निमंत्रण पत्र

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निमंत्रण पत्र

डॉ सुमन चौरे

कुछ लोग बाहर से मिलने जुलने आए थे। सामान्य चर्चाएँ चल रही थीं, तभी पोस्टमेन एक निमंत्रण पत्रिका दे गया। कुतूहलवश मैंने पत्रिका खोली व बिना किसी की ओर देखे अद्योपान्त पढ़ डाली। बीच में किसी ने टोका भी । आखिर एक सज्जन तो खीज कर बोल ही पड़े – ‘‘अरे, अभी भी आप इन पत्रिकाओं को पूरा पढ़ते हैं, रिसेप्शन की तारीख, समय और स्थान देखें और पटकें कूड़े दाने में. . .।’’ उनके ये शब्द मुझे बड़े ओछे से लगे, फिर भी मैंने बड़ी संजीदगी से उŸार दिया, ‘‘आप तो उस जमाने के हैं, जिन्होंने इन निमंत्रणों को जिया है, क्या आप इन्हें इतना हेय दृश्टि से देखते हैं। निमंत्रण-पत्र मात्र कागज नहीं है, यह तो मेरे घर उस परिवार की उपस्थिति है, जिस घर से आया है, जब तक यह विवाह पूरा नहीं हो जाएगा, जब तक हम उसमें सम्मिलित नहीं हो लेंगे, हर घड़ी यही ध्यान रहेगा कि पत्रिका के स्वागताकांक्षी, विनीत आदि अपने द्वार पर हम सबके आगमन की प्रतीक्षा में हाथ जोड़े खड़े हैं।’’

छुटपन से ही निमंत्रणों का विराट स्वरूप देखते आए हैं। हम हर कार्य में देवी-देवताओं को निमंत्रण देते हैं, पर लौकिक परम्पराओं में तो देवता भी अपने स्थान पर लगने वाले मेले-जत्रा आदि में भक्तों को बुलाते हैं और आमंत्रितजनों के नहीं आने पर चिन्तित भी होते हैं।

बैलों की घंटियाँ, गाड़ियों की घुर्र-घुर्र व सतपुड़ा के बियावान को चीरता वह मधुर स्वर याद आता है तो आज भी मन को आह्लदित कर जाता है, जहाँ स्वयंभू स्वयं निमंत्रण दे रहे हैं…।

ओंकार देवऽ नऽ लिख्या कागदऽ दई भेज्या,

तू रे वीराऽ बेगो आवऽ

गढ़ऽ रे गुजरातऽ को पोहो आई गयो,

नईं आई म्हारी भोकई निमाड़ऽ।।

अर्थ: ओंकारेश्वर वाले ओंकार देव ने कागद लिखकर भेजा है कि हे भाई तू जल्दी आ। वे कहते हैं कि गढ़ गुजरात से दल के दल आ गए, सिर्फ मेरी भोली निमाड़ नहीं आई।

कोई भी निमंत्रणकर्ता हो, वह प्रतीक्षा अवश्य ही करता है। लोकांचल में तो निमंत्रण की महिमा अपरम्पार है। वहाँ तो देवी-देवता निमंत्रण की चर्चा करते आपस में बतियाते भी हैं। देवी-देवताओं के साथ तादातम्यभाव स्थापित कर लोक अपने जैसा ही उनके लिये भी सोचता है।

शीतला देवी की माता, हँसी पूछऽ वातुली-

तुखऽ कुणऽ निवत्यो आज म्हारी बईण ओ . . .

आजऽ म्हारा घर शीतला देवी पावणी

अर्थः शीतला देवी की माता हँसकर पूछती है, बेटी तू कहाँ जा रही है, आज तुझे किसने निमंत्रण दिया है। गीत में देवी जिनके घर निमंत्रित है, उनकी महिमा का वर्णन करती हैं।

यूँ तो जब भी कोई माँगलिक कार्य होता है, शाóोक्त पद्धति से देवी देवताओं का आवाहन किया जाता है। परन्तु लोक जीवन में लोकाचार और परम्पराएँ ही बलवती होती हैं। कार्य के शुभारंभ से पूर्व घरधणी मय परिवार के देवी-देवताओं के ‘ठाण’ (स्थान) तक गाते बजाते जाते हैं और निमंत्रण रख कार्य सिद्ध करने की अरज करते हैं। आस्थानुरूप उन्हें निमंत्रित देवी-देवताओं की उपस्थिति का आभास भी होता है।

परिवार में कोई भी कार्य हो, पूर्वज बरबस याद आ जाते हैं। उनके बिना कार्य सम्पादन की कल्पना भी कारुणिक हो उठती है। समस्या खड़ी होती है उन तक निमंत्रण पहुंचाने की। लोक जीवन में हर समस्या का हल है। यह सब तो भावनाओं का खेल है। लोक है कि वहाँ तक भी संदेश भेज देता है –

सरगऽ भवन्ती हो गिरधरणी,

एकऽ संदेशों लई जावऽ।

सरगऽ का मोठाजी दाजी सी यौं कयजेऽ

तुमऽ घरऽ नातणीऽ को यावऽ …

– हे स्वर्ग में विचरण करने वाली गिद्धनी, तुम हमारा एक संदेश लेकर जाओ। वहाँ स्वर्ग में हमारे मोठा आजा रहते हैं, उन्हें यह संदेश देना कि ‘‘तुम्हारे घर नातिन का विवाह है।’’

पूर्वजों को न्योतने के इस प्रसंग को ‘‘रुखड़ी न्योतना’ कहते हैं। न्योते के उŸार में स्वर्गवासी पूर्वज अपने न आने की विवशता बतलाते हुए कहते हैं – ‘‘तुम्हारा कार्य जिस विधि हो उस विधि निपटा लेना। हमारा आना नहीं होगा।’’

