एक था आर्यन, एक है अनाया। 

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एक था आर्यन, एक है अनाया। 

प्रकाश हिन्दुस्तानी की रिपोर्ट

यह ‘मिशन अनाया’ अब मार्च में होगा पूरा।

एक क्रिकेटर और कोच रहे हैं संजय बांगड़। उनका एक बेटा था आर्यन ! बेटा भी क्रिकेट खेलता था। स्टेट क्रिकेट खेला, अंडर 16 खेला। भारत और यूके में क्लब में क्रिकेट खेला। ठीकठाक खिलाड़ी रहे।

जब छोटे थे, तब आठ साल की उम्र में कुछ कुछ अलग लगने लगा था। टीम के दूसरे खिलाड़ी छेड़ते भी थे। उस उम्र में बच्चे डॉक्टर/इंजिनियर/सीए आदि बनने की सोचते हैं, लेकिन आर्यन को लगा कि वे लड़का नहीं, लड़की बनना चाहते थे। अगर लड़की बन जाएँ तो?

घरवालों से बात की, उन्हें समझाया, डॉक्टरों की सलाह ली और फिर फैसला किया कि मुझे लड़का नहीं रहना, लड़की बनना है।

घरवाले बच्चे की ख़ुशी देखना चाहते थे। वे माने। पर प्रक्रिया तो बहुत लम्बी और दर्दनाक है। लड़के से लड़की बनने की चिकित्सकीय प्रक्रिया (ट्रांस वुमन ट्रांजिशन या मेल-टू-फीमेल जेंडर अफर्मेशन) एक बहु-चरणीय, लंबी और व्यक्तिगत प्रक्रिया है।

यह मुख्य रूप से हार्मोन थेरेपी और सर्जरी पर आधारित होती है, जो जेंडर डिस्फोरिया (लिंग पहचान से शरीर का मेल न खाना) को कम करने के लिए की जाती है।

यह प्रक्रिया वर्ल्ड प्रोफेशनल असोसिएशन फॉर ट्रांसजेंडर हेल्थ की गाइडलाइंस के अनुसार होती है और तमाम तरह के डॉक्टरों , एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, सर्जन, साइकियाट्रिस्ट आदि की टीम द्वारा की जाती है। भारत में ट्रांसजेंडर एक्ट 2019 के तहत भी यह जरूरी है।

सबसे पहले मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन के तहत मनोचिकित्सक/साइकोलॉजिस्ट से कई सेशन होते हैं। फिर जेंडर डिस्फोरिया की पुष्टि होती है। फिर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी दी जाती है, जिसका असर छह महीने से दो साल में होता है। इसमें त्वचा नरम होना, स्तन विकास, चेहरे/शरीर पर बाल कम होना, कूल्हों पर चर्बी बढ़ना जैसे परिवर्तन होते हैं।

पूरी प्रक्रिया करीब पांच साल की है। अभी आर्यन