं, परंतु दो दशकों से ये प्रगाढ़ हो गए थे। लेकिन ट्रंप की सनकी भरी चालों से भारत विचलित हो रहा था। अफ़ग़ान युद्ध के पश्चात अब अमेरिका ने पाकिस्तान पर पुनः हाथ रखना प्रारंभ किया है और एक बार फिर भारत और पाकिस्तान को बराबरी पर ला दिया है। इस डील ने संबंधों को नई दिशा दी है। वर्तमान डील से ट्रंप को लगता है कि वे भारत को रूस से तेल क्रय करने से रोक देंगें और इसे वे समर्थकों के बीच अपनी बड़ी विजय के रूप में प्रस्तुत करेंगे। भारत भी बिना अमेरिका के समर्थन के इंडोपैसिफिक क्षेत्र में संतुलित नहीं रह सकता है। अमेरिका भी डील के अपने भू-राजनीतिक पक्ष की अवहेलना नहीं कर सकता है।

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इस डील का विस्तृत विवरण अभी प्राप्त होने में समय लगेगा तथा उस पर हस्ताक्षर होने भी शेष हैं। इस समय केवल यह ज्ञात है कि अमेरिका उन वस्तुओं पर जिन पर अभी 50% टैरिफ था उसे 18% कर देगा। इससे भारत को चीन,बांग्लादेश तथा वियतनाम आदि प्रतिद्वंद्वियों से अच्छे अवसर प्राप्त हो सकेंगे। ट्रंप की 50% टैरिफ से भारत का 50 अरब डॉलर का व्यापार विपत्ति में आ गया था। इससे भी अधिक हानिकारक आर्थिक क्षेत्र में आयी हुई अनिश्चितता ने भारतीय और विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित कर दिया है। चीन को छोड़कर भारत में आने वाली मैन्युफैक्चरिंग रुक गई है। केवल गूगल और अमेज़न जैसी कंपनियों ने यहां निवेश की घोषणा की जिन पर अमेरिकी टैरिफ़ शून्य है। रुपये का मूल्य भी तेज़ी से गिरता जा रहा है। श्रमिक बाहुल्य उद्योग जैसे टैक्सटाइल, लेदर, जेम्स और ज्वेलरी तथा कालीन आदि में बेरोज़गारी छाने का आतंक फैल गया है। अब इन परिस्थितियों से शीघ्र छुटकारा मिलने की आशा है। अन्य वस्तुओं पर टैरिफ यथावत रहेगा। फ़ार्मा और इलेक्ट्रॉनिक के पार्ट्स पर शून्य, ऑटो पार्ट्स पर पच्चीस पर्सेंट तथा स्टील और एल्युमीनियम पर 50 पर्सेंट टैरिफ चलता रहेगा जो अन्य देशों पर भी लागू हैं।
भारत ने हाल के वर्षों में 9 देशों या संगठनों से व्यापार समझौते किए हैं।इन सभी में भारत ने कृषि और डेयरी को संवेदनशील मानते हुए इन्हें समझौते से मुक्त रखा है। भारत की 45% जनसंख्या कृषि क्षेत्र से जीडीपी में मात्र 16.3% का योगदान देती है। कृषि क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि मात्र 4.4% है। हम खुले कृषि व्यापार में किसी भी देश के आगे टिक नहीं सकते हैं। हमें कृषि क्षेत्र में लगी हुई बड़ी जनसंख्या को दूसरे क्षेत्रों में रोज़गार देना होगा और इससे कृषि उत्पादन भी स्वयमेव बढ़ जाएगा। भारत ने कृषि क्षेत्र को डील से बाहर रखने के लिए अमेरिका का दृढ़ता से सामना किया है और पूरे विश्व ने इसे देखा है।अमेरिका ने कृषि क्षेत्र को पृथक रखने की बात मान ली है। व्यापार समझौते एकतरफ़ा नहीं होते और भारत को कुछ प्रकरणों में अमेरिका को भी छूट देनी पड़ेगी तभी उसे अमेरिकी बाज़ार तक पहुँच मिल सकेगी।
ट्रंप की 500 अरब डॉलर की वस्तुएँ भारत द्वारा क्रय करने तथा रूस से आयात बंद करने की घोषणा तत्काल प्रभावशील नहीं हो सकती है। परंतु भारत धीरे-धीरे रूस पर अपनी तेल की निर्भरता कम करना चाहेगा। रूस के सस्ते तेल की तुलना में अमेरिकी टैरिफ़ की मार कहीं अधिक घातक है। परंतु भारत तत्काल रूस से आयात बंद करके रूस से संबंध अशक्त करना नहीं चाहेगा।
भारत को ट्रंप के सनकीपन से भरे और अपमानजनक ट्वीट, जैसे भारत की मृत अर्थव्यवस्था, को भुलाकर इस डील को एक युद्धविराम मानते हुए सकारात्मक रूप से आगे बढ़ना चाहिए।