निमंत्रण की महिमा न्यारी है। किसी व्यक्ति से आपका कितना ही मन मुटाव हो, अनबन ही क्यों न हो, आपके घर होने वाले किसी कार्य में आपने निमंत्रण दे दिया तो बंधी गाँठें खुल जाती हैं। बावज़ूद आपकी किसी से कितनी ही घनिष्ठता क्यों न हो, दाँत कटी रोटी की यारी ही क्यों न हो, सगा संबंधी ही क्यों न हो, किसी कारण से आप से निमंत्रण देने में चूक हो गई तो समझो, रिश्तों में खटास आ गई, नातों में दरार पड़ गई।

अगर पंगत निमंत्रण की बात हो तो, ज़रूरत से ज्यादा ही सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे अवसरों पर घर का समझदार व्यक्ति या कोई विश्वसनीय ही निमंत्रण देने जाता है, जो घर की दहलीज पर पीले चावल रखकर जिम्मेदार व्यक्ति को जताता है कि ‘‘अमुक भाई घर ‘पावणा पाई, कुटुम्ब सहित, चूल्हा निवता’ एक आसामी का निवता’, जीमणऽ आवणूजऽ’’

कार्यक्रम की अहमियत की दृष्टि से घर का मुखिया भी निमंत्रण देता है। घर-घर बुलावा बहन-बेटियों की जिम्मेदारी में ही आया करता है। लोक या लोकांचल में निमंत्रण का बड़ा ही उदाŸा स्वरूप देखने को मिलता है। किसी भी बड़े कार्य का सार्वजनिक रूप से निमंत्रण दिया जाता रहा, जैसे गंगापूजन हो, कथा हो या कि बेटी की सगाई। नाई ठाकुर गाँव की गली के नुक्कड़ पर खड़ा होकर डोंडी पीटकर घोषणा करता है – ‘‘आज अमुक भाई घर ग्यारी को पूजन या छोरी की मांगणी छे तो गुड़पान को बुलाओ छे। पधार जो जी।’’ ऐसे निमंत्रणों को सामाजिक स्वीकृति होती है। नियत स्थान पर सब व्यक्ति एकत्रित हो जाते हैं। लोक में थोथा अहम् नहीं होता।

परिवार में संतान जन्म का निमंत्रण नाना या दादा के घर नाई के हाथ ‘पगल्या’ देकर ही भेजा जाता था। वरना नाई को पत्र की भाषा में निमंत्रण रटवा दिया जाता था – – –

‘‘श्री श्री श्री 1008 श्री, राजमान राजेश्वर श्री सिद्धनाथजी पटेल, दीपचन्दजी पटेल, सदाशिवजी राव, रामचन्द्रजी काशीराम पटेल को, ग्राम खुटला से गोपीकृष्ण, शिवहरि, हरिहर, गोपाल, रतनलाल पटेल को पाँव लागणूँ पहुँचे। जोग लिखी गोपी पटेल के पुत्र माँगीलाल और बहू गौरी बाई ने पुत्र रत्न जाया सो पावणा पाई कुटुम्ब सहित पच खिचड़ी लेकर आवणू जी।’’ संदेश को प्रत्यक्ष हमारी हाजरी समझणू जी. . .! और नाई रटा-रटाया पत्र जहाँ-जहाँ निमंत्रण देना होता है, शाकरपुड़ा के साथ सुना देता था। शुभ पत्र लिखा हो तो, उसपर कुमकुम हलद छींट दी जाती थी और शोक संदेश होता तो पत्र लिखकर उसका कोना फाड़ दिया जाता था।

हम वर्तमान परि॰श्य में देखें तो निमंत्रण-पत्रों की होड़ सी लग गई है; किन्तु कुछ दिन पूर्व तक आने वाले पत्र अब देखने को नहीं मिलते, जिनपर, रामधनुष तोड़ रहे हैं व सीताजी वर माला लिए खड़ी हैं या शंकर भगवान बाघम्बर पहने व पार्वतीजी कलियों के आभूषण पहने एक दूसरे के गले में माला डाल रहे हैं। निमंत्रण पत्रों के भी तर भी बड़ी सुन्दर पदावली होती थी –

‘‘भेज रहे हैं, स्नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,

ओ मानस के राजहंस, तुम भूल ना जाना आने को।।’’

तो किसी पर लिखा होता –

‘‘हाथ जोड़ विनती करे, ओ मानस के राज,

भरी सभा में पधार जोऽ तुम बिन सरे नऽ काजऽ’’

अब ये सब कुछ पुराने पड़ गए हैं। अब नया का दौर आ गया है। विषय वस्तु को पेश करने में आजकल लोग अपना कला कौशल, साहित्य ज्ञान, धन सब उडेल देना चाहते हैं ताकि विवाह समारोह की प्रशंसा वर-वधू की प्रशंसा के साथ ही आगंतुकों से द्वार पर ही अद्वितीय पत्रिका की प्रशंसा से झोली भर ली जाय।

ऐसी पत्रिकाएँ बड़े मनोयोग से तैयार की जाती हैं, जिन्हें लोग सालों साल सम्हाल कर रखते हैं, कभी पेटी की तलहटी, तो कभी लाकर में रखते हैं और अवसर आने पर उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहते।

सच तो यह है कि निमंत्रण या निमंत्रण-पत्र परस्पर मेल-मिलाप की बेहतर मिसाल है, दिल से दिल को जोड़ने की बात है, इन्हें हेकारा दृष्टि से मत देखिए, ये निमंत्रण प्रेम व स्नेह की सौगात है, इन्हें दिल से लगाकर देखिए और रखिए।

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